कांग्रेस के चुनावी टैंक ने टौंस पुल के 16 करोड़ पर दागे गोले

हरक बोले, मैं 2 करोड़ में इससे अच्छा पुल बना देता

कंस्ट्रक्शन कंपनी और भाजपा नेत्री के सम्बन्धों पर डाला ‘प्रकाश’

टौंस पुल पर सवाल-जवाब का ट्रैफिक जारी

अविकल थपलियाल

देहरादून। दून की टौंस नदी पर 16 करोड़ की लागत से बने अहम पुल की मरम्मत के बाद यातायात बहाल होने के साथ आरोपों और सवालों का ट्रैफिक अभी भी जारी है।

28 जुलाई को इस पुल की एप्रोच रोड के धंसने के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बड़े नेता हरक सिंह रावत ने भी गोला दाग दिया। अपने चुटीले व गुदगुदाने वाले व्यंग्यात्मक राजनीतिक बयानों से सुर्खियां बटोरने वाले हरक सिंह ने पुल की 16 करोड़ की लागत पर गम्भीर सवाल उठा दिए।

भाजपा कार्यकाल में लालढांग-चिल्लरखाल मोटर मार्ग पर बिना टेंडर के आधे अधूरे पुलों (एक/दो) के ‘निर्माता’ (2017-22) रहे पूर्व मंत्री हरक सिंह ने कह दिया कि वे इस पुल को दो करोड़ में बना देते। हरक सिंह ने कहा कि इस पुल के निर्माण में धनराशि का दुरुपयोग व गुणवत्ता की अनदेखी की गई। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि इस पुल के निर्माण में काफी गड़बड़ी की गई है।
हरक सिंह ने सवालिया अंदाज में कहा कि 14 करोड़ कहाँ गए ? उन्होंने कन्स्ट्रक्शन कंपनी और भाजपा नेत्री के सम्बन्धों को भी उजागर किया। हरक ने कहा कि भाजपा ने हिमालय, भगवान राम और विष्णु को भी अपवित्र कर दिया।

बीते 28 जुलाई को प्रेमनगर के टौंस पुल की एप्रोच रोड क्या धंसी, उत्तराखंड की राजनीति को एक नया मुद्दा मिल गया। अब यह सीधे-सीधे चुनावी लाभ-हानि गणित में शामिल हो चुका है।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर प्रशासन और लोक निर्माण विभाग ने तेजी दिखाते हुए एप्रोच रोड दुरुस्त कर दी। सरकार इसे त्वरित कार्रवाई बता रही है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि फिलहाल केवल “घाव पर पट्टी” बांधी गई है, इलाज अभी बाकी है।
इसी बीच, पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत ने ऐसा बयान दिया जिसने सियासी बहस को और धार दे दी। उनका दावा है कि जिस पुल के निर्माण पर करीब 16 करोड़ रुपये खर्च होने की बात कही जा रही है, वही पुल दो करोड़ रुपये से भी कम में बन सकता है। इस बयान ने निर्माण लागत, गुणवत्ता और सरकारी खर्च पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजनीतिक दृष्टि से यह मुद्दा भाजपा सरकार के लिए असहज हो गया है। असहज इसलिए भी कि पुल का निर्माण करने वाली कम्पनी अहम भाजपा नेत्री के पति की बताई जा रही है। हरक सिंह ने कहा कि इस कम्पनी का पता और भाजपा नेत्री के घर का पता एक ही है।
हरक सिंह ने कहा कि इससे साफ जाहिर है कि 16 करोड़ के पुल में कई भाजपाइयों के हाथ रंगे हुए हैं।

बहरहाल, इस नए मुद्दे के सामने आने से
2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी कांग्रेस ने हाथों हाथ लपक लिया है।।
इसे सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और कथित फिजूलखर्ची का प्रतीक बनाकर जनता के बीच ले जाने की कोशिश कर रही है।
सोशल मीडिया में भी पुल की एप्रोच रोड और सौंग नदी, मालदेवता के समीप एक अन्य सड़क पर भी हुए बड़े गड्ढे को लेकर खूब चटखारे लिए जा रहे हैं।

हदूसरी ओर सरकार के सामने चुनौती होगी कि वह तकनीकी तथ्यों और लागत का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक कर विपक्ष के आरोपों का जवाब दे।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अधिक राजनीतिक दबाव लोक निर्माण मंत्री पर दिखाई दे रहा है। विभाग पहले ही निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर विपक्ष के निशाने पर रहा है और अब टौंस पुल प्रकरण ने उनकी जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में यदि यह मुद्दा विधानसभा से लेकर सड़क तक गूंजा, तो लोनिवि मंत्री के लिए राजनीतिक मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है।

एप्रोच रोड में जलभराव से धंसी मिट्टी- नहीं थमे सवाल

टौंस पुल की एप्रोच रोड धंसने की घटना की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में पुल की मुख्य संरचना को सुरक्षित बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार पुल को किसी प्रकार का संरचनात्मक नुकसान नहीं पहुंचा है।
समस्या एप्रोच रोड के नीचे वर्षाजल के रिसाव और मिट्टी के बह जाने (स्कॉरिंग/वॉशआउट) के कारण उत्पन्न हुई, जिससे सड़क का हिस्सा धंस गया।
जांच में यह भी सामने आया कि पुल की संरचना सुरक्षित होने के कारण तत्काल मरम्मत कर यातायात बहाल किया जा सका। विभाग ने भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जल निकासी व्यवस्था को और मजबूत करने तथा एप्रोच की स्थायी सुरक्षा के उपाय करने की आवश्यकता बताई है।

हालांकि तकनीकी रिपोर्ट ने पुल की मजबूती पर राहत दी है, लेकिन राजनीतिक विवाद थमने के आसार नहीं हैं। विपक्ष का तर्क है कि यदि जल निकासी और एप्रोच की डिजाइन पर्याप्त होती तो ऐसी स्थिति ही पैदा नहीं होती। वहीं सरकार रिपोर्ट का हवाला देकर निर्माण को सुरक्षित बता रही है।
चुनावी माहौल में यह मामला अब केवल एक पुल का नहीं, बल्कि सरकारी परियोजनाओं की गुणवत्ता, निगरानी और जवाबदेही का प्रतीक बनता जा रहा है।
यदि भाजपा सरकार समय रहते तकनीकी रिपोर्ट और प्रस्तावित स्थायी समाधान को पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक नहीं करती, तो विपक्ष इसे 2027 के चुनावी अभियान में प्रमुख मुद्दों में शामिल करने की कोशिश करेगा।

(खबर लिखे जाने तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई )

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