स्वतंत्रता के 79 वर्ष-एक असाधारण यात्रा
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद सिंह बिष्ट की कलम से
अविकल उत्तराखंड
15 अगस्त, 2026 को भारत अपना 79वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। प्रत्येक भारतीय के लिए यह गर्व का अवसर है। आठ दशकों से भी कम समय में हमारे गणराज्य ने एक असाधारण यात्रा तय की है—खाद्यान्न की कमी से खाद्य सुरक्षा तक, विदेशी तकनीक पर निर्भरता से वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति बनने तक और एक कमजोर अर्थव्यवस्था से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक शक्तियों में शामिल होने तक। आज भारत केवल वैश्विक मामलों में भागीदारी नहीं कर रहा, बल्कि उन्हें दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
लेकिन हर स्वतंत्रता दिवस हमसे एक ऐसा सवाल भी पूछता है, जिसका उत्तर कोई आर्थिक आंकड़ा नहीं दे सकता:
क्या हम केवल एक समृद्ध राष्ट्र बने हैं, या एक मजबूत सभ्यता भी बने हैं?
किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद, सैन्य क्षमता या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती। उसकी असली शक्ति उसके नागरिकों के चरित्र, संस्थाओं की विश्वसनीयता और उसके युवाओं के आत्मविश्वास में निहित होती है।
युवा भारत की बेचैनी
युवा भारतीयों में बढ़ती बेचैनी को केवल अधीरता मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। परीक्षाओं, भर्तियों, रोजगार या पारदर्शिता को लेकर होने वाले हर आंदोलन के पीछे एक गहरी चिंता छिपी है—कि योग्यता को न्याय मिले और संस्थाओं पर विश्वास बना रहे।
युवा केवल नौकरियाँ नहीं मांग रहे हैं; वे निष्पक्षता मांग रहे हैं।
जिस राष्ट्र का युवा अपनी व्यवस्था पर विश्वास खो देता है, वह अपने भविष्य की नींव को कमजोर कर देता है।
शिक्षा, विचारक पैदा करे
लेकिन चुनौती केवल शासन तक सीमित नहीं है। इसकी शुरुआत हमारे कक्षाओं से होती है।
दशकों से हमारी शिक्षा व्यवस्था ने सफलता को मुख्यतः इस आधार पर मापा है कि कितने विद्यार्थी IAS, IPS, इंजीनियर, डॉक्टर या कॉरपोरेट अधिकारी बने। ये सभी सम्मानजनक और राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक पेशे हैं।
लेकिन कोई सभ्यता केवल प्रशासकों के बल पर विकसित नहीं हो सकती। उसे ऐसे दार्शनिक भी चाहिए जो प्रश्न पूछें, वैज्ञानिक जो नई खोज करें, शिक्षक जो प्रेरणा दें, कलाकार जो समाज को ऊंचा उठाएं, उद्यमी जो अवसर पैदा करें और ऐसे नागरिक जो निजी महत्वाकांक्षा से ऊपर अपने कर्तव्य को रखें।
शिक्षा को नौकरी तलाशने वालों से पहले विचारक पैदा करने चाहिए।
मील का पत्थर या नींव का पत्थर?
