पावर इंजीनियरों का देशव्यापी “लाइटनिंग एक्शन” 10 मार्च को

बिजली संशोधन बिल 2025 का विरोध

देहरादून बैठक में निजीकरण के प्रयासों का विरोध, कार्य बहिष्कार व प्रदर्शन की चेतावनी

अविक्ल उत्तराखण्ड

देहरादून। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन की फेडरल एग्जीक्यूटिव की बैठक 8 मार्च 2026 को देहरादून में आयोजित हुई। बैठक में केंद्र सरकार द्वारा संसद के बजट सत्र में प्रस्तावित इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 को लेकर गहरी चिंता और कड़ा विरोध जताया गया। फेडरेशन ने 10 मार्च को देशव्यापी “लाइटनिंग एक्शन” का आह्वान किया है।
फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे और सेक्रेटरी जनरल पी. रत्नाकर राव ने बताया कि बिजली कर्मचारी-इंजीनियर संगठनों, किसान संगठनों और उपभोक्ता समूहों की ओर से बड़ी संख्या में आपत्तियां और सुझाव दिए जाने के बावजूद सरकार इस बिल को पर्याप्त चर्चा और लोकतांत्रिक परामर्श के बिना आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है। उनका कहना था कि जब सरकार ने स्वयं सुझाव आमंत्रित किए थे तो यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि प्राप्त आपत्तियों और सुझावों पर क्या विचार किया गया।
बैठक में परामर्श प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए। फेडरेशन के अनुसार 30 जनवरी 2026 को विद्युत मंत्रालय ने सुझावों की समीक्षा के लिए एक वर्किंग ग्रुप का गठन किया, जिसमें ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन के महानिदेशक को शामिल किया गया। यह संगठन लंबे समय से बिजली वितरण क्षेत्र के निजीकरण का समर्थन करता रहा है, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े होते हैं।
फेडरल एग्जीक्यूटिव ने कहा कि प्रस्तावित इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल 2025 और नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी 2026 बिजली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजीकरण को बढ़ावा देने वाले कदम प्रतीत होते हैं। फेडरेशन के अनुसार ऐसी नीतियां सार्वजनिक बिजली व्यवस्था को कमजोर करेंगी और इसका प्रतिकूल प्रभाव कर्मचारियों, किसानों और आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
बैठक में बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता को निजीकरण से जोड़ने की शर्तों पर भी चिंता जताई गई। इसे जबरन निजीकरण थोपने का प्रयास बताया गया।
फेडरल एग्जीक्यूटिव ने विभिन्न राज्यों में चल रहे आंदोलनों की भी समीक्षा की। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल और दक्षिणांचल डिस्कॉम के निजीकरण के खिलाफ 466 दिनों से जारी आंदोलन का उल्लेख किया गया, जिसमें कर्मचारियों, किसानों और उपभोक्ताओं की व्यापक भागीदारी बताई गई।


बैठक में उत्तराखंड सरकार द्वारा उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (UJVNL) के डाकपत्थर और ढालिपुर स्थित जल विद्युत परियोजनाओं की 76.73 हेक्टेयर भूमि को उत्तराखंड इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बोर्ड के माध्यम से निजी क्षेत्र को आवंटित करने के निर्णय का भी विरोध किया गया। फेडरेशन का कहना है कि जल विद्युत परियोजनाओं के लिए सुरक्षित भूमि के अन्य उपयोग से लखवार, किशाऊ और यमुना बेसिन की परियोजनाओं के विकास पर असर पड़ सकता है।
बैठक में पंजाब में बिजली क्षेत्र की भूमि बेचने और इसका विरोध करने वाले पदाधिकारियों के उत्पीड़न की भी निंदा की गई। साथ ही देशभर के बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों के लिए पुरानी पेंशन योजना (OPS) बहाल करने की मांग दोहराई गई।

शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि
यदि सरकार संसद में इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) बिल प्रस्तुत करती है तो 10 मार्च को देशभर के बिजली अभियंता और कर्मचारी कार्य बहिष्कार करेंगे और कार्यालयों तथा परियोजना स्थलों के बाहर प्रदर्शन करेंगे। साथ ही नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी इंप्लाइज एंड इंजीनियर्स (NCCOEEE) सहित अन्य संगठनों के साथ मिलकर आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर तेज किया जाएगा।

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