संगराँद से मकरैण तक : परंपरा में रूपांतर, अर्थ में निरंतरता
आईएएस ललित मोहन रयाल
संक्रांति : संक्रमण का उत्सव
संक्रांति का मूल भाव ही ट्रांजिशन है—एक स्थिति से दूसरी में प्रवेश। पंचांग की भाषा में कहें तो जब सूर्य एक जोडिक प्रणाली से निकलकर दूसरी जोडिक राशि में पदार्पण करता है, वही क्षण संक्रांति कहलाता है। समय, गणना और आकाशीय गणित का यह क्षण भारतीय सांस्कृतिक चेतना में केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि जीवन-चक्र का प्रतीक बन जाता है।
गढ़वाली बोली में इसी शब्द का लोक-अपभ्रंश होकर यह “संगराँद” बन जाता है—कुछ बदला हुआ, कुछ अपना, बिल्कुल वैसे ही जैसे परंपराएँ समय के साथ अपना रूप बदलती हैं, पर अपना अर्थ नहीं छोड़तीं।
एक समय था जब कैलेंडर हाथ में नहीं होते थे, मोबाइल तो दूर की बात थी। तब समय की घोषणा मनुष्यों नहीं, वाद्यों द्वारा होती थी। वादक समुदाय ढोल-दमाऊ, रणसिंघा और नगाड़ों की गूँज के सहारे प्रतिमास संक्रांति के आगमन का ऐलान करता था। यह घोषणा केवल तिथि की सूचना नहीं होती थी, बल्कि पूरे समाज को यह बताने का एक लोक-तरीका था कि समय ने करवट ली है—अब खेत, घर और देह-मन सबको नई लय में ढलना है।
भूगोल और ज्योतिष के संगम पर खड़ी एक और संक्रांति है—सूर्य का उत्तरायण होना। जिओडैसी की भाषा में यह सूर्य की उत्तरगामी यात्रा है, जिसे कुमायूँ में “उत्तरायणी” या ‘उतरैनी’ कहा जाता है। वहीं गढ़वाल की सांस्कृतिक चेतना में सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करना “मकरैण” के रूप में प्रतिष्ठित है। नाम अलग हैं, पर भाव एक—अंधकार से प्रकाश की ओर, शीत से ऊष्मा की ओर, जड़ता से गति की ओर।
इन दोनों सांस्कृतिक परिक्षेत्रों में यह पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। पवित्र नदियों और उनके संगमों पर स्नान, शरीर की नहीं, मन की शुद्धि का अनुष्ठान होता है। घरों में खिचड़ी, घी और तिल का सादा-सा, पर अर्थपूर्ण मेनू सजता है—जो प्रकृति के साथ तालमेल का भोजन है। तिल की ऊष्मा, घी की स्निग्धता और खिचड़ी की सरलता—सब मिलकर बताते हैं कि पर्व का सार भोग नहीं, संतुलन है।
संक्रांति इस अर्थ में केवल सूर्य का संक्रमण नहीं, मनुष्य की भीतरी यात्रा का उत्सव है—जहाँ समय बदलता है, दिशा बदलती है और परंपरा हर बार नए अर्थ के साथ पुनः जीवंत हो उठती है।

