बढ़ाने होंगे रचनात्मकता के असवर: प्रबोध उनियाल
अविकल उत्तराखंड
देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने अंकुर मंच के सहयोग ‘बच्चे, स्कूल एवं रचनात्मकता’ विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया. इस मौके पर और बच्चों के रचनात्मक गतिविधियों पर केंद्रित अंकुर पत्रिका का लोकार्पण किया गया.
गोष्ठी में संपादक, प्रकाशक और बाल साहित्य के अध्येता प्रबोध उनियाल ने कहा कि रचना शील समाज कभी संतुष्ट नहीं होता। वह तो सदैव बेहतरी के लिए विचारशील और सक्रिय बना रहता है। ऐसा समाज यथार्थ का अध्ययन करते हुए भविष्य को और प्रगतिशील बनाने का निरंतर प्रयास करता रहता है।
बच्चे, शिक्षक, स्कूल और रचनात्मकता ही किसी स्वस्थ समाज के चार सषक्त स्तम्भ हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्कूल में रचनात्मकता के अवसर बढ़ाए जाएं।
‘बच्चों का नज़रिया’ के पूर्व संपादक एवं काव्यांश प्रकाशन के प्रकाशक प्रबोध उनियाल दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र तथा अंकुर एक सृजनात्मक पहल के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित ‘बच्चे, स्कूल एवं रचनात्मकता’ विषयक विचार गोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। उनियाल ने कहा यह समय मिलकर सोचने और समझने का है। नई पीढ़ी की आँखों में बेहतर कल के लिए नए और कई महत्वाकांक्षी सपने हैं। उनके सपनों को साकार करने के लिए हमें बड़े अवरोधक नहीं सहायक की तरह उनका साथ देना होगा। आज मैदान घर के आँगन में सिमट गए हैं। पढ़ाई, ट्यूशन, कोचिंग के बीच बालमन गुमसुम और उदास हो गया है। बच्चों की पीठ भारी-भरकम बस्ते से लदी है। प्रतिस्पर्धा के साथ अनिष्चितता बच्चों को व्यथित कर रहा है। पाठ्यक्रम का बोझ उन्हें परेशान करता है। ये भयावह स्थिति है। ऐसे में अभिभावकों, शिक्षकों, लेखकों को इस दौर के बच्चों में सद्विचार, कल्पना और नवसृजन के लिए रचनात्मकता के अवसर देने होंगे। ताकि वे बेहतर नागरिक की दिषा में आगे बढ़ें।

अंकुर के अध्यक्ष एवं शिक्षक मोहन चौहान ने कहा कि हम षिक्षकों का मानना है कि रचनात्मकता ही है जो हमें अन्य जीवों से अलग करती है। रचनात्मकता साहित्य,कला, संगीत तक सीमित नहीं है। यह कौशल है। छात्रों को लीक से हटकर सोचने और उनकी समस्याओं,उलझनों को सुलझाने का हुनर भी है। रचनात्मकता से ही जटिलता सरलता में बदली जा सकती है। हमारा मानना है कि अभिभावकों, छात्रों और शिक्षकों की त्रिवेणी स्वच्छ और निर्मल समाज स्थापित कर सकती है। प्रत्येक छात्र रचनात्मकता के सहारे स्वतंत्र सोच का निर्माण करते हुए मौलिक कार्यों की ओर बढ़ सकता है। उन्होंने बताया कि अंकुर इसी दिशा में एक प्रयास करता रहा है। विविध गतिविधियों के माध्यम से बच्चों की मौलिक अभिव्यक्ति को उभारने का विनम्र प्रयास भर है। असिस्टेंट प्रोफेसर एवं कवयित्री रेखा चमोली ने कहा कि बुनियादी कक्षाओं में नौनिहालों को लिखने की यात्रा कराने से पहले बोलने,सुनने और पढ़ने के अधिकाधिक अवसर देना बेहद ज़रूरी है। ऐसा जिन विद्यालयों में होता रहा है वहाँ के विद्यार्थी समाज की मुख्यधारा में स्वस्थ और सकारात्मक योगदान देते हैं। आज के दौर में तो मानवता और संवेदनशीलता की अत्यधिक आवष्यकता है। रचनाशील समाज संकुचित हो रहा है और विध्वंसात्मक सोच हावी हो रही है। ऐसे में आपसी सौहार्द, हम की भावना को बढ़ाने के लिए रचनात्मक कार्यो और गतिविधियों की बहुत आवष्यकता है।