शायद हमारे सामने सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक है। हमने धीरे-धीरे मूल्य से अधिक दिखाई देने वाली सफलता को महत्व देना शुरू कर दिया है।
हर कोई वह मील का पत्थर बनना चाहता है जो सड़क किनारे गर्व से खड़ा हो, जिसे लोग देखें और जिसकी प्रशंसा करें। बहुत कम लोग वह नींव का पत्थर बनना चाहते हैं जो धरती के नीचे दबकर अदृश्य हो जाता है, लेकिन पूरी इमारत का भार चुपचाप उठाता है।
लेकिन राष्ट्र कभी मील के पत्थरों से नहीं बनते।
राष्ट्र नींव के पत्थरों से बनते हैं।
हमारी सभ्यता का इतिहास
इतिहास हमें एक गहरा सबक देता है। विदेशी आक्रमणों से बहुत पहले भारत ने भव्य मंदिरों, किलों, बावड़ियों, विश्वविद्यालयों और ज्ञान के केंद्रों का निर्माण कर लिया था। इनमें से अनेक संरचनाएं आज भी सदियों बाद खड़ी हैं और अपने निर्माताओं की असाधारण इंजीनियरिंग, शिल्पकला और ईमानदारी की गवाही देती हैं।
वे हमें याद दिलाती हैं कि कभी उत्कृष्टता को केवल पेशेवर दायित्व नहीं, बल्कि एक पवित्र कर्तव्य माना जाता था।
बाद के विदेशी शासन के दौरान निर्मित अनेक इमारतें भी आज तक कायम हैं और ब्रिटिश काल में विकसित कई प्रशासनिक व्यवस्थाओं की छाप आज भी हमारे शासन पर दिखाई देती है। विडंबना यह है कि आज हमारे पास कहीं अधिक उन्नत इंजीनियरिंग, आधुनिक मशीनें और अत्याधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान है, फिर भी स्वतंत्रता के बाद बनाए गए कुछ सड़क, पुल और सार्वजनिक भवन अपेक्षा से कहीं पहले खराब होने लगते हैं।
कमी हमारी तकनीक में नहीं है।
कमी हमारी ईमानदारी में है।
भ्रष्टाचार: अदृश्य शत्रु
भ्रष्टाचार हमारे गणराज्य का सबसे बड़ा अदृश्य शत्रु है। वह चुपचाप सार्वजनिक धन की चोरी करता है, संस्थाओं को कमजोर करता है, गुणवत्ता से समझौता कराता है और जनता का विश्वास नष्ट करता है।
जब सार्वजनिक पद सेवा के अवसर के बजाय विशेषाधिकार अर्जित करने का माध्यम बन जाता है, तब लोकतंत्र अपना नैतिक दिशासूचक खोने लगता है।
राजनीति केवल सत्ता का पेशा बनने के लिए नहीं थी। प्रशासनिक सेवाओं की कल्पना भी केवल अधिकार के साधन के रूप में नहीं की गई थी।दोनों का उद्देश्य जनसेवा था।
लोकतंत्र को चाहिए जिम्मेदारी
यही भावना हमारी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का भी मार्गदर्शन करे। संसद ऐसा मंच नहीं बन सकती, जहां बहस की जगह व्यवधान ले ले और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता राष्ट्रीय जिम्मेदारी पर हावी हो जाए।
सरकार को जवाबदेह रहना चाहिए। विपक्ष को रचनात्मक रहना चाहिए। लोकतंत्र इसलिए नहीं चलता कि सभी सहमत होते हैं, बल्कि इसलिए चलता है कि सभी संवाद के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं।
फिर भी केवल कानून और संस्थाएं एक महान राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकतीं।
चरित्र कर सकता है।
भारत की सभ्यतागत देन
यदि भारत को 21वीं सदी में अपनी नियति को साकार करना है, तो केवल आर्थिक शक्ति पर्याप्त नहीं होगी। महान राष्ट्र महान विचारों से टिकते हैं और महान विचार महान चरित्र से जन्म लेते हैं।
यूरोप और अमेरिका में आधुनिक विश्वविद्यालयों के उदय से बहुत पहले भारत ने दर्शन और ज्ञान की दुनिया की सबसे समृद्ध परंपराओं में से एक विकसित कर ली थी। उपनिषदों के ऋषियों ने सत्य, चेतना, कर्तव्य और मानव जीवन के उद्देश्य जैसे शाश्वत प्रश्नों पर विचार किया।
इसी सभ्यता ने दुनिया को शून्य और दशमलव पद्धति जैसी अवधारणाएं दीं, जिन्होंने आगे चलकर आधुनिक विज्ञान और तकनीक की गणितीय नींव तैयार करने में योगदान दिया। लेकिन इन बौद्धिक उपलब्धियों के साथ भारत ने यह भी सिखाया कि भौतिक प्रगति का मार्ग नैतिक और आध्यात्मिक विवेक से निर्देशित होना चाहिए।
यही मानवता के लिए भारत की सभ्यतागत देन है।
गीता और कर्तव्य का सिद्धांत
भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है; यह कर्तव्य, साहस और निष्काम कर्म पर विश्व के महानतम ग्रंथों में से एक है।
इसका संदेश—कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन व्यक्तिगत फल की आसक्ति के बिना करना चाहिए—आज भी सार्वजनिक जीवन के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
कल्पना कीजिए, यदि यही सिद्धांत हमारी राजनीति, प्रशासन, व्यवसाय और शिक्षा संस्थानों का मार्गदर्शन करने लगे तो हमारे गणराज्य में कितना बड़ा परिवर्तन आ सकता है।
अरविंद की व्यापक दृष्टि
अरविंद ने भारत की स्वतंत्रता को एक बड़ी यात्रा की शुरुआत माना था। उनका विश्वास था कि भारत का अंतिम उद्देश्य मानव चेतना के विकास में योगदान देना और यह दिखाना है कि भौतिक प्रगति तथा आध्यात्मिक ज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
उन्होंने भारत को एक उच्चतर मानवता के जन्मस्थान के रूप में देखा—ऐसी मानवता जो शक्ति या धन के कारण श्रेष्ठ न हो, बल्कि नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक उत्कृष्टता के कारण श्रेष्ठ हो।
यह दृष्टि केवल पांच या दस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनकर पूरी नहीं होगी।
यह तभी साकार होगी जब हम चरित्र का पुनर्निर्माण करेंगे।
हमें कैसा भारत बनाना है?
हमारे विद्यालय केवल सफल पेशेवर नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक तैयार करें। हमारे विश्वविद्यालय केवल दक्षता नहीं, जिज्ञासा को भी प्रोत्साहित करें। हमारी राजनीति तमाशे से अधिक सेवा को महत्व दे। हमारे सार्वजनिक संस्थान प्रभाव से अधिक ईमानदारी को महत्व दें।
और हममें से प्रत्येक को आवश्यकता पड़ने पर प्रसिद्ध मील के पत्थर के बजाय उस अदृश्य नींव का पत्थर बनने के लिए तैयार रहना चाहिए।
स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारी
इस स्वतंत्रता दिवस पर जब हम तिरंगे को सलाम करें, तो हमें याद रखना चाहिए कि 1947 में मिली स्वतंत्रता ने हमें विदेशी शासन से मुक्त किया था।
लेकिन जिस स्वतंत्रता की हमें आज भी तलाश है, वह भ्रष्टाचार, mediocrity, निराशावाद और बिना जिम्मेदारी के पहचान पाने की प्रवृत्ति से मुक्ति है।
भविष्य का भारत केवल उन लोगों से नहीं बनेगा जो प्रकाश में खड़े हैं। वह उन असंख्य स्त्री-पुरुषों से बनेगा जो चुपचाप ईमानदारी को कायम रखते हैं, अपने कर्तव्य को उत्कृष्टता के साथ निभाते हैं और बिना किसी प्रशंसा की अपेक्षा के संस्थाओं को मजबूत करते हैं।
एक राष्ट्र की असली नींव
किसी राष्ट्र की महानता उसके चमकते हुए मील के पत्थरों से तय नहीं होती।
राष्ट्र तब महान बनता है, जब उसकी नींव मजबूत होती है।

लेखक अरविंद बिष्ट वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह लखनऊ में ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में राजनीतिक संपादक के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। विश्व बैंक के नेशनल रिवर बेसिन प्रोजेक्ट में सलाहकार और उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त भी रहे हैं।



