राज्य में पेट स्कैन की सुविधा वाला पहला सरकारी स्वास्थ्य संस्थान है एम्स
मरीजों का रखा जा रहा रिकाॅर्ड, प्रतिवर्ष हो रही कैंसर रजिस्ट्री
एम्स ऋषिकेश। अभी तक घातक बीमारी में शामिल कैंसर अब लाइलाज नहीं है। बशर्ते कि कैंसर अपने अंतिम चरण में न पहुँचा हो। आधुनिक उच्च तकनीकों का इस्तेमाल करने से इसका इलाज अब पहले की अपेक्षा आसान हो गया है। एम्स ऋषिकेश में कैंसर की जांच और इलाज की सभी आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद हैं। इनमें उच्च तकनीक आधारित पेट स्कैन जैसी जांच भी शामिल है।
कैंसर से लड़ने और इस पर विजय पाने के लिए दुनिया भर में नित नए चिकित्सीय उपाय और अनुसंधान हो रहे हैं। रोबोटिक सर्जरी जैसी नयी तकनीक से तो कैंसर के इलाज में विशेष क्रांतिकारी बदलाव आया है। रोबोटिक सर्जरी में सर्जन को 10 गुना बड़ा त्रिआयामी चित्र दिखता है और इलाज के दौरान गलती की संभावना बहुत कम होने से इलाज बेहद सटीक हो जाता है। हां, आमतौर पर कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी और सर्जरी का ही उपयोग किया जाता है। एम्स ऋषिकेश कैंसर मरीजों के इलाज में न केवल विकसित स्वास्थ्य सुविधाओं को उपयोग कर रहा है अपितु यहां कैंसर मरीजों का पूरा रिकाॅर्ड भी रखा जाता है। इसे कैंसर रजिस्ट्री का नाम दिया गया है। रिकॉर्ड को हॉस्पिटल बेस और पोपुलेशन बेस दोनों स्तर पर रखा जा रहा है।
हेमेटोलाॅजी विभाग के हेड प्रो. उत्तम नाथ बताते हैं कि कैंसर के शुरुआती चरण में पता लगाना आधी लड़ाई जीतने जैसा है। उन्होंने बताया कि दो कैंसर कभी एक जैसे नहीं होते। ऐसे में जेनेटिक प्रोफाइलिंग कारगर साबित होती है। इसमें बेहतर और प्रभावी उपचार, कम दुष्प्रभाव और रोग को पूरी तरह से खत्म करने की अधिक संभावना होती है। इसके अलावा विकिरण चिकित्सा, रोबोटिक सर्जरी और इम्यूनोथेरेपी जैसी तकनीकें भी कैंसर के इलाज को आसान बना रही हैं। ये सभी सुविधाएं एम्स ऋषिकेश में उपलब्ध हैं।

विभाग के एसो0 प्रो. डाॅ. दीपक सुन्दरियाल ने बताया कि भारत में कैंसर एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभर रहा है। पिछले तीन दशकों में देश में कैंसर की घटनाओं, प्रसार और इससे होने वाली मृत्यु दर में निरंतर वृद्धि देखी गई है। उन्होंने बताया कि पुरुषों में मुंह का (ओरल) कैंसर, फेफड़ों का कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर के मामले ज्यादा हैं जबकि महिलाओं में स्तन कैंसर, गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर और अंडाशय (ओवेरियन) कैंसर के मामले ज्यादा उभर कर आ रहे हैं। डाॅ. सुन्दरियाल ने बताया कि उत्तराखंड में कैंसर के मामलों में पुरूषों में फेफड़ों का कैंसर, मुंह का कैंसर और जठरांत्र (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल) कैंसर सामान्य हैं। जबकि महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे अधिक पाया जाता है। दूसरा स्थान सर्वाइकल कैंसर का है।
पेट स्कैन (पॉजिट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी) मशीन एम्स में पिछले वर्ष अप्रैल 2025 में स्थापित की गयी थी। यह एक उन्नत इमेजिंग परीक्षण है, जो शरीर के अंगों की कार्यप्रणाली और कोशिकाओं की गतिविधि का पता लगाता है। यह कैंसर कोशिकाओं का पता लगाने, ट्यूमर के फैलने की जांच करने और उपचार के बाद परिणाम देखने के लिए सबसे प्रभावी तकनीक है। न्यूक्लियर मेडिसिन की हेड प्रो. मनीषी नारायण ने इस बारे मे बताया कि पिछले एक वर्ष के दौरान 1590 लोगों ने पेट स्कैन सुविधा का लाभ उठाया है। उन्होंने बताया कि प्रति माह लगभग 150 रोगी यह जांच करवा रहे हैं।
