मजदूर नेताओं को जिला बदर करने पर होगी महापंचायत

तीन नेताओं को चार महीने के लिए किया गया है जिला बदर

गुंडा एक्ट की कार्रवाई को बताया राजनीतिक दबाव का नतीजा

अविकल उत्तराखंड

देहरादून। हरिद्वार में इंकलाबी मजदूर केंद्र और पीपुल्स यूथ फ्रंट से जुड़े तीन पदाधिकारियों को गुंडा एक्ट के तहत चार महीने के लिए जिला बदर किए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस कार्रवाई के विरोध में इंकलाबी मजदूर केंद्र ने उत्तरांचल प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर जिला प्रशासन के फैसले को निरस्त करने की मांग की। संगठन ने चेतावनी दी कि यदि मजदूर नेताओं पर लगाई गई कार्रवाई वापस नहीं ली गई तो 22 नवंबर को हरिद्वार में विशाल मजदूर महापंचायत आयोजित की जाएगी। इसमें विभिन्न राज्यों के मजदूर संगठनों, किसान संगठनों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

पत्रकार वार्ता में संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पंकज बवाड़ी उर्फ पंकज कुमार, केंद्रीय परिषद सदस्य जय प्रकाश और पीपुल्स यूथ फ्रंट के इंजीनियर ललित कुमार को जिला बदर किए जाने की कार्रवाई को मजदूर आंदोलनों को दबाने का प्रयास बताया गया। संगठन के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि तीनों नेताओं को ठेका प्रथा के विरोध, अस्थायी और ठेका श्रमिकों को स्थायी करने, न्यूनतम मासिक वेतन 30 हजार रुपये निर्धारित करने, आठ घंटे का कार्यदिवस लागू करने और अतिरिक्त कार्य के लिए दोगुना भुगतान सुनिश्चित करने की मांग उठाने के कारण निशाना बनाया गया है।

संगठन का आरोप है कि सिडकुल के औद्योगिक प्रतिष्ठानों के प्रबंधन के दबाव में जिला प्रशासन ने बिना निष्पक्ष जांच के गुंडा एक्ट के तहत कार्रवाई की। वक्ताओं के अनुसार, हरिद्वार की कैंपस और हैमिल्टन कंपनियों में मजदूर आंदोलनों के दौरान पंकज बवाड़ी समझौता वार्ता में शामिल थे। दोनों कंपनियों के समझौता पत्रों पर प्रशासन और श्रम विभाग के अधिकारियों के साथ उनके हस्ताक्षर भी हैं। इसके बावजूद उनके और जय प्रकाश के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई शुरू कर दी गई। बाद में अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट की अदालत से तीनों नेताओं को चार महीने के लिए जिला बदर करने के आदेश पारित किए गए।

पत्रकार वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि इस वर्ष देश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों ने न्यूनतम वेतन बढ़ाने और श्रम अधिकारों की मांग को लेकर व्यापक आंदोलन किए। इन आंदोलनों के दबाव में कई राज्य सरकारों को न्यूनतम वेतन में वृद्धि करनी पड़ी। उत्तराखंड में भी न्यूनतम वेतन में करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी और इंजीनियरिंग उद्योगों के लिए वेतन बोर्ड का गठन किया गया। हालांकि, संगठन का कहना है कि मौजूदा महंगाई को देखते हुए न्यूनतम वेतन 30 हजार रुपये मासिक होना चाहिए और अतिरिक्त कार्य के लिए दोगुने भुगतान के कानूनी प्रावधान का सख्ती से पालन कराया जाना चाहिए।

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि हरिद्वार के सिडकुल और देहरादून के सेलाकुई में मजदूर आंदोलनों के दौरान पुलिस दमन किया गया और कई मजदूरों पर मुकदमे दर्ज किए गए। उन्होंने मजदूर नेताओं पर की गई कार्रवाई को इसी कड़ी का हिस्सा बताया।

संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि पंकज बवाड़ी और जय प्रकाश अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित वीआईपी की भूमिका और सरकार की जवाबदेही को लेकर लगातार आवाज उठा रहे थे। इसके अलावा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में चल रहे आंदोलनों में उनकी भागीदारी भी सरकार की नाराजगी का कारण बनी। वक्ताओं ने आशंका जताई कि आगामी दिनों में बोनस सहित मजदूरों के अन्य मुद्दों पर आंदोलन तेज होने की संभावना को देखते हुए उनके नेतृत्व को कमजोर करने के उद्देश्य से यह कार्रवाई की गई है।

पत्रकार वार्ता में केंद्र सरकार के नए आपराधिक कानूनों और चार श्रम संहिताओं की भी आलोचना की गई। वक्ताओं ने कहा कि इन कानूनों से मजदूरों के ट्रेड यूनियन अधिकारों और आम नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने मजदूर नेताओं को जिला बदर किए जाने की कार्रवाई को मजदूर आंदोलन का अपराधीकरण करने की कोशिश बताया और इसे वापस लेने की मांग की।

पत्रकार वार्ता में इंकलाबी मजदूर केंद्र के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पंकज बवाड़ी उर्फ पंकज कुमार, केंद्रीय परिषद सदस्य जय प्रकाश, उत्तराखंड महिला मंच की अध्यक्ष कमला पंत, सामाजिक कार्यकर्ता जगदीश कुकरेती, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की महासचिव नीता, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के महासचिव भूपाल और भेल मजदूर ट्रेड यूनियन के महामंत्री अवधेश कुमार मौजूद रहे।

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