स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व पूर्व विधायक नौटियाल की 121 वीं जयंती पर प्रेरणाप्रद जीवन को याद किया
अविकल उत्तराखंड
देहरादून। जिला पंचायत देहरादून में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार की ओर से आयोजित ‘शेरे गढ़वाल’ कप्तान राम प्रसाद नौटियाल की 121वीं जयंती समारोह में भावभीनी श्रद्धासुमन अर्पित किए।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत उपस्थित रहे। उनके प्रेरक उद्बोधन को सुनने का अवसर मिला।
पूर्व दायित्वधारी एवं भाजपा के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष कर्नल सी. एम. नौटियाल की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में वक्ताओं ने कप्तान रामप्रसाद नौटियाल व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भुवनेश विद्यार्थी तथा उनसे जुड़े अनेक प्रेरक संस्मरण साझा किए।
समारोह में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों को सम्मानित भी किया गया। और उनके त्याग, संघर्ष और राष्ट्र निर्माण में दिए गए योगदान को नमन किया।

शेरे गढ़वाल कैप्टन राम प्रसाद नौटियाल को उनकी जयंती पर श्रद्धापूर्वक स्मरण
जन्म: 1 अगस्त, 1905 – निधन: 12 दिसंबर, 1980
नैनीडांडा विकासखंड से पिछले दो दशक से बहुत गहरा नाता हो गया है। बहुत सारे मित्र तो वहां हैं ही एक ऐतिहासिक थाती भी बार-बार उस क्षेत्र की ओर आकर्षित करती रही है। मरचूला से लेकर दिगोलीखाल, बीरोंखाल, से स्यूंसी और उससे आगे ढौंडियाल स्यू पट्टी और आगे निकल जायें तो पोखड़ा तक का एक भूगोल हमारे सामने होता है। महात्मा गांधी ने सल्ट को ‘कुमाऊं की बारदोली’ कहा था। जब वह इस मुहावरे को गढ़ रहे थे तब उस क्षेत्र का मतलब धूमाकोट का पूरा क्षेत्र भी था। हम लोगों ने इस क्षेत्र को कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम से जाना। शीशराम पोखरियाल, तल्ली डुंगरी के धान सिंह रावत, पंजारा के कामरेड नारायण दत्त सुंदरियाल, उनके भाई घोर संघ के पदमादत्त सुंदरियाल आदि समय-समय पर इस क्षेत्र की सामाजिक-राजनीतिक चेतना के लिए सक्रिय रूप से काम करते रहे हैं।
इस क्षेत्र कके एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं कैप्टन राम प्रसाद नौटियाल। आजादी के आंदोलन में उनकी प्रमुख भूमिका रही। वह इस क्षेत्र के पहले विधायक चुने गये। आज उनकी जयंती है। इस अवसर पर उन्हें कृतज्ञतापूर्वक श्रद्धांजलि। कैप्टन राम प्रसाद नौटियाल की जीवन बहुत प्रेरणाप्रद रहा है। उनका जन्म पौड़ी गढ़वाल जनपद के ग्राम कांडा, पट्टी- खटली में हुआ। उनके पिता का नाम गौरीदत्त नौटियाल था। वह एक प्रतिष्ठित ज्योतिषी थे। बचपन से ही विद्रोही स्वभाव के नौटियाल जी प्राइमरी शिक्षा गांव में करने के बाद जिद कर दी कि वह पढने के लिए पोखड़ा नहीं जायेंगे। उनकी जिद के बाद उनका दाखिला डीएवी स्कूल देहरादून में कर दिया।
विद्रोही स्वभाव के बालक राम प्रसाद के लिए उनके कालेज में सरोजनी नायडू का भाषण जीवन की दिशा मोडने वाला साबित हुआ। वहां छात्रों ने भारत मा और महात्मा गांधी की जय के नारे लगाए। पुलिस ने लाठीचार्ज किया। चौबीस छात्र गिरफ्तार हुए, जिनमें एक राम प्रसाद भी थे। इन सब पर पचास-पचास रुपये का जुर्माना हुआ। यह न चुकाने के कारण तीन हफ्ते का कारावास हुआ। जिनके अभिभावकों ने जुर्माना दिया वह तो छूट गये, लेकिन रामप्रसाद जैसे छात्रों को तीन हफ्ते की सजा भुगतनी पड़ी।
अदालत का फैसला था कि संयुक्त प्रांत आगरा और अवध के किसी भी स्कूल में भर्ती नहीं हो सकते। अपनी सोने की मुर्खियां बेचकर मेरठ चले गये। वहां बड़े कष्टों के बाद रिकार्ड कीपर की नौकरी मिली। बाद में नायक हो गये। रावलपिंडी और चकरौता में ड्यूटी की। वहां अच्छा काम करने पर कमीशन मिल गया और एडजुटेंट क्वार्टर मास्टर का काम मिला।
साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपतराय की मौत ने उन्हें झकझोरा। उस समय वे बलुचिस्तान में थे। मन नौकरी से उचट गया। नौकरी छोड़कर आजादी के आंदोलन में कूदने का मन बना लिया। कांग्रेस सेवादल में भर्ती हो गये। गैंड पेन्शुला रेलवे स्टेशन में श्रमिकों की हड़ताल चल रही थी, वह उसमें शामिल हो गये। वहां हड़ताल के पर्चे बांटते पकड़े गये और जेल हो गई। यहां श्रीपाद अमृत डांगे, केदारनाथ सहगल, एम. आर. मसानी, अच्युत पटवर्धन से मुलाकात हुई। फिर कांग्रेस के समझौता हो जाने के बाद छोड़ दिये गये।
कलकत्ता अधिवेशन समाप्त होने के बाद डाक्टर हार्डीकर ने अवध प्रांत से चार सत्याग्रही गाइड चुने, जिनमें एक नौटियाल जी भी थे। उन दिनों लाहौर सत्याग्रहियों का मुख्य केंद्र था। कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के लिए कांग्रेस सेवादल को ट्रेनिंग देने के लिए आयंकर के साथ उन्हें नियुक्त किया गया। उनकी सरकार विरोधी गतिविधियों पर गुप्तचर विभाग की नजर थी। उन दिनों पुष्पा नाम की एक छात्रा महिला दल की कैप्टन थी। उसके पिता सीआई में इंस्पेक्टर थे। उसने बताया कि उनके नाम का गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया है। गिरफ्तारी से बचने के लिए पठानकोट, डलहौजी, चंबा होते चवाड़ी गांव पहुंचे । वहां एक पुरोहित के घर में रहकर तीन महीने खेती और पुरोहिती की। लेकिन गिरफ्तार कर लिए गये और लाहौर जेल में बंदी बनाया गया। आखिर में 21 दिसंबर, 1929 को लाहौर जेल से रिहा हुए। कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन 1929 मे रावी नदी के किनारे हुआ। यहीं से पूर्ण स्वराज की घोषणा हुई। नौटियाल जी इस सम्मेलन में अवध प्रांत की ओर से गाइड थे। यहीं उनखी मुलाकात पहाड़ के सत्याग्रही हरगोविंद पंत, कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, देवा सिंह कौरिया, गढ़ केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, कृपाराम मिश्र नारायण दत्त पोखरियाल आदि से हुई।
सेवादल के मुख्य कार्यकर्ता होने के कारण उन्होंने रानीखेत, वीरभट्टी नैनीताल, सोमेश्वर और बागेश्वर में बड़े प्रशिक्षण शिविर लगाये। लगभग पांच सौ स्वयंसेवकों को सत्याग्रह के लिए तैयार किया। बाद में दुग्गडा आकर गढ़वाल क्षेत्र में कई सभाएं कर व्यापक जन संपर्क किया। कुमाऊं और गढ़वाल में सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रहे। इस बीच 16 मई, 1930 को देवकीनंदन ध्यानी, जीतराम देवरानी, मंगतराम, पंचम सिंह आदि को लेकर बद्रीनाथ पहुंचे। पांच आना रकम के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया। रुद्रप्रयाग मे जब एक बड़ी सभा कर रहे थे तो डिप्टी कमिश्नर इवटसन ने सत्याग्रहियों के नाम पर गिरफ्तारी का वारंट निकाल दिया। अनुसूया प्रसाद बहुगुणा की सलाह पर वह उनका घोडा लेकर तीन साथियों के साथ लोगों को इकट्ठा करने लगे। बहुगुणा और उनके साथी गिरफ्तार हो गये। लंबे समय तक इसी तरह काम करने के बाद आखिरकार गिरफ्तारी हो गई।
विधानसभा चुनाव का विरोध करने पर गिरफ्तार हुए। जंगलात की तार-बार काटने के आरोप में जेल हुई। दो साल की सजा सुनाई गई। बरेली जेल में भूखा रखा गया। कई यातनाएं सहीं। चक्की चलाई। बेड़ियां पहनाई गई। गांधी-इरविन समझौते के बाद 14 मार्च, 1931 को छोड़ा। बाद में 23 मार्च, 1931 को जब भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी हुई तो उन्होंने जगह-जगह जोशीले भाषण दिये। उन्हें गुजडू से गिरफ्तार कर लैंसडौन फिर कोटद्वार और बाद में मुरादाबाद जेल भेज दिया। उन्होंने जेल में भूख हड़ताल की। बाद मे हरगोविंद पंत ने समझौता कराकर भूख हड़ताल समाप्त की। मुरादाबाद जेल में 11 महीना 22 दिन काटकर जब बाहर आये तो यह शर्त रख दी गई कि जिले के अंदर कोई सभा नहीं करेंगे। पुलिस स्टेशन में हाजिरी देनी होगी। नियम तोड़ने पर 500 रुपये का जुर्माना हो सकता था।
