विनम्र श्रद्धांजलि : बेदाग बेमिसाल व्यक्तित्व के धनी भुवनचंद्र खंडूड़ी

हेमचंद्र सकलानी

मैंने सैनिकों के जीवन को बहुत करीब से देखा है और जब सौफिया कांड के बाद श्रीनगर में सैनिकों का जीवन देखा,बारालाचला पास,द्रास – कारगिल,लेह, लद्दाख,चांगला ग्लेशियर, पेंगोंग झील की यात्रा में उनके जीवन को देखा तो आदर, सामान,प्रेम-स्नेह, श्रृद्धा का ज्वार सा सैनिकों के प्रति उमड़ पड़ा था। अपनी राजस्थान थार रेगिस्तान के निकट यात्रा करते एक अधिकारी ने बताया था, माथे पर हाथ फेरो तो हाथ में रेत आती है,खाने की थाली में भी रेत के दर्शन होते हैं। पचास डिग्री सेल्सियस पर बाहर घूमना पैट्रोलिंग करना सोचें जरा कैसा लगता होगा।हम सोचते हैं मेजर हैं जनरल हैं तो बहुत बड़े आराम से जी रहे होंगे पर कोई भी इन पदों पर बिना सेकंड लेफ्टिनेंट की कठिन ट्रेनिंग के नहीं पहुंच सकता। सेकंड डेफिनेशन का 3 साल का कोर्स ट्रेनिंग हर किसी के बस की बात नहीं है जिसमें जज्बा हो कठिन संघर्ष में जीने की प्रवृत्ति हो इच्छा हो वही जा सकता है।

प्रकृति का अटूट सिद्धांत है जो चीज जितनी दूर होती है वही सुंदर सत्य शांति के निकट होती है। सागर जितना तट से दूर होता है उतना ही गहरा होता जाता है मध्य सागर उतना ही शांत होता है जो अपने अंदर बहुमूल्य खजाना छुपाए हुए होता है, और सागर सुंदरतम रुप उसका उतना ही सुंदर नीलापन देखने लायक होता है। अच्छे मनुष्य का व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही होता है। शांत होने के कारण जीवन अच्छा गुजरता है ऐसे ही मध्य सागर में शिप अच्छी तरह सुगमता से अपनी यात्रा करते हैं इसलिए विश्व का अधिकतर व्यापार समुद्री मार्ग से ही होता है। ऐसे ही सागर जैसे धीर गम्भीर व्यक्तित्व का नाम है मेजर जनरल भुवन चन्द्र खंडूड़ी।

आपका जन्म १३ अक्टूबर १९३४ को पिता श्री जयबल्लभ खंडूड़ी प्रसिद्ध पत्रकार और माताश्री दुर्गा देवी थीं जो लोकप्रिय नेता हेमवती नंदन बहुगुणा की बहन थीं के घर देहरादून में हुआ था पर पैतृक आवास पौड़ी गढ़वाल के विकास मार्ग पर है। १७ फरवरी १९६४ को आपका विवाह शकुंतला नेहवाल(अरुणा खंडूड़ी) से हुआ।
जब पढ़ रहे थे तब छात्र के रुप में स्वाधीनता आंदोलन में थोड़ा अपनी सहभागिता निभाई थी। इंटर की परिक्षा पौड़ी से पास की।
सन १९५४ में लेफ्टिनेंट के रूप में सेना प्रवेश किया। सन १९५४ से १९९० तक भारतीय सेना की कोर ऑफ इंजीनियर्स में अपनी सेवाएं दीं।

सन 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान खंडूड़ी जी सेना में रेजिमेंट कमांडर रहे। इसके अतिरिक्त सेना में मुख्य इंजीनियर, इंजीनियर ब्रिगेड के कमांडर और फिर सैन्य सचिव ही नहीं सेना मुख्यालय में महानिदेशक के पद को भी गौरवान्वित किया।

सेवानिवृत होने के बाद 1990 में आपने राजनीति में प्रवेश किया है 1991 में पहली बार आप उत्तराखंड की गढ़वाल सीट से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। सन 2000 में खंडूड़ी जी अटल बिहारी वाजपेई सरकार में भूतल परिवहन मंत्री रहे। सन 2007 से सन 2009 तथा सन 2011से 2012 तक दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। जब खंडूरी जी से जून 2009 को त्यागपत्र लिखवाया गया तब उन्हें सत्ता संभाले ढाई वर्ष भी पूरे नहीं हुए थे। उत्तराखंड की जनता ने पांचों सीटें कांग्रेस की झोली में डालकर उसके मंत्रियों के कार्यों के प्रति अपना नाराजगी प्रकट की। पर इससे भुवन चंद्र खंडूडी सरकार की उपलब्धियां को नकारा नहीं जा सकता।

