जौनपुर-रंवाई को एसटी दर्जा दिलाने की मांग ने पकड़ा जोर

बोले, टुकड़ों में नहीं, पूरे क्षेत्र को मिले जनजातीय अधिकार

सात दशक पुरानी मांग पर एकजुट हुए जनप्रतिनिधि

अविकल उत्तराखंड

मसूरी। उत्तराखंड में जौनपुर-रंवाई को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है। मसूरी में आयोजित बैठक में जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने स्पष्ट संदेश दिया कि यदि सरकार इस दिशा में पहल करती है तो उसका लाभ पूरे जौनपुर-रंवाई क्षेत्र को मिलना चाहिए। वक्ताओं ने इसे 1952 से लंबित न्याय का सवाल बताते हुए व्यापक जनआंदोलन का संकेत दिया।
जौनपुर-रंवाई को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिलाने की लंबे समय से चली आ रही मांग को लेकर मसूरी टाउन हॉल में आयोजित संयुक्त बैठक में क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने एकजुटता दिखाई।

बैठक में निर्णय लिया गया कि अब इस मुद्दे को गांव-गांव तक ले जाया जाएगा और शीघ्र ही एक बड़ी महापंचायत आयोजित कर आंदोलन की अगली रणनीति तय की जाएगी।

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि जौनपुर-रंवाई की सामाजिक संरचना, संस्कृति, लोक परंपराएं और बोली जौनसार-बावर से काफी समानता रखती हैं। इसके बावजूद यह क्षेत्र आज तक अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर है। उनका कहना था कि यदि सरकार एसटी दर्जा देने पर विचार करती है तो यह लाभ किसी सीमित हिस्से तक नहीं, बल्कि पूरे जौनपुर-रंवाई क्षेत्र को मिलना चाहिए।

पूर्व पालिकाध्यक्ष मनमोहन सिंह मल्ल ने कहा कि इस मांग के समर्थन में ऐतिहासिक और सामाजिक तथ्यों को व्यवस्थित रूप से सरकार के समक्ष रखा जाएगा। इसके लिए इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों और विषय विशेषज्ञों की राय भी ली जाएगी।

जौनपुर प्रधान संघ के अध्यक्ष प्रदीप कवि और जिला पंचायत सदस्य जोत सिंह रावत ने कहा कि यह केवल आरक्षण का विषय नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। इसलिए जनसमर्थन बढ़ाने के लिए क्षेत्र में लगातार बैठकें आयोजित की जाएंगी और जल्द ही महापंचायत की तिथि घोषित की जाएगी।

बैठक में यह भी बताया गया कि किसी क्षेत्र या समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का अंतिम निर्णय केंद्र सरकार की अनुशंसा, संसद की मंजूरी और राष्ट्रपति की अधिसूचना के बाद ही प्रभावी होता है।

जौनपुर-रंवाई को एसटी सूची में शामिल करने की मांग नई नहीं है। क्षेत्र के सामाजिक संगठन और जनप्रतिनिधि पिछले कई दशकों से यह मुद्दा उठाते रहे हैं। समय-समय पर राज्य और केंद्र सरकार को ज्ञापन भेजे गए, जनसभाएं हुईं और राजनीतिक दलों ने भी चुनावी घोषणाओं में इस विषय का उल्लेख किया, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका।

उत्तराखंड में इससे पहले जौनसार-बावर क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बाद जौनपुर-रंवाई के लोगों ने भी समान सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए अपने क्षेत्र को भी उसी श्रेणी में शामिल करने की मांग लगातार उठाई है। यही तर्क इस आंदोलन का आधार रहा है।

गौरतलब है कि यह विषय संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा है। एसटी दर्जा देने का अंतिम निर्णय केंद्र सरकार, संसद और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही लागू होता है।

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