हिमालय की दर्दभरी पुकार : रोक दो अब अत्याचार

पार्थसारथि थपलियाल की कलम से

हिमालय केवल पर्वतों की एक विशाल शृंखला नहीं है। वह भारत और समूचे दक्षिण एशिया की जलवायु, जल-सुरक्षा, जैव-विविधता, सभ्यता और संस्कृति का आधार है। भारतीय मनीषा ने इसलिए हिमालय को केवल भूगोल का विषय नहीं माना, बल्कि उसे देवभूमि, तपोभूमि और संस्कृति की जीवंत चेतना के रूप में देखा।
26 अगस्त की घटना में हिमनदीय बर्फ-चट्टान के टूटने से ल्हेंदे खोला–भोते कोशी–त्रिशूली नदी तंत्र में अत्यंत तीव्र बाढ़ आई।
हिमालय की भौगोलिक स्थिति-
हिमालय विश्व की सबसे युवा और सक्रिय वलित पर्वत प्रणालियों में से एक है। लगभग 2,400 किलोमीटर लंबी यह पर्वतमाला पश्चिम में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के निकटवर्ती पर्वतीय क्षेत्र से लेकर भारत, नेपाल और भूटान होते हुए पूर्व में अरुणाचल प्रदेश तथा तिब्बत के आसपास तक फैली है। इसके उत्तर में तिब्बती पठार और दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप का विशाल मैदान स्थित है। भारत के जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश हिमालयी क्षेत्र के महत्वपूर्ण भाग हैं। नेपाल और भूटान का अधिकांश भूगोल हिमालय से जुड़ा है, जबकि चीन का तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र हिमालय की उत्तरी भौगोलिक पृष्ठभूमि बनाता है। पश्चिमी हिमालय का संबंध पाकिस्तान के पर्वतीय क्षेत्र से भी है।
हिमालय की यही भौगोलिक स्थिति उसे अत्यंत संवेदनशील बनाती है। भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की निरंतर टक्कर के कारण यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से सक्रिय है। इसलिए भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन और चट्टानों के खिसकने की घटनाएं यहां स्वाभाविक जोखिम हैं। जब इन प्राकृतिक जोखिमों के साथ जलवायु परिवर्तन और अवैज्ञानिक निर्माण जुड़ जाते हैं, तो आपदा की तीव्रता कई गुना बढ़ जाती है।

हिमालय : एशिया का जल-भंडार

हिमालय का सबसे बड़ा वरदान उसके हिमनद और हिमक्षेत्र हैं। अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) के अनुसार हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों का क्षरण 2000 के बाद और तेज हुआ है और 2000 के बाद बर्फ-हानि की दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2025 में इस क्षेत्र में मौसमी बर्फ की मौजूदगी सामान्य से 23.6 प्रतिशत कम रही, जो लगातार तीसरा कमजोर हिम-वर्ष था।
इसका अर्थ केवल यह नहीं है कि पहाड़ों पर बर्फ कम हो रही है। इसका प्रभाव नदी के प्रवाह, कृषि, पेयजल, जलविद्युत, वनस्पति, पशुपालन और पूरे पर्वतीय जीवन पर पड़ता है। हिमनदों के पीछे हटने से प्रारंभिक दौर में अचानक अधिक जल उपलब्ध हो सकता है, लेकिन दीर्घकाल में जलस्रोतों के कमजोर पड़ने का खतरा बढ़ता है। साथ ही हिमनदीय झीलों का विस्तार और उनका अचानक टूटना, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (यानी GLOF) कहा जाता है, नीचे बसे क्षेत्रों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
बदलता पर्यावरण और असंतुलित विकास
हिमालय की समस्या केवल जलवायु परिवर्तन नहीं है। समस्या तब गंभीर होती है जब प्राकृतिक रूप से संवेदनशील भूभाग पर मनुष्य अत्यधिक दबाव डालता है। सड़क निर्माण के लिए पहाड़ों को काटना, सुरंगों और बांधों के लिए बड़े पैमाने पर विस्फोट, नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में निर्माण, अत्यधिक पर्यटन, अनियोजित शहरीकरण, जंगलों की कटाई, होटल-रिसॉर्टों का विस्तार और कूड़े का बढ़ता बोझ हिमालय की वहन क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं।
हिमालय को मैदान की तरह नहीं देखा जा सकता। मैदान में जहां एक सड़क के समानांतर दूसरी सड़क बनाई जा सकती है, वहीं पहाड़ में सड़क बनाने के लिए पहाड़ का एक हिस्सा काटना पड़ता है। इससे ढलान अस्थिर हो सकती है। जहां नदी को स्थान चाहिए, वहां यदि भवन खड़े कर दिए जाएं तो बाढ़ का पानी अपना रास्ता स्वयं बनाएगा। इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हिमालय में विकास हो या नहीं। प्रश्न यह होना चाहिए कि हिमालय में विकास किस प्रकार का हो।
एक शताब्दी की आपदाएं : प्रकृति की चेतावनी
विगत लगभग सौ वर्षों का इतिहास हिमालय की संवेदनशीलता का प्रमाण है। 1934 का बिहार-नेपाल भूकंप, 1950 का असम-तिब्बत भूकंप, 1991 का उत्तरकाशी भूकंप, 1999 का चमोली भूकंप, 2005 का कश्मीर भूकंप और 2015 का नेपाल भूकंप हिमालयी भूभाग की भूकंपीय सक्रियता को दर्शाते हैं। 2015 के नेपाल भूकंप में लगभग 8,900 लोगों की मृत्यु हुई और भारी आर्थिक क्षति हुई। 1998 का मालपा भूस्खलन, 2013 की केदारनाथ एवं उत्तराखंड त्रासदी, 2021 की चमोली आपदा और 2023 का सिक्किम हिमनदीय झील विस्फोट हिमालयी क्षेत्र की दूसरी बड़ी चुनौती, जलवायु एवं भू-पर्यावरणीय अस्थिरता की ओर संकेत करते हैं।

केदारनाथ : एक अमिट चेतावनी

जून 2013 की केदारनाथ त्रासदी आधुनिक भारत की सबसे भयावह हिमालयी आपदाओं में गिनी जाती है। अत्यधिक वर्षा, बादल फटना, हिमनदीय झील/हिमक्षेत्र से आया पानी, भूस्खलन और मलबे ने मिलकर मंदाकिनी घाटी में अभूतपूर्व तबाही मचाई। हजारों लोग मारे गए या लापता हुए और हजारों मकान, सड़कें तथा पुल नष्ट हुए। वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस घटना में भूस्खलन और मलबे के प्रवाह की भूमिका को भी रेखांकित किया है। केदारनाथ ने हमें बताया कि तीर्थयात्रा और पर्यटन के नाम पर हिमालय की वहन क्षमता की उपेक्षा कितनी महंगी पड़ सकती है।

नेपाल जल-प्रलय : भविष्य की चेतावनी

अगस्त 2026 की नेपाल-तिब्बत सीमा की त्रासदी इस चेतावनी को और गंभीर बनाती है। 26 अगस्त को हिमनदीय क्षेत्र में बर्फ और चट्टान के टूटने से उत्पन्न मलबे और जल का विशाल प्रवाह नीचे की नदी घाटियों में पहुंचा। उपग्रह और प्रारंभिक वैज्ञानिक विश्लेषणों ने इसे हिमनदीय ढहाव और उससे जुड़े मलबा-प्रवाह से जोड़ा है।
30 अगस्त तक विभिन्न स्रोतों में मृतकों और लापता लोगों की संख्या तेजी से बदल रही थी; कुछ रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 750 से अधिक और हजारों लोगों के लापता होने की सूचना थी, जबकि अन्य नवीन रिपोर्टों में आंकड़े इससे भी अधिक बताए गए। बचाव कार्य कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जारी रहा।
हिमालयी संस्कृति का संकट
हिमालय को बचाने का अर्थ केवल पेड़, बर्फ और नदियों को बचाना नहीं है। हिमालय के साथ एक अद्भुत लोक-संस्कृति जुड़ी हुई है।
यहां के गांवों में जलस्रोतों को देवता मानने, जंगलों को पवित्र मानने, नदियों की पूजा करने और पर्वतों के प्रति श्रद्धा रखने की परंपरा रही है। उत्तराखंड की नंदा देवी राजजात, हिमाचल की देव-परंपरा, नेपाल की पर्वतीय संस्कृति, भूटान की प्रकृति-केंद्रित जीवनशैली और हिमालय के अनेक बौद्ध एवं हिंदू तीर्थ इस सांस्कृतिक विरासत के उदाहरण हैं।
जब जंगल बचता है तो जलस्रोत बचता है, जलस्रोत बचता है तो गांव बचता है, गांव बचता है तो लोकभाषा, लोकगीत, लोकदेवता, लोकपर्व और पारंपरिक ज्ञान बचता है। इसीलिए हिमालय का पर्यावरण बचाना वस्तुतः हिमालयी संस्कृति को बचाना है।

हिमालय वैश्विक चेतना का शिखर

हिमालय की रक्षा के लिए सबसे पहले प्रत्येक हिमालयी क्षेत्र की वहन क्षमता का वैज्ञानिक निर्धारण होना चाहिए। जहां जितना पर्यटन संभव है, उससे अधिक अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। दूसरे, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में निर्माण पर कठोर नियंत्रण हो। तीसरे, सड़क, सुरंग, बांध और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुसार हो। चौथे, हिमनदों और हिमनदीय झीलों की निरंतर उपग्रह तथा जमीनी निगरानी की जाए और वास्तविक समय पर चेतावनी देने वाली प्रणालियां विकसित की जाएं।
हिमालय हमें केवल ऊंचाई नहीं देता, वह हमें जीवन देता है। आज आवश्यकता हिमालय पर विजय पाने की नहीं, हिमालय के साथ सह-अस्तित्व सीखने की है। हमें ऐसी विकास नीति चाहिए जिसमें सड़क भी बने, लेकिन पहाड़ न टूटे, बिजली भी बने, लेकिन नदी का जीवन न मरे, पर्यटन भी बढ़े, लेकिन स्थानीय संस्कृति न मिटे, तीर्थ भी विकसित हों, लेकिन तीर्थभूमि की पवित्रता नष्ट न हो। यदि हिमालय सुरक्षित है तो उसकी नदियां सुरक्षित हैं, नदियां सुरक्षित हैं तो मैदान सुरक्षित हैं और मैदान सुरक्षित हैं तो सभ्यता सुरक्षित है।

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