संचालन कर रहे शिक्षक प्रदीप बहुगुणा ‘दर्पण’ ने कहा कि किसी भी देश की प्रगति के लिए पढ़ा-लिखा समाज अहम् भूमिका निभाता है। लेकिन यह भी सच है कि एक सुंदर, विकसित सभी के लिए सुलभ सुविधाओं से युक्त समाज को बनाने में रचनाषीलता सबसे ज़रूरी तत्व है। पत्रिका की छात्र संपादक रही प्रियांशी ने कहा कि अंकुर पत्रिका रचना सामग्री का पुलिंदा मात्र नहीं है। प्रियांशी ने बताया कि यह शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों की साथ-साथ की गई यात्रा है। लेखन कौषल को बनाने और संवारने में शिक्षकों की पुरजोर कोशिस का कोई मोल नहीं है।

साहित्यकार एवं शिक्षक मनोहर चमोली ‘मनु’ ने कहा कि अंकुर पत्रिका के चौथे अंक में राजकीय इंटर कॉलेज खरसाड़ा के 173 विद्यार्थियों ने बतौर रचनाकार रचनाएं लिखीं। उन्होंने कहा कि अंकुर से जुड़े षिक्षक विद्यालयों में बाल लेखन कार्यशालाएं आयोजित करते हैं। उन्हें विभिन्न विधाओं से परिचित कराते हैं। हस्तलिखित पत्रिका के साथ यदि संभव होता है तो विद्यालयी स्तर पर पत्रिका के प्रकाशन में सहयोग करते हैं। यह विद्यार्थियों की कल्पना, संवेदना और अभिव्यक्ति का अभिलेखीकरण तो होता ही है साथ ही में नई पीढ़ी पढने-लिखने की ओर उन्मुख होती है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी अपनी अभिव्यक्ति को प्रकाशित होता हुआ देखकर प्रोत्साहित होते हैं।
शिक्षक एवं चाय पे चर्चा के स्तंभकार सतीश जोशी ने कहा कि रचनात्मक लेखन छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों के मध्य एक खास कड़ी का काम करता है। समुदाय में पढ़ने-लिखने का महत्व हर काल में रहा है। यह अब और भी ज़रूरी हो गया है।
वक्ताओं ने माना कि सूचना तकनीक के इस युग में रचनात्मक लेखन आवश्यक है। किताब से पढ़ना और हाथ से लिखना इस आदत में लगातार कमी आती जा रही है। इसे बनाए रखने के लिए भी पत्रिकाओं का प्रकाशन होना ही चाहिए।
इस अवसर पर कार्यक्रम के आरंभ में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने केंद्र के उद्देश्यों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि आज बच्चों में मौलिक लेखन की आदत विकसित करना चुनौतीपूर्ण तो है पर इसे करना होगा।
चर्चा से पूर्व अंकुर पत्रिका का लोकार्पण भी किया गया। लोकार्पण अवसर पर अंकुर टीम के साथ-साथ दून के साहित्यकार मुकेश नौटियाल, राजेन्द्र पुरोहित,राकेश पोखरियाल, जन कवि अतुल शर्मा, रंजना शर्मा, रेखा शर्मा, डॉ॰ ललिता प्रसाद, धमेन्द्र आर्य, सीमा चौहान, विजय लक्ष्मी सेमल्टी, सुरेंद्र दत्त सेमल्टी, अशर्फी ठाकुर, इंद्रेश नौटियाल, विजय भट्ट, गीता, प्रवीन भट्ट, सुनीता मोहन, कीर्ति भण्डारी, सुन्दर सिंह बिष्ट भी उपस्थित रहे. कार्यक्रम में विद्यार्थी, अभिभावक, शिक्षक और रचनाकारों ने भाग लिया और अपने विचार व्यक्त किए।