’कैंसर की रोकथाम के लिए समय पर पहचान और बेहतर इलाज बहुत जरूरी है। एम्स ऋषिकेश कैंसर की रोकथाम, बीमारी की जांच, निदान और इलाज के लिए एकीकृत दृष्टिकोण अपनाते हुए इसके प्रभाव को कम करने के लिए दृढ़संकल्पित हैं। इसके अलावा संस्थान, कैंसर जागरूकता बढ़ाने के लिए भी नियमित स्तर पर जागरूकता के कार्यक्रम चला रहा है।’’
-प्रो. मीनू सिंह, कार्यकारी निदेशक, एम्स ऋषिकेश।
वेलनेस क्लिनिक शुरू
एम्स, ऋषिकेश में एकीकृत कैंसर वेलनेस क्लिनिक का विधिवत शुभारंभ किया गया। बताया गया है कि इस क्लिनिक का संचालन इंटीग्रेटिव मेडिसिन एवं आयुष विभाग, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के सहयोग से करेगा। क्लिनिक का समग्र कैंसर रोगियों की देखभाल में महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। इस अवसर पर निदेशक एवं सीईओ एम्स, प्रोफेसर डॉ. मीनू सिंह ने बताया कि यह क्लिनिक आधुनिक ऑन्कोलॉजी को भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों—योग, प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्ध और हर्बल चिकित्सा—के साथ जोड़कर रोगियों और उनके परिजनों को व्यापक सहयोग प्रदान करेगा।
इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत जो शुद्धता, दृढ़ता और उपचार के प्रतीक पवित्र तुलसी पौधे पर जलार्पण से हुई, इसके पश्चात मुख्य अतिथि कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ प्रो. डॉ. मीनू सिंह, ने क्लिनिक का वर्चुअल उद्घाटन किया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि द्वारा आयुष न्यूज़लेटर: “गंगा प्रवाह” (खंड 1, अंक 2) का विमोचन किया गया। बताया गया है कि न्यूज लेटर में विभाग की शैक्षणिक, नैदानिक और जनसंपर्क गतिविधियों को दर्शाया गया है।
आयोजन समिति की ओर से कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथियों और वक्ताओं को शॉल और पवित्र तुलसी पौधे भेंट किए गए।
इस अवसर पर निदेशक प्रोफेसर डॉ. मीनू सिंह ने आयुष विभाग द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना की और कैंसर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, योग, सिद्ध और हर्बल चिकित्सा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इन पद्धतियों के सिद्ध लाभ हैं और इन्हें पर और अधिक गहराई से शोध की आवश्यकता है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने योग क्रियाओं के शारीरिक संरचना पर सकारात्मक प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित बताया है। यह भी कहा कि आधुनिक विज्ञान में चर्चित अवधारणाएं जैसे E=mc² और क्वांटम फिजिक्स में अध्यात्मिक विचार भारतीय पारंपरिक चिकित्सा में पहले से मौजूद हैं और इन पर व्यवस्थित शोध किया जा सकता है।
उन्होंने टाटा मेमोरियल अस्पताल के अध्ययन का उल्लेख भी किया, जिसमें पाया गया कि जीवनशैली में सुधार से कैंसर की प्रगति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने युवा शोधकर्ताओं और रेजिडेंट डॉक्टरों को इस क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया और पारंपरिक एवं आधुनिक चिकित्सा के संगम को त्रिवेणी संगम की संज्ञा दी।
संस्थान के संकायाध्यक्ष अकादमिक प्रोफेसर डॉ. सौरभ वार्ष्णेय ने इस पहल को रोगियों के कल्याण के लिए लाभकारी बताया। उन्होंने कहा कि कैंसर रोगी का उपचार अर्थात समग्र मानव के मानसिक-शारीरिक- भावनात्मक आयामों का उपचार है । उन्होंने जोर दिया कि एकीकृत पद्धति और भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली कैंसर उपचार में महत्वपूर्ण योगदान देती है। डीन एकेडमिक प्रो. वार्ष्णेय ने बताया कि आहार, योग, ध्यान, स्वस्थ्य के प्रति जागरूकता जैसी विधियां तनाव प्रबंधन और रोगी के देखभाल में अत्यंत प्रभावी हैं। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैंसर उपचार केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं बल्कि डॉक्टर और रोगी, विज्ञान और सहानुभूति, रोगी और आशा के बीच संवाद है। उन्होंने उद्धृत किया: “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत” – अर्थात विजय या पराजय मन में निहित है।
