ओडिशा- तेजी से बदलते हुए एक नये दौर में कर रहा प्रवेश

..तुम फिर आना..हमारे ओडिशा जरूर आना

नक्सलवाद व भुखमरी से मिल रहा छुटकारा

पीआईबी के प्रेस अध्ययन टूर में झलकी कई विशेषता

अविकल थपलियाल की कलम से

मार्च की एक सुबह…थपलियाल जी नमस्ते..मैं पीआईबी देहरादून से संजीव सुन्द्रियाल बोल रहा हूँ..असिस्टेंट डायरेक्टर..भाईसाहब आपको  ओडिशा के प्रेस टूर पर चलना है..औरतारीख बताई 9 से 13 मार्च। इस डेट पर ओडिशा जाने में असमर्थता जताई गयी..वजह थी ,इन्हीं तारीख पर गैरसैंण का बजट सत्र…खैर बात आई गई हो गयी…सुन्द्रियाल जी की ओर से पीआईबी के प्रेस टूर की नई डेट 22 से 26 मार्च सामने रखी गयी। और बात बन गयी।
पत्रकारों के दल में कौन कौन जा रहा है। यह सुन्द्रियाल जी की 20 मार्च को की गई टूर ब्रीफिंग के दौरान ही पता चला।

बहरहाल, उड़ीसा/ओडिशा टूर की आहट मात्र ने बचपन की यादों में धकेल दिया। और यादों के पन्ने खुद ब खुद खुलते चले गए। गुरुजी का पढ़ाया कलिंग युद्ध और सम्राट अशोक का हिंसा छोड़ अहिँसा के मार्ग पर चलना। यह सब चलचित्र की तरह घूम गया। भारत के वैभशाली इतिहास, ज्योतिष विज्ञान और स्थापत्य कला  का एक जीता जागता उदाहरण… उड़ीसा का कोर्णाक का सूर्य मंदिर। रथ को सात घोड़े खींचते हुए।  यह सब कौतुहल किताबों के  पन्ने से निकल कर दिल में छप चुके थे।

भुवनेश्वर का सूर्योदय


प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के समय कलिंग युद्ध, कोर्णाक का सूर्य मंदिर,जगन्नाथ पुरी,नन्दन कानन पार्क, महानदी, पारादीप पोर्ट ट्रस्ट, केलुचरण महापात्र के अलावा ओडिसी नृत्य की  विश्व प्रसिद्ध नृत्यांगनाओं में संयुक्ता पाणिग्रही, सोनल मानसिंह, कुमुम मोहंती, और सुजाता महापात्र के नाम को रटा जाता था।


इसके अलावा उड़ीसा/ओडिशा में प्रकृति प्रदत्त खनिज भंडार और जर्मनी के सहयोग से स्थापित राउरकेला स्टील प्लांट,टाटा स्टील, जिंदल स्टील एंड पावर, आर्सेनल मित्तल निप्पन स्टील भी सामान्य ज्ञान के प्रमुख प्रश्नों में शुमार रहा है।

मछली पालन व उत्पादन पर शोध

उड़ीसा भ्रमण के दौरान राज्यपाल हरि बाबू कमभमपति ने टिप्स पर बदलते उड़ीसा की खूबियां गिनाई। खनिज आधारित उपक्रमों के अलावा रेल,सड़क,शिक्षा व प्राकृतिक पर्यटन के क्षेत्र में हो रहे सुधार के बाबत विस्तार से समझाया।
मौजूदा समय में उड़ीसा देश के कुल खनिज उत्पादन मूल्य का लगभग 40 से 45 प्रतिशत हिस्सा देता है।

उड़ीसा में  क्रोमाइट (96%), निकेल (92%), बॉक्साइट (51%), मैंगनीज (43%), और लौह अयस्क (33%) के विशाल भंडार हैं। इसके अलावा, कोयला, ग्रेफाइट, चूना पत्थर, और  सोने (Gold) के नए भंडार भी मिले हैं।

22 मार्च की सुबह इंडिगो की फ्लाइट में सवार होते ही उड़ीसा से जुड़े जेहन में दबे कई सवाल एक साथ कौंधने लगे। जॉलीग्रांट का रनवे छूटा और पल भर में  बादलों से घिरे हवाई सफर में उड़ीसा से जुड़ी कहानियां भी याद आने लगी।


