नीट आंदोलन पर बाबा रामदेव की टिप्पणी पर वरिष्ठ पत्रकार अरविंद सिंह बिष्ट की दृष्टि…
“ओह माय गॉड, रामदेव जी!”
शनिवार रात भोजन करते समय देशभर में नीट परीक्षा के कथित प्रश्नपत्र लीक के विरोध में चल रहे छात्र आंदोलन पर प्रसारित एक प्राइम-टाइम टीवी बहस देख रहा था। अचानक मेरे मुंह से यही शब्द निकले—”ओह माय गॉड, रामदेव जी!”
टीवी पर बाबा रामदेव बोल रहे थे। एंकर ने उनसे एक सीधा-सा प्रश्न पूछा—”आंदोलन कर रहे छात्रों को आप दस में से कितने अंक देंगे?”
उनका तत्काल उत्तर था—”दो अंक।”
मैंने चुपचाप टीवी बंद कर दिया।
इसलिए नहीं कि मैं उनसे असहमत था। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक ही नहीं, बल्कि आवश्यक भी हैं। मैंने टीवी इसलिए बंद किया क्योंकि मुझे आश्चर्य हुआ कि देश के सबसे गंभीर शैक्षिक संकटों में से एक पर चर्चा करने के बजाय पूरी बहस आंदोलनकारी छात्रों के चरित्र पर एक चर्चित व्यक्ति के फैसले तक सिमट गई। परीक्षा व्यवस्था की जवाबदेही और उसकी विफलता पर गंभीर विमर्श कहीं गायब था।
उस क्षण मुझे हमारे समय की एक बड़ी सच्चाई याद आई।
हम तत्काल प्रतिक्रियाओं के युग में जी रहे हैं। आज मोबाइल फोन हाथ में लिए लगभग हर व्यक्ति स्वयं को प्रसारक समझता है। सोशल मीडिया की तीखी प्रतिस्पर्धा में मुख्यधारा का मीडिया भी अक्सर लोकप्रियता को विशेषज्ञता का पर्याय मान बैठता है। जिसकी आवाज जितनी ऊंची होती है, उसे उतना ही अधिक मंच और महत्व मिल जाता है।

मेरे मन में सबसे पहला प्रश्न यही उठा—
आखिर बाबा रामदेव ही क्यों?
देश के सामने न तो योग का प्रश्न था, न आयुर्वेद का और न ही व्यापार का। प्रश्न था भारत की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता का। आवश्यकता थी पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था में सुधार पर गंभीर चर्चा की। लेकिन बहस इस बात पर केंद्रित हो गई कि एक लोकप्रिय हस्ती छात्रों के बारे में क्या सोचती है।
यह आंदोलन नई दिल्ली के जंतर-मंतर से शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ था। प्रारंभ में इसे एक मामूली घटना मानकर नजरअंदाज किया गया, लेकिन धीरे-धीरे यह पूरे देश में फैल गया। सोनम वांगचुक के अनशन और विपक्षी दलों के नैतिक समर्थन ने निश्चित रूप से इसे गति दी, किंतु इसकी वास्तविक शक्ति वे छात्र थे जो केवल एक सिद्धांत पर अडिग रहे—देश की किसी भी राष्ट्रीय परीक्षा को निष्पक्ष, पारदर्शी और संदेह से परे होना चाहिए।
सरकार की कथित असंवेदनशीलता ने उनके संकल्प को और मजबूत किया। बाद में उनकी मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक पहुंची, जो अंततः पूरी भी हुई। इसी आंदोलन ने ‘जेनरेशन-ज़ेड’ को एक सामाजिक और राजनीतिक शक्ति के रूप में सामने ला खड़ा किया। उन्हें विद्रोही, अधीर और परंपरा-विरोधी कहा गया। कुछ आलोचकों ने तो इस आंदोलन को ‘राष्ट्र-विरोधी’ तक करार दे दिया। शायद वे यह भूल गए कि यदि किसी राष्ट्रीय परीक्षा की पवित्रता ही भंग हो जाए, तो राष्ट्र के लिए वास्तविक खतरा न्याय की मांग नहीं, बल्कि प्रश्नपत्र लीक जैसी घटना होती है।
बहस के दौरान बाबा रामदेव ने अपना अधिकांश ध्यान उन कुछ छात्रों पर केंद्रित किया जिन्होंने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया था। इसमें कोई दो राय नहीं कि सभ्य समाज में अभद्र भाषा का समर्थन नहीं किया जा सकता। जिन्होंने मर्यादा लांघी, वे आलोचना के पात्र हैं।

लेकिन क्या कुछ व्यक्तियों की गलती हजारों छात्रों के आंदोलन की पहचान बन जानी चाहिए?
दुर्भाग्य से यही वह प्रश्न था, जिस पर बहस ने गंभीरता से विचार ही नहीं किया।
इससे भी अधिक चिंताजनक बाबा रामदेव का यह कथन था कि आंदोलन में गुंडे और यहां तक कि बलात्कारी भी शामिल हो गए थे। इतने गंभीर आरोप उतने ही ठोस प्रमाण भी मांगते हैं। अन्यथा बहस का केंद्र परीक्षा प्रणाली की विफलता से हटकर आंदोलनकारियों के चरित्र पर आ जाता है और मूल मुद्दा धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चला जाता है।
योग को विश्वभर में लोकप्रिय बनाने और एक सफल भारतीय एफएमसीजी उद्योग खड़ा करने के लिए बाबा रामदेव निस्संदेह प्रशंसा के पात्र हैं। उनकी उपलब्धियां निर्विवाद हैं। लेकिन योग और व्यापार में सफलता अपने आप किसी व्यक्ति को शिक्षा नीति, संवैधानिक जवाबदेही या जन आंदोलनों का विशेषज्ञ नहीं बना देती।
विडंबना यह है कि स्वयं बाबा रामदेव भी बड़े जन आंदोलनों का नेतृत्व कर चुके हैं। इसलिए वे भली-भांति जानते हैं कि किसी भी व्यापक जन आंदोलन का मूल्यांकन कुछ व्यक्तियों के आचरण के आधार पर नहीं किया जा सकता। हर बड़े आंदोलन में कुछ अतिवादी तत्व होते हैं। एक जिम्मेदार टिप्पणीकार का दायित्व होता है कि वह आंदोलन और उसके हाशिए पर मौजूद तत्वों के बीच स्पष्ट अंतर करे, न कि दोनों को एक ही मान ले।
देश के सामने वास्तविक प्रश्न कभी यह नहीं था कि कुछ छात्रों ने अभद्र भाषा का प्रयोग किया या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह था कि क्या देश के लाखों युवा भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक की निष्पक्षता पर अब भी विश्वास कर सकते हैं।
यही राष्ट्रीय बहस का केंद्र होना चाहिए था।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मैंने महसूस किया कि मेरी निराशा केवल बाबा रामदेव से नहीं थी। वह हमारे सार्वजनिक विमर्श की उस प्रवृत्ति से थी, जिसमें सूचित विश्लेषण की जगह तात्कालिक प्रतिक्रियाओं ने ले ली है। आज हमारी टेलीविजन बहसों में अक्सर सबसे ऊंची आवाज सबसे गहरी समझ पर भारी पड़ जाती है।
लोकतंत्र को निश्चित रूप से विचारों की आवश्यकता होती है।
लेकिन उससे भी अधिक आवश्यकता होती है सुविचारित और तथ्याधारित विचारों की।
जिस दिन सार्वजनिक बहस में विशेषज्ञता की जगह केवल लोकप्रियता को महत्व मिलने लगे, उस दिन राष्ट्र के सबसे गंभीर प्रश्न भी टेलीविजन का तमाशा बनकर रह जाते हैं।
और शायद इसी कारण, टीवी स्क्रीन के काले पड़ते ही वही शब्द एक बार फिर मेरे होंठों पर आ गए—इस बार पहले से कहीं अधिक दृढ़ता के साथ—
“ओह माय गॉड, रामदेव जी!”

लेखक अरविंद बिष्ट वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह लखनऊ में ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में राजनीतिक संपादक के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। विश्व बैंक के नेशनल रिवर बेसिन प्रोजेक्ट में सलाहकार और उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त भी रहे हैं।



