हरेला : पीत-हरी पृथ्वी की स्मृति
नंदन एस बिष्ट “ विषधर”
घर के कोने वाले देवता के अँधेरे में सात प्रकार के अनाज एक टोकरी में बो दिए जाते थे। उन्हें धूप नहीं मिलती थी। बस संध्या के दीपक की लौ कुछ देर के लिए उन पर पड़ती। सातवें दिन वही बीज पीत-हरे तृणों में बदल जाते। सबसे पहले वे देवता को अर्पित होते, फिर शुरू होता पौधारोपण, कलम और हरियाली का उत्सव।
तब समझ नहीं आता था कि धूप के बिना उगे ये पीत-हरे तृण इतने पवित्र क्यों हैं।
आज जीवन के इस मोड़ पर, भले ही मेरे पास पेड़ लगाने का समय न हो, स्मृतियों के लिए समय अपने-आप निकल आता है।
अब लगता है, हरेला केवल खेतों की हरियाली का पर्व नहीं है; यह पृथ्वी की सबसे पुरानी स्मृति का पर्व है।
कभी हमारी पृथ्वी भी ऐसी ही रही होगी—अधूरी, लगभग निःश्वास। समुद्रों में सूक्ष्म सायनोबैक्टीरिया ने क्लोरोफिल के सहारे सूर्य के प्रकाश को पकड़ना सीखा। करोड़ों वर्षों तक वे समुद्रों में ऑक्सीजन-वाली प्राणवायु रचते रहे। वही प्राणवायु पहले समुद्र के जल में घुली, फिर धीरे-धीरे वायुमंडल तक पहुँची। उसी के बाद थल पर जटिल जीवन का विकास संभव हुआ—वन उगे, जीव पनपे, डायनासोर आए और चले गए, और अंततः मनुष्य ने भी साँस ली।
हम अक्सर कहते हैं कि जंगल पृथ्वी के फेफड़े हैं। वे हमारी जलवायु के प्रहरी हैं, वर्षा के साथी हैं, ऋतुओं के संतुलन के रक्षक हैं—लेकिन हमारी अधिकांश ऑक्सीजन-वाली प्राणवायु आज भी समुद्रों के सूक्ष्म फाइटोप्लांकटन और सायनोबैक्टीरिया से आती है। हमारी साँस का सबसे बड़ा स्रोत वहाँ है, जहाँ हमारी नज़र शायद ही कभी पहुँचती है।
विडम्बना यह है कि हम हरियाली बचाने की बात तो करते हैं, पर उस नीले संसार को भूलते जा रहे हैं जहाँ हरियाली ने पहली बार साँस ली थी। समुद्री प्रदूषण, अम्लीकरण, अंधाधुंध दोहन और युद्ध सबसे पहले उसी अदृश्य जीवन पर प्रहार करते हैं जिसने इस पृथ्वी को साँस लेना सिखाया।
कभी-कभी मुझे लगता है कि हरेले के वे पीत-हरे तृण एक चेतावनी भी हैं। यदि समुद्र की वह आदिम हरियाली पीली पड़ने लगी, तो एक दिन पूरी पृथ्वी भी पीत-हरी दिखाई दे सकती है—रंग तो रहेगा, पर जीवन क्षीण होता जाएगा।
शायद हरेला केवल पेड़ लगाने का पर्व नहीं है।
यह उस पहली हरियाली का स्मरण है जिसने समुद्र से उठकर पृथ्वी को ऑक्सीजन-वाली प्राणवायु दी।
देवता के अँधेरे में उगे वे पीत-हरे तृण आज भी याद दिलाते हैं—
जीवन हमेशा वहाँ जन्म लेता है, जहाँ हमारी दृष्टि सबसे कम पहुँचती है; और हमारी पहली साँस भी वहीं से आई थी, जहाँ आज हमारी सबसे कम निगाह जाती है।