नक्सलवाद ,माओवाद और भुखमरी। वर्षों से हिंसा और मौतों का जबरदस्त दौर.. शोषण से उपजे नक्सलवाद में ग्रामीण युवा और युवतियां भी कंधों पर हथियार उठाये..
भुखमरी भी मीडिया की सुखियाँ बनती रही है। कमोबेश हर साल ही विभिन्न साइक्लोन..चक्रवात व तूफान से उड़ीसा की समुद्री तटीय इलाकों में भारी तबाही और बचाव अभियान भी जारी रहते हैं। उड़ीसा की मदद के लिए पुकार और फिर बढ़े हाथ की सुर्खियां भी चलचित्र की तरह आंखों में घूमती जा रही थी।

पारादीप पोर्ट


24 मार्च को उड़ीसा के राज्यपाल से एक घण्टे के संवाद में उन्होंने साफ कर दिया कि अब आदिवासी बहुल उड़ीसा की तस्वीर बदल रही है। उनका सीधा इशारा खत्म होते नक्सलवाद और भुखमरी की तरफ था। बड़े माओवादी व नक्सलवादी नेताओं के लगातार हो रहे आत्मसमर्पण ने केंद्र व राज्य के सामूहिक प्रयासों पर मुहर भी लगाई।

राज्यपाल ने नक्सलवाद की समाप्ति डेट  31 मार्च 2026 का जिक्र भी किया। भारी संख्या में नक्सलियों के सरेंडर व मुख्यधारा में लौटने के लाइव वीडियो ने राज्यपाल के कथन को सही साबित भी किया।

सीफा- मछली उत्पादन व पालन से ब्लू इकोनॉमी की ओर

हालांकि, 22 मार्च को कनेक्टिंग फ्लाइट की वजह से भुवनेश्वर पहुंचने में रात के 9 बज गए। भुवनेश्वर एयरपोर्ट कुछ पुराना-पुराना सा लगा।
उड़ीसा पीआईबी के असिस्टेंट डायरेक्टर महेंद्र जेना अपनी टीम के साथ स्वागत के लिए खड़े थे।  बेशक भुवनेश्वर का एयरपोर्ट बहुत आधुनिक नजर नहीं आया लेकिन सड़कें रात के अंधेरे और दिन के उजाले में अपेक्षाकृत साफ सुथरी नजर आयी। काफी कुछ व्यवस्थित ।

ओडिशा के राज्यपाल के साथ अध्ययन दल


ट्रैफिक नियंत्रित। चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस की संख्या बहुत कम। किसी को किसी से आगे निकलने की होड़ नहीं। चौराहों पर जाम भी नहीं..शहर ही नहीं बल्कि जगन्नाथ पुरी,सूरत व पारादीप की ओर कूच कर रहे वाहन भी नियंत्रित स्पीड के साथ चल रहे।


हाइवे पर वाहन दौड़ाने की कोई होड़ नहीं। कैमरे लगे हैं। और परिवहन विभाग का ऐप चालक को बता रहा है कि स्पीड कब 55 रखनी है और कब 70 -80 किलोमीटर प्रति घन्टा। अगर चालक ने ऐप ऑन नहीं किया हुआ है और वाहन तय स्पीड से अधिक भाग रहा है तो ऑनलाइन चालान का नोटिस तुरन्त डिलीवर हो जाएगा।
उड़ीसा सरकार के ट्रैफिक व गति सीमा को नियंत्रित करने सम्बन्धी यह ऐप बहुत कारगर साबित हो रहा है।

जगन्नाथ पुरी के दर्शन के बाद लौटते हुए चालक कान्हा के मोबाइल पर दो हजार के जुर्माने का संदेश टपक पड़ा।  दरअसल,कान्हा ने ऐप ऑन नहीं किया था। और रात अधिक होने की वजह से वाहन भी ओवर स्पीड था।
इस झटके के बाद सतर्क हुए कान्हा ने लगातार ऐप खोले रखा। और वाहन को कभी 55 तो कभी 70 किमी प्रति घण्टे की स्पीड से आगे नहीं बढ़ाया।
उड़ीसा के यातायात कंट्रोल के इस सिस्टम की समझ आने के बाद बरबस देहरादून व अन्य स्थानों में ताबड़तोड़ दुर्घटना कर रहे वाहनों की याद तो आनी ही थी।

