हाई कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

कांठ बांग्ला बस्ती विस्थापन मामला

छह महीने से चल रहे कथित जबरन विस्थापन पर उठे सवाल, विपक्ष और जन संगठनों ने आदेश का किया स्वागत

नैनीताल। देहरादून स्थित कांठ बांग्ला बस्ती के कथित जबरन विस्थापन के मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। पिछले करीब छह महीनों से चल रहे इस विवाद को लेकर अदालत के इस रुख को प्रभावित परिवारों की आशंकाओं को बल देने वाला माना जा रहा है।

विपक्षी दलों और जन संगठनों—दून समग्र विकास अभियान, कांग्रेस के संजय शर्मा एवं प्रवीण त्यागी, सत्यनारायण सचान, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के समर भंडारी, सर्वोदय मंडल के हरबीर सिंह कुशवाहा तथा चेतना आंदोलन के शंकर गोपाल, राजेंद्र शाह और विनोद बडोनी—ने न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि प्रशासन लगातार प्रभावित परिवारों के सवालों को नजरअंदाज करता रहा है।

उनका आरोप है कि बस्तीवासियों ने फ्लैट कॉम्प्लेक्स की सुरक्षा, विस्थापन की शर्तों, शुल्क और भविष्य को लेकर कई बार सवाल उठाए, लेकिन प्रशासन ने जवाब देने के बजाय दबाव बनाने की कोशिश की। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत दिए गए आवेदनों पर भी जवाब नहीं दिया गया।

संगठनों ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने वर्ष 2016 के मलिन बस्ती अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए जबरन हटाने की कार्रवाई शुरू की, जो पूरी तरह जनविरोधी है।

बताया गया कि 29 अप्रैल को कांठ बांग्ला बस्ती के तीन परिवारों की याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि 2016 और 2018 के बस्ती कानूनों की अनदेखी करते हुए उन्हें मकान खाली करने के नोटिस दिए गए, जबकि नोटिस में किसी न्यायालय के आदेश का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

याचिका में यह भी कहा गया कि प्रभावित परिवारों को पास में बने फ्लैटों में जबरन स्थानांतरित करने का दबाव बनाया जा रहा है, जबकि उन फ्लैटों की सुरक्षा पर सवाल हैं और वे रहने योग्य नहीं हैं। यह भी आरोप है कि उक्त फ्लैट नदी क्षेत्र में बने हुए हैं।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता तनुप्रिया जोशी ने पक्ष रखा, जबकि सरकार की ओर से प्रस्तुत जवाबों को अदालत ने पर्याप्त नहीं माना। इसके बाद खंडपीठ ने सरकार से विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 6 मई को निर्धारित की गई है।

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