…तो हिमपात जोन से बाहर होती जा रही हिल क्वीन मसूरी
मसूरी से इतिहासकार जयप्रकाश उत्तराखंडी की कलम से
कल मैं सन् 1850 के दशक मेंं मसूरी लंढौर डिपो में कार्यरत एक अंग्रेज मेजर लुडविक स्टीवार का पौने दो सौ साल पुराना एक रिकार्ड देख रहा था,वह मसूरी की भयावह बर्फबारी पर लिखता है…
“साल 1851 की जनवरी में मसूरी में पूरे 9 दिन बिना रुके बहुत भारी बर्फ गिरी। बहुत से स्थानीय निवासी बर्फ में दबकर मर गये। सड़कें कुत्तों, जंगली पशुओं और पक्षियों की लाशों से पट गयी..भयावह हिमपात से देहरादून और मैदानों से मसूरी में आवाजाही बंद हो गयी …. हफ्तों तक सड़कें साफ नहीं हुई,खाने पीने के सामान का संकट पैदा हो गया,लगभग भूखमरी के हालात हो गये…..”
यह तो पौने दो सौ साल पुरानी बात है,पर मेरी स्मृति में ही 1980 तक मसूरी में बिना नागा एक से दो फुट बर्फ जाडों में सामान्यतः दो तीन बार पड़ जाता करती थी।हमारे सामने दून घाटी में कभी कभी राजपुर बाजार के ऊपरी हिस्से तक बर्फ जाती थी।
मुझे अपने बचपन में मसूरी में साल 1962 मेंं चीन युद्ध के वक्त की बर्फबारी की खूब याद् याद है।तब हम लाइब्रेरी बाजार में रहते थे।उस साल मसूरी की पहाड़ियों पर लगभग चार-पांच फुट के करीब बर्फ गिरी थी।बिजली पानी की लाइन ध्वस्त हो गयी,जगह जगह पेड़ टूटकर गिर गये थे।गैस उन दिनों होती नहीं थी,घरों में सड़कों के गिरे पेड़ों को जलाकर और बर्फ पिघलाकर बने पानी से बहुत दिन खाना पकाया गया था।
पुरानी बर्फबारी अब हम जैसे पुराने स्थानीय मसूरी वासियों की यादों या पुराने फोटोग्राफ्स में रह गयी है।
रांड रूदन करने से अब कोई लाभ नहीं..इसलिए कि मानो या न मानो व्यापार की हवस ने पिछले दशकों में जंगलों और प्रकृति की जो तबाही भ्रष्ट प्रशासन,एमडीडीए और वन विभाग ने की,उसका परिणाम है कि मसूरी अब टोटल प्राकृतिक रूप से बर्फ लाइन से बाहर हो गयी है।
जैसे देहरादून में जनवरी 1945 में आखिरी बार हिमपात हुआ था,और वह हिमपात जोन से बाहर हो गयी,ठीक वैसे ही मसूरी भी अब सदा के लिए हिमपात जोन से बाहर चला गया है।यह दर्दनाक है….
(गौरतलब है कि इस साल 21 जनवरी 2026 तक मसूरी,नैनीताल समेत अन्य पहाड़ी इलाकों में बर्फ नहीं गिरी। तापमान में उछाल देखा जा रहा है। )

