स्तब्ध हूं! कुछ ही देर पहले प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के निधन की सूचना मिली. कुछ सप्ताह पहले फोन पर बातचीत हुई थी. स्वास्थ्य समस्या की भी संक्षिप्त चर्चा हुई.
उनका आज अकस्मात चले जाना हम सबके लिए बहुत बड़ी क्षति है. अभी उन्हें होना चाहिए था. बहुत जरूरी थे वह हमारे समाज, हिंदी साहित्य और विचार जगत के लिए!
साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में अपने महत्वपूर्ण योगदान के अलावा वीरेंद्र जी ने विगत दो-ढाई दशक के बीच समाज, राजनीति और समसामयिक विषयों पर जो टिप्पणियां की हैं; वह हिंदी क्षेत्र में एक ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ के तौर पर उनके योगदान का सबूत हैं. वह हर जरूरी विषय पर साहस और ईमानदारी के साथ लिखते और बोलते रहे. मेरी नज़र में समता, सामाजिक न्याय और सहिष्णुता जैसे महान् मानवीय मूल्य ही उनके वैचारिक परिप्रेक्ष्य के मूलाधार हैं!
उनके निधन से हिंदी आलोचना और वैचारिक लेखन की भारी क्षति हुई है.
सादर श्रद्धांजलि भाई वीरेंद्र जी!
परिवार के प्रति हमारी शोक-संवेदना.
(वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश जी की फेसबुक वॉल से)