नौटियाल जी की एक बहुत ऐतिहासिक घटना से संबंध रहा है। जब 1932 में मैल्कम हैली का विरोध जयानंद भारतीय ने किया तो उन्हें वहां तक पहुंचाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। एक सुनियोजित रणनीति के तहत जयानंद जी को वहां तक पहुंचाया गया। जयानंद भारतीय ने ‘मैल्कम हैली गो बैक’ और ‘भारत माता की जय’ के साथ हैली को काला झंडा दिखाया। उन दिनों कुमाऊं और गढ़वाल से छह सौ से अधिक सत्याग्रही जेलों में थे। कैप्टन नौटियाल जी इन कैदियों के घरों में राशन-पानी की व्यवस्था करते थे। इस कारण उन्हें धारा-144 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। एक साल की सजा और दो सौ रुपये का जुर्माना लगा।
कांग्रेस के लिए समर्पित नौटियाल जी ने अपने साथियों के साथ 1937 के लखनऊ अधिवेशन के लिए दुग्गडा से लखनऊ तक पैदल यात्रा की। जब 1938-29 में ग्राम सुधार विभाग की स्थापना हुई तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट स्काउट मास्टर तथा एडल्ट एजुकेशन इंस्पेक्टर नियुक्त किया गया। यहां भी गिरफ्तारी हुई। एक साल की सजा और दो सौ रुपये जुर्माना लगा। पौड़ी, मुरादाबाद और चुनार जेल भेजा गया। चार-पांच महीने की सजा काटकर दुग्गडा पहुंचे।
नौटियाल जी 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भी केंद्रीय भूमिका में रहे। इस आंदोलन को उन्होंने बहुत ताकत और आक्रामकता के साथ लड़ा। पूरे गढ़वाल में जगह-जगह सत्याग्रहियों को इकठ्ठा किया। इस आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत बहुत दमन पर उतर आई थी। कई लोगों को यातनाएं और जेल हुई। पुलिस ने उनके घर में रात के दो बजे छापा मारा। घर में आठ साल का बच्चा गोलीबारी के डर से कही खेत में छुप गया था। बीमार बेटे और पिता को छोडकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मुरादाबाद और बरेली जेल में रखा गया। बाद में 1 जुलाई, 1945 को रिहाई हुई। इसके बाद आजादी की निर्णायक लड़ाई लडने तक संघर्ष किया।
देश के स्वतंत्र होने के बाद भी नौटियाल जी की सक्रियता बराबर बनी रही। देश में पहले आम चुनाव में उन्हें कांग्रेस ने लैंसडाउन विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया और वह नौ हजार से अधिक मतों से विजयी हुए। अपने विधायक कार्यकाल में उन्होंने इस क्षेत्र में दर्जनों मोटर मार्गो का निर्माण करवाया। सड़कें तो बनीं, लेकिन इनमें गाडियां चलाने के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं थी। तब उन्होंने इस क्षेत्र मे ‘जनता परिवहन की नींव रखी। सोसाइटी के माध्यम से परिवहन का ढांचा खड़ा किया। इसमें धान सिंह रावत,गुलाब सिंह रावत, झब्बर सिंह, दरबान सिंह आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा। नौटियाल जी 1957 में दुबारा विधायक बने। इस बार वे निर्दलीय थे। उन्होंने ‘गढवाल मोटर यूजर्स ट्रांसपोर्ट सोसायटी लिमिटेड ‘की स्थापना की। तत्कालीन मुख्यमंत्री सीबी गुप्ता ने उन्हें कांग्रेस में आने को कहा। उन्होंने इसके एवज में कई मोटर मार्ग, पेयजल योजनाएं, सहकारी बैंक, डीसीडीएफ की स्थापना की। विधायक रहते उन्होंने लैंसडौन, बीरोंखाल और नौगांवखाल मे जिला सहकारी बैंक की शाखाएं खुलवाई।
12 दिसंबर, 1980 को उनका निधन हो गया। कैप्टन राम प्रसाद नौटियाल जी उनकी जयंती (1 अगस्त, 1905) कृतज्ञतापूर्वक श्रद्धांजलि।
(चारू तिवारी की फेसबुक वॉल से)