डॉ. मोनिका पठानिया (विभागाध्यक्ष, आयुष एवं इंटीग्रेटिव मेडिसिन) ने नियमित इंटीग्रेटिव क्लिनिक को विशेषीकृत कैंसर वेलनेस क्लिनिक में विस्तारित करने पर विचार साझा किए। उन्होंने क्लिनिक के उद्देश्यों और कार्यप्रवाह को प्रस्तुत किया।
डॉ. मोनिका पठानिया ने रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग को इस संयुक्त उपक्रम में सबसे पहले जुड़ने के लिए आभार व्यक्त किया और कहा कि विभाग ने उत्साहजनक प्रतिक्रिया दी है। सेवाएं प्रारंभ में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. दीपा जोसफ की देखरेख में दी जाएंगी और शीघ्र ही अन्य विभागों तक विस्तारित की जाएंगी, जो कैंसर रोगियों का उपचार करते हैं।
उन्होंने बताया कि पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं और अब समय आ गया है कि इन्हें व्यवहार में लाकर रोगी-केंद्रित देखभाल प्रदान की जाए। उनका जोर वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न करने और विभिन्न विभागों के साथ एकीकृत करने पर है। योग और सिद्ध चिकित्सा को सहायक देखभाल के रूप में दिया जाएगा, जबकि प्राथमिक उपचार आधुनिक चिकित्सा ही रहेगा। यहां आधुनिक चिकित्सा के कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर और आयुष चिकित्सक मिलकर रोगियों के स्वास्थ्य हित में कार्य करेंगे। यह विभाग विभिन्न विभागों के बीच सेतु का कार्य करेगा।
इस अवसर पर कुछ संकाय सदस्यों ने, जो कि स्वयं कैंसर से ग्रसित रहे हैं और अब पूरी तरह से ठीक हो चुके हैं, उन्होंने यह बताते हुए अपने अनुभव साझा किए, कि योग और एकीकृत चिकित्सा ने उन्हें कैंसर चुनौतियों का सामना करने में आत्मविश्वास और दृढ़ता दी।
प्रमाण-आधारित योग और ध्यान कार्यक्रम
सिद्ध चिकित्सा जैसे कायाकल्प, वर्मम और ठोक्कनम
जीवनशैली मे बदलाव जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और उपचार के दुष्प्रभाव को नियंत्रित करता है |
इस अवसर पर डॉ. सोनिया सोफता (वरिष्ठ परामर्शदाता रेडियोलॉजिस्ट) एवं कैंसर सर्वाइवर, ने एक प्रेरणादायक व्याख्यान दिया। जिसमें उन्होंने कैंसर देखभाल में श्वसन अभ्यास (Breathwork) और योग के वैज्ञानिक प्रमाणों पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए, जिसमें दृढ़ता और रोगमुक्ति (Remission) की यात्रा शामिल थी। इस दौरान उन्होंने एक Breathwork Meditation Session भी आयोजित किया, जिसमें प्रतिभागियों को शांति और संतुलन का अनुभव कराया। कार्यक्रम के तहत उन्होंने Evidence-based Yoga Medicine पर व्याख्यान दिया, जिसमें योग और ध्यान को कैंसर उपचार के पूरक के रूप में प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में लगभग 100 से अधिक लोगों ने शिरकत की। जिनमें विभिन्न विभागों के प्रमुख, वरिष्ठ संकाय सदस्य, छात्र और शोधकर्ता शामिल थे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. श्रीलॅय मोहंती (एसएमओ, आयुष) डॉ. श्वेता मिश्र (medical officer-योग), डॉ. मिरुनालिनी (Medical Officer- सिद्धा ) ने संयुक्तरूप से किया।
कार्यक्रम में मेडिकल सुपरिटेंडेंट प्रोफेसर डॉ. सत्यश्री बालिजा तथा विभिन्न विभागों के प्रमुखों ने भागीदारी की।

