वन संपदा को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ना समय की आवश्यकता- त्रिवेन्द्र

वन संपदा, आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की नींव

देहरादून / नई दिल्ली। लोकसभा में हरिद्वार के सांसद एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत द्वारा उठाए गए प्रश्न के माध्यम से वनों और वन आधारित कार्यकलापों के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान तथा उससे जुड़े रोजगार और आजीविका के मुद्दों पर जोर दिया गया।

इस पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने अपने लिखित उत्तर में बताया कि वर्ष 2024-25 में “वानिकी एवं वन उत्पाद” का सकल मूल्य संवर्धन (GVA) में योगदान 1.4 प्रतिशत दर्ज किया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय वन नीति, 1988 के तहत पर्यावरणीय संतुलन, वनों की उत्पादकता और ग्रामीण एवं जनजातीय समुदायों की आवश्यकताओं की पूर्ति पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। साथ ही, वन अधिकार अधिनियम, 2006 के माध्यम से वनवासियों के अधिकारों को सुदृढ़ किया जा रहा है।

सरकार द्वारा ग्रीन इंडिया मिशन, मिष्टी योजना, नगर वन योजना एवं अन्य पहलों के जरिए वन संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के अवसर बढ़ाए जा रहे हैं। संयुक्त वन प्रबंधन समितियां (JFMC) और ईडीसी के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी को भी मजबूत किया गया है।

सांसद रावत ने विशेष रूप से यह प्रश्न उठाया कि जिन राज्यों में 60 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र है, वहां की स्थानीय जनता की आय और रोजगार बढ़ाने हेतु वन विभाग द्वारा कौन-कौन सी ठोस योजनाएं संचालित की जा रही। उन्होंने इस विषय को पर्वतीय राज्यों, विशेषकर उत्तराखंड के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।

सांसद रावत ने कहा कि उत्तराखंड जैसे राज्यों में वन संपदा को स्थानीय आजीविका, स्वरोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि “वन संपदा केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की मजबूत नींव भी बन सकती है।”

उन्होंने लघु वन उपज, औषधीय पौधों और वन आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर रोजगार सृजन तथा पलायन रोकने पर बल दिया और इसे “पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के संतुलन” की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।

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