अंकिता हत्याकांड-पूर्व सैनिकों ने भी खोला मोर्चा

अंकिता को न्याय- पूर्व सैनिकों का गरिमामय मौन मार्च

CBI जांच की संवैधानिक मांग के साथ देहरादून में दिखा सैनिक अनुशासन और नैतिक साहस

अविकल उत्तराखंड

देहरादून। पूर्व सशस्त्र सैनिक एवं अर्द्धसैनिक बल ने बुधवार को अनुशासित, गरिमामय व भावनात्मक मौन मार्च का आयोजन किया ।
मौन मार्च में बड़ी संख्या में पूर्व सैनिकों, वीर नारियों एवं मातृशक्ति ने सहभागिता की।
मार्च का वातावरण शोकग्रस्त रहा। काले वस्त्रों में, पूर्ण मौन के साथ उठाए गए बैनरों के प्रत्येक शब्द में बेटी अंकिता की पीड़ा, दर्द और न्याय की पुकार स्पष्ट रूप से झलक रही थी।

यह मौन किसी कमजोरी का नहीं, बल्कि उस नैतिक साहस का प्रतीक था, जो सैनिक परंपरा की पहचान है।
मौन मार्च अपराह्न 11:30 बजे दो पंक्तियों में बैनर धारकों के साथ प्रारंभ हुआ तथा नेवल हाइड्रोग्राफिक कार्यालय से होते हुए 14:30 बजे परेड ग्राउंड में संपन्न हुआ। आयोजन का नेतृत्व केन्द्रीय गौरव सैनानी एसोसिएशन, उत्तराखंड द्वारा किया गया, जिसमें विभिन्न अन्य पूर्व सैनिक संगठनों ने भी सहभागिता की।

आयोजकों ने स्पष्ट किया कि यह मौन मार्च किसी राजनीतिक दल का प्रदर्शन नहीं था और न ही यह आक्रोश, नारेबाजी या शक्ति प्रदर्शन का मंच था।
यह पूर्ण न्याय एवं CBI जांच की संवैधानिक मांग को लेकर पूर्व सशस्त्र सैनिक एवं अर्धसैनिक बल समुदाय की सामूहिक अंतरात्मा की शांत, अनुशासित और गरिमामय अभिव्यक्ति है।

उत्तराखंड एक सैन्य बहुल प्रदेश है, जहां वीरता के साथ मर्यादा, अनुशासन और कर्तव्यबोध जीवन मूल्य हैं। सैनिक न भीड़ का हिस्सा बनता है, न उत्तेजना में बोलता है।
वह तब बोलता है, जब न्याय का मौन टूटने लगता है—और आज वही क्षण है।

यह मार्च किसी सरकार के विरोध में नहीं, बल्कि न्याय के समर्थन में है। यह किसी व्यक्ति, दल या सत्ता को धमकाने के लिए नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा को स्मरण कराने का प्रयास है। सैनिक समुदाय के लिए मौन सबसे कठोर और प्रभावशाली वक्तव्य है—जिसमें शोर नहीं, संकल्प होता है; नारे नहीं, नैतिक बल होता है।

आयोजन के दौरान न कोई राजनीतिक नारा लगाया गया, न कोई आरोपात्मक भाषण दिया गया और न ही कोई उग्र प्रतीक प्रदर्शित किया गया।

सरकार से अपेक्षा टकराव की नहीं, बल्कि संवैधानिक संवेदनशीलता की है। CBI जांच की मांग अविश्वास का नहीं, बल्कि पूर्ण सत्य तक पहुंचने के संकल्प का प्रतीक है। यदि सत्य निर्भीक है, तो जांच से भय क्यों?
आज का यह मौन मार्च इतिहास में एक उदाहरण बनेगा—कि जब राजनीति शोर करती है, तब सैनिक मौन की गरिमा के साथ राष्ट्र को आईना दिखाता है।

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