वनराजी जनजाति की पुकार – जमीन, पहचान और अधिकार

राजी समुदाय की पहली बार दून में दस्तक

वन अधिकार कानून के तहत राजस्व पट्टे की मांग तेज

अविकल उत्तराखंड

देहरादून। उत्तराखंड की सबसे छोटी और विलुप्ति के कगार पर खड़ी पीवीटीजी श्रेणी की राजी जनजाति की आवाज आखिरकार राजधानी तक पहुंची।
पिथौरागढ़ के दूरस्थ इलाकों से आए राजी समुदाय के युवक-युवतियों ने पहली बार संगठित रूप से देहरादून पहुंचकर अपनी जमीन, पहचान और अधिकारों की मांग को मजबूती से उठाया।
वन अधिकार कानून 2006 बने करीब दो दशक बीत जाने के बावजूद राजी समुदाय को अब तक राजस्व भूमि का पट्टा नहीं मिल पाया है।

सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित यह समुदाय आज भी जंगलों और हाशिये पर जीवन जीने को मजबूर है। अर्पण संस्था के सहयोग से राजधानी पहुंचे समुदाय के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कहा कि यह केवल मांगों की सूची नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और भविष्य का सवाल है।
राजी जनजाति के प्रतिनिधियों ने प्रेस क्लब में मीडिया से बातचीत में कहा कि वन अधिकार कानून के तहत जिन अधिकारों को तत्काल मिल जाना चाहिए था, वे आज भी फाइलों और प्रक्रियाओं में उलझे हुए हैं।
दुर्गम जंगलों और पहाड़ों में रहने वाला यह समुदाय वनोपज संग्रह और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है। संपर्क बढ़ा है, लेकिन विकास की रफ्तार आज भी बेहद धीमी है। समुदाय के प्रतिनिधियों ने बताया कि वे केवल ज्ञापन सौंपने नहीं आए हैं, बल्कि ठोस समाधान चाहते हैं।

इस क्रम में उन्होंने फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, बैंबू बोर्ड, उत्तराखंड राज्य महिला आयोग और उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग के साथ बैठक की। 17 दिसंबर को प्रशासन और नागरिक समाज के समक्ष अपनी मांगें औपचारिक रूप से रखने की तैयारी भी की गई है।

समस्या एक जनजाति की नहीं बल्कि पूरे समाज की है : रेणु
अर्पण संस्था की मुख्य कार्यकारी रेणु ठाकुर ने कहा कि राजी समुदाय की समस्याएं केवल एक जनजाति की नहीं, बल्कि पूरे समाज और राज्य की सामूहिक जिम्मेदारी हैं।
यह समुदाय अपनी पारंपरिक संस्कृति और प्रकृति आधारित जीवनशैली के साथ मुख्यधारा में जुडऩा चाहता है, लेकिन विकास की राह में आज भी कई बाधाएं हैं। राजी समुदाय राज्य के केवल 11 गांवों में निवास करता है, जिनमें 9 गांव पिथौरागढ़, 1 चंपावत और 1 ऊधम सिंह नगर (चकरपुर) में हैं। कुछ दशक पहले तक यह समुदाय गुफाओं में रहता था और बाहरी दुनिया से लगभग कटा हुआ था। आज संपर्क तो बढ़ा है, लेकिन सुविधाएं अब भी अधूरी हैं। संकोची स्वभाव और जंगल आधारित जीवनशैली के कारण अब तक उनकी आवाज नीति-निर्माण के केंद्रों तक नहीं पहुंच पाई थी। यह पहला अवसर है जब समुदाय के युवक-युवतियां स्वयं देहरादून आकर खुलकर अपने संघर्ष, अनुभव और अपेक्षाएं सामने रख रहे हैं।

कौन हैं राजी जनजाति

राजी जनजाति उत्तराखंड की पांच पीवीटीजी जनजातियों में शामिल है और राज्य की सबसे छोटी जनजाति मानी जाती है। यह समुदाय विलुप्ति के कगार पर खड़ा है। सीमित आबादी, दुर्गम बसावट और बुनियादी सुविधाओं की कमी इसकी प्रमुख चुनौतियां हैं।

राजी समुदाय की 10 प्रमुख मांगें

  1. वन अधिकार कानून के तहत मिले पट्टों का राजस्व भूमि में हस्तांतरण और 24 वंचित परिवारों को तत्काल पट्टा।
  2. बलुवाकोट व छारछुम आश्रम स्कूल का 12वीं तक उच्चीकरण और डीडीहाट में नया आश्रम स्कूल।
  3. आवास योजना की राशि बढ़ाने और लंबित तीसरी किस्त जारी करने की मांग।
  4. सतत रोजगार की व्यवस्था और आईटीआई जैसे संस्थानों में नि:शुल्क कौशल प्रशिक्षण।
  5. गाणागांव, भक्तिरवा और किमखोला को मिलाकर अलग पंचायत का गठन।
  6. गांवों में नियमित एएनएम और डॉक्टर की तैनाती।
  7. नवयुवक मंगल दल और महिला मंगल दल के गठन के लिए विशेष प्रावधान।
  8. पंचायत चुनाव में योग्यता संबंधी शर्तों से अगले 10 वर्षों तक छूट।
  9. सड़क, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं का समाधान।
  10. कृषि व आजीविका सशक्त करने के लिए वर्षा जल संग्रहण टैंक की स्थापना।

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