प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में गड़बड़ी- मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश

अविकल उत्तराखंड

देहरादून। भारत सरकार द्वारा प्रत्येक खेत तक सिंचाई की सुविधा पहुँचाने के उद्देश्य से प्रारम्भ की गई प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के क्रियान्वयन में गंभीर वित्तीय, तकनीकी एवं प्रशासनिक अनियमितताओं का मामला सामने आया है।

शिकायत के अनुसार, योजना के “पर ड्रॉप मोर क्रॉप (PDMC)” घटक के अंतर्गत उत्तराखण्ड के कृषि एवं उद्यान विभाग द्वारा अब तक लगभग ₹400 करोड़ से अधिक की धनराशि व्यय की जा चुकी है।

यह केन्द्रपोषित योजना 90 प्रतिशत केन्द्रांश तथा 10 प्रतिशत राज्यांश के वित्तीय अनुपात पर संचालित की जा रही है। आरोप है कि योजना के क्रियान्वयन के दौरान शासनादेशों एवं निर्धारित दिशा-निर्देशों का समुचित अनुपालन नहीं किया गया। तृतीय पक्ष मूल्यांकन, चार्टर्ड अकाउंटेंट की ऑडिट रिपोर्ट, कैग ऑडिट तथा विभागीय आंतरिक ऑडिट में लाभार्थी सत्यापन, सामग्री की आपूर्ति, उपकरणों की स्थापना, प्रशिक्षण, निरीक्षण, अभिलेखों के रख-रखाव और वित्तीय नियंत्रण से संबंधित अनेक कमियाँ सामने आई हैं।

पौड़ी गढ़वाल में अनुपयोगी मिले ड्रिप सिस्टम
जनपद पौड़ी गढ़वाल में वर्ष 2016-17 एवं 2017-18 के दौरान स्थापित ड्रिप सिंचाई प्रणालियों के तृतीय पक्ष मूल्यांकन में पाया गया कि अनेक किसानों ने प्रारम्भ में योजना का लाभ प्राप्त किया, लेकिन रखरखाव एवं तकनीकी सहायता के अभाव में अधिकांश ड्रिप सिस्टम बाद में अनुपयोगी हो गए।

मूल्यांकन के दौरान कई खेतों में केवल ड्रिप पाइपों के अवशेष पाए गए। कुछ प्रकरणों में सामग्री तो उपलब्ध कराई गई थी, लेकिन ड्रिप सिंचाई प्रणाली की विधिवत स्थापना ही नहीं की गई।

रुद्रप्रयाग में स्थापना और प्रशिक्षण का अभाव
जनपद रुद्रप्रयाग में किसानों ने मूल्यांकन दल को बताया कि आपूर्तिकर्ताओं द्वारा केवल सामग्री उपलब्ध कराई गई। ड्रिप प्रणाली की विधिवत स्थापना, परीक्षण और संचालन संबंधी प्रशिक्षण नहीं दिया गया। इसके परिणामस्वरूप अनेक किसान उपकरणों का समुचित उपयोग एवं रखरखाव नहीं कर सके और योजना का अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं हुआ।

पिथौरागढ़ में भी सामने आईं कमियाँ
जनपद पिथौरागढ़ में भी किसानों को पाइप, फिल्टर और ड्रिपर उपलब्ध कराए जाने के बावजूद प्रणाली की स्थापना एवं तकनीकी प्रशिक्षण में गंभीर कमियाँ पाई गईं। आरोप है कि इन कमियों के कारण बड़ी संख्या में किसान योजना के वास्तविक एवं दीर्घकालिक लाभ से वंचित रह गए।

लेखा एवं अभिलेखों के रख-रखाव पर सवाल
चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा योजना के लेखों के परीक्षण के दौरान लाभार्थियों के सत्यापन, आवश्यक दस्तावेजों की उपलब्धता, निरीक्षण प्रक्रिया तथा वित्तीय एवं प्रशासनिक अभिलेखों के रख-रखाव में व्यापक कमियाँ दर्ज की गईं।

इसके अतिरिक्त, शिकायत में आरोप लगाया गया है कि—
शासनादेशों एवं निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन किया गया;
योजना की नियमित निगरानी प्रभावी ढंग से नहीं की गई;
मूल्यांकन निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं कराया गया;
उपकरणों की स्थापना और उपयोगिता सुनिश्चित नहीं की गई;
किसानों को पर्याप्त तकनीकी प्रशिक्षण एवं बिक्री-पश्चात सहायता नहीं दी गई;
ऑडिट आपत्तियों पर अपेक्षित सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की गई।

जिलों में जाँच प्रारम्भ, देहरादून में मजिस्ट्रेटी जाँच
पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जाँच कराने के लिए राज्य के सभी जिलाधिकारियों को शिकायती पत्र भेजे गए हैं। शिकायत पर संज्ञान लेते हुए विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों ने संबंधित मुख्य विकास अधिकारियों को जाँच अधिकारी नियुक्त किया है।
वहीं, जिलाधिकारी देहरादून ने प्रकरण में मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश दिए हैं। जाँच में योजना के अंतर्गत व्यय की गई धनराशि, लाभार्थियों का सत्यापन, सामग्री की गुणवत्ता एवं वास्तविक स्थापना, आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका, भुगतान प्रक्रिया तथा संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही की जाँच किए जाने की अपेक्षा है।

शिकायतकर्ता ने माँग की है कि योजना के वर्षवार एवं जनपदवार व्यय, लाभार्थियों तथा आपूर्तिकर्ताओं का भौतिक सत्यापन कराया जाए। जिन प्रकरणों में सरकारी धन का दुरुपयोग, फर्जी लाभार्थी, अपूर्ण स्थापना, बिना सत्यापन भुगतान अथवा अन्य वित्तीय अनियमितता पाई जाए, उनमें दोषी अधिकारियों एवं आपूर्तिकर्ताओं के विरुद्ध कठोर विभागीय एवं विधिक कार्रवाई करते हुए सरकारी धन की वसूली की जाए।

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