उड़ीसा टूर के दौरान वर्षों पुराने पारादीप पोर्ट प्राधिकरण, कटक का केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ फ्रेश वाटर एक्वा कल्चर (सीफा)की कार्यप्रणाली व बारीकी देखने के बाद आजादी के बाद वैज्ञानिकों व कर्मियों की मेहनत व समर्पण को सलाम तो बनता ही है।
कैसे आजादी के बाद सैकड़ों हेक्टेयर क्षेत्र में फैले संस्थान में हो रहे सतत अनुसंधान में विभिन्न उन्नत प्रजाति के चावल और मछली उत्पादन में अन्य देशों को चुनौती दी जा रही है।

विरासत-रघुराजपुर गांव


ICAR के निदेशक डॉ प्रताप भट्टाचार्य, डॉ सुतापा सरकार ने चावल की विभिन्न प्रजातियों और पहाड़ी इलाके में हो रही खेती का तुलनात्मक ब्यौरा भी पेश किया।

पारादीप पोर्ट ट्रस्ट के डिप्टी चेयरमैन टी वेणुगोपाल और सलाहकार आशीष बोस व बिजनेस हेड साहू ने बंदरगाह से हो रहे मौजूदा आयात-निर्यात का खाका पेश किया।  और आसपास के इलाके की आर्थिकी व 6 लाख पौधों  के रोपण से पर्यावरण संरक्षण की बात भी कही।
बातचीत में यह तथ्य भी उभर कर आया कि जिंदल ग्रुप पारादीप के समीप ही निजी बन्दरगाह का निर्माण कर रहा है।

मछली पालन में नित नए प्रयोग व अन्य देशों से ब्लू इकोनॉमी के क्षेत्र में टक्कर देते हुए हिंदुस्तान की नई तस्वीर पेश की गई। सीफा के निदेशक डॉ प्रताप चन्द्र दास, डॉ शिव शंकर गिरी,डॉ नन्दी, डॉ सावंत, डॉ हिमांशु डे ने एशिया पैसिफिक क्षेत्र के मछली पालनव भारत की भूमिका का विस्तार से जिक्र किया।

विश्वप्रसिद्ध कोर्णाक का सूर्य मंदिर

यह संस्थान 150 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। जहां विभिन्न प्रजाति की मछलियों की वंश वृद्धि व टैगिंग की विधि दिखाई गयी। अन्य देशों की तुलना में देश का मछली उत्पादन में बढ़ रही हिस्सेदारी के तथ्य भी स्लाइड शो के जरिये पेश किए गए।

इधर,  हर दिन पहाड़ देखने वालों के लिए
जगन्नाथ पुरी मंदिर और विशाल समुद्र तट की लहरें किसी विस्मय से कम नहीं थी। तारीफ की बात यह कि दर्शन के लिए कोई वीआईपी लाइन नहीं। इसका अहसास मंदिर परिसर में ही हो गया।

जब तेज तर्रार पुजारी हमारे दल को शार्ट कट रास्ते से ले जा रहा था। मौके पर मौजूद महिला सिपाही ने रोकते हुए कसकर मेरा हाथ पकड़ लिया। और आगे बढ़ने से रोक दिया।
हालांकि, पुजारी के आक्रोश व कड़े तेवर के बाद किसी तरह हाथ छुड़ा भगवान जगन्नाथ जी के दरबार में दाखिल होने में कामयाब रहे। 

जगन्नाथ मंदिर में सभी भक्त घण्टों एक लाइन में खड़े रहे। मंदिर समिति ने वीआईपी और आम भक्तों के बीच कोई सीमा रेखा नहीं खींची है।

कटक का केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान

अध्ययन दल का एक महत्वपूर्ण पड़ाव देश का पहला आत्मनिर्भर हेरिटेज विलेज रघुराजपुर गांव भी था।
देश के आत्मनिर्भर हेरिटेज विलेज रघुराजपुर ने अपनी पारंपरिक कला को जिंदा ही नहीं रखा बल्कि देश दुनिया तक पहुंचाया। 160 परिवारों के इस गांव के हर घर में कलात्मकता के दर्शन होते हैं।

इस गांव ने अपनी पारंपरिक पट्ट चित्र कला के गुरुओं को  पूरा सम्मान देते हुए प्रवेश द्वार पर ही शिल्प गुरु पद्मभूषण डा. जगन्नाथ महापात्रा, ओडिसी नृत्य के गुरु पद्मश्री केलुचरण मोहापात्रा और पद्मश्री मगुनी चरण की मूर्तियां स्थापित की है। गांव के कला सौंदर्य से भरपूर माहौल और जगह-जगह उकेरी गयी कलाकृतियां दूसरे ही जहां की सैर करा देती है। इन कलाकृतियों की देश-विदेश में काफी मांग है। 

