निदेशक के आदेशों की अनदेखी या प्रशासनिक भ्रम?
चमोली में लेखा कर्मचारियों की कार्यमुक्ति अटकी
अविकल उत्तराखंड
देहरादून। उत्तराखंड में लेखा विभाग का एकीकरण हो गया लेकिन कायदे कानून अभी तक एक नहीं हो पाए हैं। ताजा मामला चमोली जिले में सामने आया है जहां लेखा निदेशालय एक तरफ और जिले के अफसर दूसरी ओर नजर आ रहे हैं। यह एक विचित्र सी स्थिति है कि एकीकरण के बाद भी अगर एकरूपता नहीं है तो इन हाथी के दांतों का उपयोग क्या है।
गौरतलब है कि उत्तराखंड सरकार ने लेखा संवर्ग का कैडर एकीकरण किया तो उम्मीद जगी थी कि पूरे प्रदेश में एक जैसी व्यवस्था लागू होगी। एकीकरण के बाद सभी प्रशासनिक अधिकार निदेशक, विभागीय लेखा को दे दिए। उसके बाद लेखा निदेशक ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए पदोन्नति और स्थानांतरण के आदेश जारी किए लेकिन विडम्बना यह है कि कई विभागों में यह एकरूपता धरातल पर नहीं उतर पाई और जिलों के अधिकारियों ने अपने हिसाब से व्यवस्थाएं देनी शुरू कर दी। नतीजतन एकीकरण और एकरूपता की बात खारिज सी हो गई।
जानकारी के मुताबिक कई विभाग लेखा कर्मचारियों को रिलीव नहीं कर रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण चमोली जिले में दिख रहा है जहां मुख्य विकास अधिकारी, चमोली द्वारा उत्तराखण्ड शासन के शासनादेश संख्या 210176/ई-46821/2024 दिनांक 09.05.2024 एवं 211237/2024 दिनांक 15.05.2024 तथा निदेशक, विभागीय लेखा, उत्तराखण्ड द्वारा निर्गत आदेशों का अनुपालन नहीं किया है।
शासन द्वारा जारी स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद चमोली जिले में दो लेखाकार क्रमशः सुमित रावत एवं सुश्री बबीता रतूड़ी को निदेशक, विभागीय लेखा द्वारा निर्गत कार्यमुक्ति आदेशों के अनुरूप कार्यमुक्त नहीं किया जा रहा है।
निश्चित रूप से यह शासनादेशों एवं सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्गत आदेशों की अवहेलना का द्योतक है।
लेखा संवर्ग के कार्मिकों ने इस सम्बन्ध में निदेशक ने वित्त सचिव से हस्तक्षेप कर सभी विभागों को बाध्य करने का अनुरोध किया कि वे आदेशों का पालन करें। अन्यथा एकीकरण की बात हवा में उड़ जाएगी। चमोली में यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई, यह अपने आप में हैरान करने वाला मामला है।
निदेशक लेखा ने जब शासनादेश के अनुरूप व्यवस्था दे दी तो उसमें अनावश्यक हस्तक्षेप कई गलतफहमियां पैदा करने का सबब बन सकता है। देखना यह होगा कि इस सम्बन्ध में “भूल सुधार” कब तक हो पाएगा।



