गुलदार की आंगन में ‘दस्तक’.. भालू के जख्मों से गांव हुआ वीरान

झकझोर गयी यशिका की मौत और गांव के एकमात्र परिवार का पलायन

अविक्ल थपलियाल

देहरादून। …उत्तराखण्ड साल भर कई प्रकार की आपदाओं से जूझता रहता है। कभी दैवीय तो कभी मानव जनित।

बीता हफ्ता सीएम धामी की अधिकारियों को नसीहत के साथ साथ जंगली जानवरों के खौफ के नाम भी रहा। गुलदार समेत अन्य जंगली जानवरों ने प्रदेश के विभिन्न इलाकों में दहशत मचाई हुई है।
पौड़ी जिले की लैंसडौन विधानसभा के जयहरीखाल विकासखंड के गांव बरस्वार की बालिका याशिका की असमय मौत सभी को झकझोर गयी। और एक और गांव भुतहा श्रेणी में शामिल हो गया।
कुछ दिन पूर्व अस्पताल के बिस्तर में मृत पुत्री याशिका के गले लगकर फूट फूट कर रौते पिता की वॉयरल मार्मिक तस्वीर ने मानव-जीवन सँघर्ष पर नए सिरे से बहस छेड़ दी।
लगभग तीन साल की याशिका अपने आंगन में खेल रही थी। इसी बीच, गुलदार झपट्टा मार कर ले गया। लाश जंगल में मिली।

प्रदेश के पर्वतीय इलाकों में गुलदार,बाघ ,हाथी, भालू के बढ़ते हमले को लेकर जनता सड़कों पर भी उतर रही है। स्कूल,कालेज भी बन्द किए जा रहे हैं। छात्र व छात्राएं पहरे में स्कूल जा रहे हैं। कर्फ्यू की स्थिति बनी हुई है।
शासन-प्रशासन मुआवजे की रकम बांट कर आक्रोश को थामने की कोशिश में रहता है। लेकिन वन विभाग, स्थानीय निवासी व विशेषज्ञों के साथ मिलकर इस संघर्ष को कम करने संबंधी ब्लू प्रिंट सामने नहीं आ पाता।
वन बिभाग के पास आदमखोर को मारने के लिए पर्याप्त शूटर भी नहीं है। निजी शूटरों के भरोसे जानवरों के आतंक को खत्म करने की कोशिश की जाती है।

इस बीच, वन मंत्री सुबोध उनियाल ने जंगल के अंदर फलदार पेड़ लगाने की बात कही है। लेकिन फलदार पेड़ अन्य जानवरों को तो जंगल में रोकने में सक्षम है। लेकिन गुलदार व बाघ गांव के आंगन व खेत से अपने शिकार को उठाता रहेगा।

भालू के आतंक से आखिरी परिवार ने गांव को अलविदा किया

इस दौरान पौड़ी जिले से भालू के आतंक से गांव में बचा एकमात्र परिवार भी पलायन कर गया।
पौड़ी के पोखड़ा स्थित बस्ताग गांव में हरीश प्रसाद नौटियाल के परिवार को अपना घर छोड़ना पड़ा। बीते पांच साल से यह परिवार अकेला गांव में रह रहा था। लेकिन नये साल के जनवरी महीने में यह परिवार भी पड़ोस के गांव में शिफ्ट हो गया। यह परिवार के चारों लोग पणिया गांव में नागेंद्र सिंह के मकान में रह रहे हैं।

भालू ने उनके छह मवेशियों को मार डाला। नौटियाल परिवार के जाने से यह गांव भी भुतहा गांव की पांत में शुमार हो गया। घर के सामान के साथ गांव छोड़ते इस परिवार के वॉयरल वीडियो ने भी कई सवाल खड़े कर दिए।

नौटियाल परिवार दो दुधारू गाय, बैलों की जोड़ी और दो बकरियों के सहारे जीवन यापन कर रहे थे। परिवार में पत्नी जसोदा देवी, बेटा संजय और  बेटी शांति हैं।

भालू के हमले ने इस परिवार की हिम्मत को तोड़ दिया।हरीश प्रसाद नौटियाल कहते हैं कि कभी सोचा भी नहीं था कि गांव छोड़ने का कारण भालू बनेगा। भालू ने उनकी रोजी रोटी को छीन लिया।

पणिया के ग्राम प्रधान हर्षपाल सिंह नेगी ने बताया कि बस्तगा तोक में डेढ़ दशक पूर्व तक 18 परिवार रहते थे।

जबकि पोखड़ा रेंज के रेंजर नक्षत्र शाह ने कहा कि शीघ्र ही हरीश प्रसाद के परिवार को सुरक्षा मुहैया करवाई जाएगा, ताकि ने गांव लौट जाए।

जंगली जानवरों से पीड़ित परिवारों के लिए धामी सरकार ने मुआवजे की रकम बढ़ाई है। लेकिन उत्तराखण्ड के वन्य जीवों के बसितयों की ओर बढ़ते हमलों की आपदा में यशिका और नौटियाल परिवार की जिंदगी ही उजाड़ दी….

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