कोर्णाक के सूर्य मंदिर की स्थापत्य कला व समय के वैज्ञानिक पहलू में सैकड़ों वर्ष पुराने पारंपरिक व वैज्ञानिक उपायों को साक्षात जमीन पर उतार दिया गया। और कोर्णाक म्यूजियम तो बेहद अविस्मरणीय । इतिहास, परम्परा, ज्ञान, स्थापत्य कला, संकल्प और समर्पण को समेटे।

अध्ययन भ्रमण के पहले दिन ही पीआईबी के एडिशनल डीजी अखिल कुमार मिश्रा ने केंद्रीय योजनाओं के सफल क्रियान्वयन की जानकारी के साथ उड़िया हस्तशिल्प का पटका पहनाकर स्वागत किया। स्वागत का यह पारंपरिक पटका उड़ाना और भोजन के साथ स्थानीय झेनाझिली मिठाई का लगातार साथ बना रहा। चावल अनुसंधान केंद्र के दौरे के आखिरी मोड़ पर नारियल पानी का मीठा स्वाद दून के नारियल स्वाद से बिल्कुल ही जुदा था।

अध्ययन दल,जॉलीग्रांट एयरपोर्ट

खास मौकों पर उड़ीसा में भी उत्तराखंड की कला भी खूब झलकी। पीआईबी देहरादून के सहायक निदेशक संजीव सुन्द्रियाल ने भी राज्यपाल हरि बाबू कमभमपति (Hari Babu Kambhampati) समेत सभी अधिकारियों को उत्तराखंड की पहाड़ी टोपी और प्रतीक चिह्न भेंट कर स्वागत किया। टूर के अंतिम दिन अध्ययन दल से जुड़े सभी पत्रकारों को भी दून के पीआईबी कार्यालय में पारंपरिक चित्र भेंट कर सफल यात्रा की बधाई दी गयी।

उड़ीसा के दौरे में यह बात भी मुख्य तौर पर नोटिस में आई। दुकानों ,पोस्टर और होर्डिंग्स में उड़िया भाषा ही देखने को मिली। हिंदी तो नजर आयी। अलबत्ता,   कहीं कहीं अंग्रेजी अवश्य दिखी। शहरों की दूरी को स्पष्ट करते होर्डिंग में अंग्रेजी जरूर मौजूद रही।

रात्रि में जगन्नाथ पुरी का समुद्री तट

लेकिन कोर्णाक सूर्य मंदिर इलाके में बेज़ुबानों के प्रति सहृदयता ने मन को मोहा। गर्मी बढ़ चली थी और भूख भी। भोजनालय के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ पानी से लबालब बर्तन। पूछने पर बताया कि स्ट्रीट डॉग और पक्षियों के लिए यह विशेष व्यवस्था की गई है।
मुझे देहरादून की वो गलियां याद हो आयी। जहां पशु प्रेमी व एनजीओ प्यास बुझाने के लिए  छोटे-बड़े मिट्टी के बर्तन रखते हैं। और कुछ दिन बाद पढ़े लिखों के एजुकेशन हब देहरादून में मौजूद ‘चोर’ मूक जानवरों के पानी के बर्तन चुरा कर अपने गार्डन के पौधों के लिए गमले बना लेते हैं।
यह सवाल भी बारम्बार कौंधता रहा कि कई मामलों में उत्तराखंड को तेजी से बदल रहे ओडिशा से भी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है..

जगन्नाथ पुरी मंदिर


वापसी की घड़ियां करीब आ चुकी थी। जगन्नाथ पुरी मंदिर के जयघोष के बीच और समंदर की शोर मचाती लहरों से फिर फुर्सत में मिलने का मन ही मन वादा किया।


26 मार्च को भुवनेश्वर की अल्ल सुबह की उड़ान में बैठते ही कोर्णाक के सूर्य मंदिर और जगन्नाथ पुरी के रेतीले झागयुक्त समुद्री तट को छू कर विमान की खिड़की से अंदर घुस रही सूर्यकिरणों ने कान में हौले से कुछ यूं कहा…तुम फिर आना…तुम हमारे ओडिशा जरूर आना….

लेखक- पारादीप का समुद्री तट

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *