हिन्दी कहानी के ‘चार यार’ की एक और कड़ी टूटी

अप्रतिम कथाकार व संपादक ज्ञानरंजन नहीं रहे

नागेन्द्र

हिन्दी के अप्रतिम कथाकार, ‘पहल’ पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन के निधन के साथ हिन्दी कहानी में प्रगतिशील चेतना और साहित्यिक पत्रकारिता के एक युग का अवसान हो गया। ‘पहल’ पत्रिका के आधिकारिक फ़ेसबुक पेज ने उनके निधन की सूचना साझा की।

ज्ञानरंजन का निधन 7 जनवरी की रात 10.30 बजे जबलपुर के एक अस्पताल में हुआ, जहां सुबह ही उन्हें इलाज के लिए भर्ती किया गया था। वह 90 वर्ष के थे। उनकी पहचान जितना उनकी कहानियों से होती है, उससे कहीं ज्यादा उस ‘पहल’ पत्रिका के लिए जिसका ध्येय वाक्य ही था “इस महादेश के वैज्ञानिक और प्रगतिशील वैचारिक विकास के लिए”। साठ के दशक में शुरू हुई यह पत्रिका अपने समय में देश की प्रगतिशील चेतना का सशक्त स्वर भी थी और प्रेरणा भी।

ज्ञानरंजन को एक अप्रतिम कथाकार, सशक्त गद्यकार और यशस्वी संपादक के रूप में जाना जाता है। उनकी गणना साठोत्तरी कहानी आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षरों में होती है और अनायास नहीं है कि बहुत कम कहानियां लिखने के बावजूद वह अब तक हिन्दी कहानी का सशक्त स्वर भी बने हुए हैं और हिन्दी कहानी पर किसी भी बहस का अनिवार्य हिस्सा भी। उनके जाने से देश की प्रगतिशील साहित्यिक चेतना का एक सशक्त स्वर शांत हो गया।

2023 में प्रकाशित ‘कुछ हमारी, कुछ तुम्हारी’ शायद उनकी अंतिम किताब है जिसमें उनकी तितरी-बितरी रचनाएं संग्रहित हैं। इसमें ज्ञानरंजन से की गई बातचीत, उनके पत्र, उनसे जुड़े कुछ लोगों पर ज्ञानरंजन की टिप्पणी और उनको वर्षों से जानने वाले लोगों द्वारा ज्ञानरंजन पर लिखी ट‍िप्पणी महत्वपूर्ण है।

ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवंबर 1936 को माहराष्ट्र के अकोला में हुआ था। वे वरिष्ठ साहित्यकार रामनाथ सुमन के पुत्र थे। उनका बचपन और किशोरावस्था अधिकांशत: दिल्ली, अजमेर और बनारस में बीता और उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की और बाद में जबलपुर के जीएस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में अध्यापन किया।

सातवें दशक के इस यशस्वी कथाकार ने ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’, ‘अमरूद’ और ‘पिता’ जैसी कहानियों के माध्यम से हिन्दी कहानी लेखन को एक नया गद्य दिया। कहना जरूरी है कि ज्ञानरंजन अपने मध्यवर्गीय पात्रों के जीवन के तमाम विरोधाभासों को अभिव्यक्त करने का भाषिक हुनर भी कथाकारों को सिखा रहे थे। उनकी पहली कहानी ‘दिवास्वप्नी’ थी। ‘कबाड़खाना’, ‘क्षणजीवी’, ‘सपना नहीं’, ‘फेंस के इधर और उधर’ तथा ‘प्रतिनिधि कहानियां’ जैसे संग्रहों के माध्यम से उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी कहानियां अपनी खास किस्म की काव्यात्मकता, भाषा के अनूठे प्रयोग, तीखे तेवर और नई कहन शैली के लिए विशेष रूप से चर्चित रहीं।

ज्ञानरंजन उस प्रसिद्ध साठोत्तरी पीढ़ी के समूह का हिस्सा थे जो हिन्दी साहित्य के ‘चार यार’ नाम से चर्चित हुई और जिसमें उनके साथ दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और रवींद्र कालिया शामिल रहे। इस समूह में अब सिर्फ काशीनाथ सिंह जीवित हैं। ज्ञानरंजन लगभग 35 वर्षों तक ‘पहल’ पत्रिका का सफल संपादन और प्रकाशन करते रहे और जिसे हिन्दी की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में निर्विवाद रूप से शुमार किया जाता है।

उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड, साहित्य भूषण सम्मान, शिखर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और ज्ञानपीठ का ज्ञानगरिमा मानद अलंकरण सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उनकी कहानियों का भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है और वे कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। उनके जीवन और कृतित्व पर भारतीय दूरदर्शन द्वारा एक फिल्म का निर्माण भी किया गया है।

ज्ञानरंजन के कुल छह कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं, लेकिन एक बहुचर्चित तथ्य यह भी है कि उन्होंने कुल 25 कहानियां ही लिखीं और जो ‘सपना नहीं’ नामक संकलन में एक साथ प्रकाशित हैं।

ज्ञानरंजन की कहानियों का हिन्दी से इतर कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद तो हुआ ही, अनेक विदेशी भाषाओं में भी उनकी रचनाएं अनूदित हो चुकी हैं। भारतीय विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त ओसाका, लंदन, सैनफ्रांसिस्को, लेनिनग्राद, और हाइडेलबर्ग आदि के अनेक अध्ययन केंद्रों के पाठ्यक्रमों में भी उनकी कहानियां शामिल हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *