बल प्रयोग पर भारी पड़ी मुख्यमंत्री की रणनीति
वरिष्ठ पत्रकार मनीष की खास रिपोर्ट
बिना किसी दबाव और उकसावे में आए उत्तराखंड पुलिस और प्रशासन ने दिखाया दृढ़ता व संयम
अजनाला से रामपुर तिराहा तक का सबक: देवभूमि की शांति और अर्थव्यवस्था को दंगों से बचाने की अपनाई रणनीति
वरिष्ठ पत्रकार मनीष चंद्र भट्ट की कलम से
देहरादून।उत्तराखंड में हाल ही में हुए निहंग प्रकरण (कर्णप्रयाग से लेकर नगरासू और हिमाचल-उत्तराखंड के कुल्हाल-नाहन बॉर्डर तक) के दौरान मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड सरकार, शासन, प्रशासन और पुलिस की भूमिका बेहद चुनौतीपूर्ण रही। इस पूरे घटनाक्रम को यदि निष्पक्ष और तार्किक दृष्टि से देखा जाए, तो शासन-प्रशासन ने ‘लॉ एंड ऑर्डर’ (कानून-व्यवस्था) को अक्षुण्ण रखने और ‘मैच्योर डिप्लोमेसी’ (परिपक्व कूटनीति) के बीच एक बेहतरीन संतुलन स्थापित किया। इसे अकेला उत्तराखण्ड का किस्सा समझकर कुछ लोग बेवजह तूल न दें। देश भर में अतीत में कई मर्तबा ऐसे विवाद आए हैं जब व्यापक जन हित में पुलिस और प्रशासन को सख्ती दिखाने के बजाय एक कदम पीछे हटकर सुलह से मसले को शांत करना पड़ा।

दरअसल, इसे ऐसे समझा जा सकता है। किसी भी संवेदनशील या धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामले में पुलिस के सामने दो रास्ते होते हैं। या तो अत्यधिक बल प्रयोग कर स्थिति को तत्काल दबा दिया जाए, जिसका परिणाम अक्सर हिंसा को भड़कता है। या फिर कानून की मर्यादा बनाए रखते हुए बातचीत का रास्ता अपनाया जाए। उत्तराखंड सरकार और पुलिस प्रशासन ने कर्णप्रयाग से लेकर कुल्हाल बॉर्डर तक ‘दबाव में आए बिना दृढ़ता’ और ‘उकसावे के बीच संयम’ का जो परिचय दिया, उसी का परिणाम है कि इतना बड़ा विवाद बिना किसी बड़ी जनहानि या सांप्रदायिक तनाव के शांतिपूर्ण समझौते की ओर बढ़ गया।
अब जहां तक स्थानीय जनता की नाराजगी की बात कुछ लोग अपने राजनीतिक हितों के लिए सोशल मीडिया पर फैला रहे हैं, वह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है। जब अपनी ही धरती पर बाहरी तत्वों द्वारा हथियार लहराए जाएं या उग्र भाषा का प्रयोग हो, तो समाज में असुरक्षा और आक्रोश की भावना पैदा होना लाजिमी है। पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि प्रशासन ‘नरमी’ बरत रहा है या किसी के दबाव में है, लेकिन जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो समझ आता है कि कभी-कभी “बड़ी तबाही को टालने के लिए तात्कालिक आक्रोश को सहना” पुलिस और सरकार का सबसे बड़ा समझदारी या मजबूरी वाला निर्णय होता है।
अतीत में देश में ऐसे कई वाकये हुए हैं जहां सरकारों ने ‘भावनाओं’ के बहाने लाठी-गोली चलाने के बजाय ‘रणनीतिक धैर्य’ दिखाया, ताकि पूरे राज्य को दंगों की आग में झुलसने से बचाया जा सके।
आइये इसे उत्तराखण्ड और पंजाब के ही दो मामलों को उदाहरण के रूप में देखते हैं।
1- उत्तराखंड के संदर्भ में ही अगर देखें, तो 1994 का रामपुर तिराहा कांड इस बात का सबसे बड़ा और दर्दनाक उदाहरण है कि जब प्रशासन तात्कालिक स्थिति में ‘संयम’ खो देता है और ‘बल प्रयोग’ का रास्ता चुनता है, तो उसके परिणाम कितने भयानक होते हैं।
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी शांतिपूर्ण ढंग से दिल्ली जा रहे थे। तत्कालीन उत्तर प्रदेश प्रशासन ने सूझबूझ और बातचीत के बजाय दमन चक्र चलाया, बैरिकेडिंग की और गोलीबारी की।
उस घटना ने पूरे उत्तराखंड को दशकों तक गहरे घाव दिए। आज की उत्तराखंड सरकार और पुलिस प्रशासन के जेहन में यह बात साफ रहती है कि हथियारबंद या उग्र भीड़ पर किया गया एक भी गलत बल प्रयोग (गोली या लाठीचार्ज) पूरे राज्य को लंबे समय के लिए अशांत कर सकता है।
निहंगों के मामले में यदि पुलिस कुल्हाल बॉर्डर या नगरासू में बल प्रयोग करती, तो टकराव हिंसक होता, जिससे चारधाम यात्रा और हेमकुंड साहिब की यात्रा तुरंत ठप हो जाती, जिसका सीधा नुकसान उत्तराखंड के ही स्थानीय व्यापारियों, होटल व्यवसायियों और टैक्सी ऑपरेटरों को होता।
2- पंजाब का अजनाला थाना कांड (2023): जब पुलिस ने पीछे हटने में भलाई समझी
हाल के वर्षों में देश की सबसे बड़ी कानून-व्यवस्था की चुनौतियों में से एक घटना पंजाब के अजनाला में हुई थी, जो उत्तराखंड के वर्तमान मामले से काफी मिलती-जुलती है।
फरवरी 2023 में, ‘वारिस पंजाब दे’ के प्रमुख अमृतपाल सिंह के समर्थकों, जिनमें कई निहंग और हथियारबंद लोग शामिल थे, उन्होंने अपने एक साथी की रिहाई के लिए अजनाला थाने पर हमला कर दिया। उनके हाथों में पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब की पालकी और तलवारें थीं।
पुलिस चाहती तो भारी बल प्रयोग कर सकती थी, लेकिन पवित्र ग्रंथ की मर्यादा और हिंसक टकराव के कारण पूरे पंजाब में सिख उग्रवाद के दोबारा पनपने का खतरा था। पुलिस ने उस वक्त पीछे हटना और बातचीत से मामला सुलझाना बेहतर समझा।
सूझबूझ का परिणाम
तात्कालिक रूप से जनता ने पंजाब पुलिस की आलोचना की कि वे ‘डर गए’। लेकिन ठीक एक महीने बाद, जब माहौल शांत हुआ और पुलिस ने पूरी कूटनीति के साथ जाल बिछाया, तो बिना एक भी गोली चलाए अमृतपाल और उसके पूरे नेटवर्क को गिरफ्तार कर असम की डिब्रूगढ़ जेल भेज दिया गया। इसे कहते हैं रणनीति।
जब कोई सरकार किसी उग्र जत्थे पर तुरंत मुकदमा दर्ज करने या उन्हें गिरफ्तार करने के बजाय ‘ससम्मान बॉर्डर पार’ कराती है, तो उसके पीछे निम्नलिखित रणनीतिक कारण होते हैं-
“शहीद का दर्जा” बनने से रोकना

उग्र विचारधारा वाले समूहों की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि वे किसी टकराव में अपने लोगों को ‘शहीद’ या ‘पीड़ित’ के रूप में पेश करें। अगर नगरासू या कुल्हाल में पुलिस लाठीचार्ज करती या गिरफ्तारियां करती, तो पंजाब और अन्य राज्यों से हजारों की संख्या में और निहंग उत्तराखंड की तरफ कूच कर देते। मामला उत्तराखंडियों बनाम सिखों का बन जाता। सरकार ने उन्हें शांत करके वापस भेजकर उनके इस ‘विक्टिम कार्ड’ को छीन लिया।
स्थानीय जनता और अर्थव्यवस्था का संरक्षण
वर्तमान में उत्तराखंड की लाइफलाइन ‘चारधाम यात्रा’ अपने चरम पर है। लाखों स्थानीय परिवारों की आजीविका इसी यात्रा पर टिकी है। यदि बॉर्डर पर या पहाड़ों में हिंसक टकराव होता, तो
यात्रा महीनों के लिए ठप हो जाती। देश भर में देवभूमि की छवि ‘अशांत क्षेत्र’ के रूप में जाती। स्थानीय गढ़वाली और कुमाऊंनी युवाओं का रोजगार छिन जाता। यही नहीं पंजाब में रह रहे और नौकरी कर रहे उत्तराखंडियों को वहां पर दिक्कत झेलनी पड़ सकती थी
प्रशासन ने स्थानीय लोगों के दीर्घकालिक आर्थिक हितों की रक्षा के लिए तात्कालिक आलोचना सहना स्वीकार किया।
“कभी-कभी ‘नो-एक्शन’ भी एक बहुत बड़ा ‘एक्शन’ होता है।”
उत्तराखंड सरकार और पुलिस प्रशासन ने जो किया, वह किसी ‘शह’ के कारण नहीं, बल्कि देवभूमि की शांति, चारधाम यात्रा की सुरक्षा और अपने नागरिकों को एक बहुत बड़े सांप्रदायिक और हिंसक दंगे की आग से बचाने की प्रशासनिक मजबूरी थी। चाणक्य नीति भी कहती है कि जब सामने वाली भीड़ उन्माद में हो, तो उसे बल से नहीं, बल्कि बुद्धि और समय देकर परास्त किया जाना चाहिए। उत्तराखंड प्रशासन ने ठीक यही किया।
मुख्यमंत्री स्तर पर राजनीतिक व प्रशासनिक समन्वय
इस पूरे प्रकरण में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की व्यक्तिगत पहल और राजनीतिक परिपक्वता सबसे महत्वपूर्ण रही। जब मामला अंतर-राज्यीय मोड़ लेने लगा, तो मुख्यमंत्री धामी ने खुद पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से फोन पर संवाद स्थापित किया।
इसके साथ ही, उन्होंने देहरादून में खुद सिख प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर उनकी बातें सुनीं और गृह सचिव व आईजी गढ़वाल को पूरी निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ जांच करने के निर्देश दिए। इस शीर्ष-स्तरीय समन्वय के कारण यह मामला दो राज्यों या दो समुदायों के बीच के टकराव में तब्दील होने से बच गया।
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