चिकित्सा के क्षेत्र में अस्पतालों का आधुनिकरण, नवीनीकरण दवाईयों की उपलब्धता, संकटकालीन अवस्था में रोगी को 108 द्वारा एंबुलेंस उपलब्ध करवाना जिससे हजारों व्यक्तियों के जीवन की इच्छा हो सके को झुठलाया नहीं जा सकता। श्रीनगर मेडिकल कॉलेज की स्थापना, अल्मोड़ा में मेडिकल कॉलेज का शिलान्यास, एमबीबीएस की वार्षिक परीक्षा फीस ₹15000 करना, (पूरे देश में सबसे कम) उनके अथक प्रयासों का ही परिणाम रहा। शिक्षा के क्षेत्र में अनेक युवाओं को नियुक्ति देकर उनकी हताशा निराशा को दूर किया। बालिकाओं को छात्राओं को अनेक छात्रवृतियां, महिलाओं को पंचायत में आरक्षण है, विधवाओं को, विकलांगों को, वृद्धावस्था पेंशन भोगियों की संख्या में वृद्धि करना यह दर्शाता है कि समाज में विवश लोगों के प्रति उनके अंदर उनके मन में कुछ करने की भावना हमेशा रहती थी। राज्य आंदोलनकारियों को नौकरियों में आरक्षण, उन्हें सम्मान प्रदान करवाने में आर्थिक सहायता दिलाने में उन्होंने क्षत्रिय भूमिका निभाई थी।

उनके द्वारा बनाया भू कानून उत्तराखंड में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाने वाला कार्य कहा जा सकता है।यदि यह कानून न बना होता तो भूमि माफिया अब तक सारा उत्तराखंड खरीद चुके होते। उनके अथक प्रयासों से मनेरी भाली स्टेज दो, टिहरी परियोजना, लता तपोवन परियोजना, व्यासी परियोजना, तथा सेला उर्थिंग परियोजना पर तीव्र गति से कार्य प्रारंभ हुआ तथा आज टिहरी बांध परियोजना तथा मनेरी वाले स्टेज दो से विद्युत उत्पादन हो रहा है। एशियन डवलपमेंट बैंक से ऊर्जा ट्रांसमिशन के लिए ऋण उपलब्ध कराने को भी उनकी उपलब्धियां में गिना जा सकता है। शायद इतनी सारी उपलब्धियां को देखकर ही जनता ने उन्हें उसे समय -“देश का सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री” चुना था।

पर जैसे की उक्ति है ‘दिया तले भी अंधेरा होता है’। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा हो या न लगा हो मगर उनके कार्यकाल में उनके द्वारा उनके या संरक्षण में ऐसा कोई कार्य नहीं हुआ जिनके लिए उन पर उंगली उठाई जा सके। कौन नहीं जानता कि मंत्रियों के नीचे विधायकों के नीचे कौन लोग खड़े रहते हैं। कौन 24 घंटे उनसे चिपके रहते हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। उनकी महत्वाकांक्षाओं को पूरा न करने वाला व्यक्ति किसी भी तरह अधिक दिनों तक मुख्यमंत्री के पद पर नहीं रह सकता। इसी कारण अनेक बार भुवन चंद्र खंडूरी जी को अपने ही लोगों का, अपने ही पार्टी के लोगों के भयंकर विरोध का सामना करना पड़ा।

उनके शासन काल का अध्ययन कर एक प्रश्न अवश्य उठता है कि – क्या सारे कर्तव्य सरकार के ही होते हैं ? जनता के कुछ कर्तव्य नहीं होते? सिर्फ अधिकार होते हैं। खंडूरी अपने कार्यों के निष्पादन में पूरी तरह सफल रहे हैं। अगर असफलता का श्रेय किसी को जाता है तो उन्हें जिन्होंने अपने उत्तरदायित्वों को अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से नहीं निभाया।

एक सच्चा और अच्छा ईमानदार नेता मंत्री होने के लिए लोभ लालच से दूर अदम्य साहस, दृढ़ प्रतिज्ञ के साथ एक अच्छे व्यक्तित्व चरित्र की आवश्यकता होती है और यह सब गुण खंडूड़ी जी के अंग अंग में भरे थे। उन्होंने भ्रष्टाचार मुक्त शासन प्रशासन प्रदेश का नारा दिया यह वह ही ठीक कर सकता है जो स्वयं भी ईमानदार आदर्शवादी व्यक्तित्व का स्वामी बचपन से ही रहा। उनका राजनीतिक कैरियर और छवि ऐसी थी कि उन पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। जबकि सिद्धांतों और उसूल जब निजी स्वार्थो पर चोट करते हैं, तब विरोध होना स्वाभाविक होता है पर खंडूड़ी जी की सोच विचार सिद्धांत उसूलों वाला रहा है राजनीति में दूर-दूर तक उनके जैसा कोई दूसरा नजर नहीं आता। मां भारती के दिवंगत सपूत को विनम्र श्रद्धांजलि।

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