नेपाल बॉर्डर से सटे बनबसा में धामी कैबिनेट लेगी अहम फैसले

सीमा पर सरकार:  बाहरी सीमा की चौकसी और भीतरी सुरक्षा ढांचे की मजबूती पर रहेगा फोकस

अविकल उत्तराखण्ड

बनबसा। उत्तराखंड सरकार 4 अक्टूबर को सुबह 11 बजे, भारत-नेपाल सीमा से सटे चंपावत जिले के बनबसा स्थित एनएचपीसी परिसर में अपनी कैबिनेट बैठक करेगी। राज्य के इतिहास में यह पहला अवसर है जब मंत्रिमंडल नेपाल सीमा पर बैठक करेगा।

चंपावत मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का निर्वाचन क्षेत्र होने के साथ-साथ एक संवेदनशील सीमावर्ती जिला भी है, इसलिए इस बैठक को केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम माना जा रहा है।

भारत की नेपाल के साथ लगभग 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जो पाँच राज्यों से होकर गुजरती है: उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम। सशस्त्र सीमा बल (SSB) के अनुसार इसमें उत्तराखंड का हिस्सा लगभग 263.7 किलोमीटर है, जो पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधम सिंह नगर जिलों से लगता है। इसी तरह उत्तर प्रदेश की सीमा लगभग 599 किलोमीटर, बिहार की लगभग 729 से 800 किलोमीटर, पश्चिम बंगाल की लगभग 105 किलोमीटर और सिक्किम की लगभग 99 किलोमीटर है। 1950 की भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि के तहत इस सीमा पर लोगों और सामान की आवाजाही खुली है। यही खुलापन दोनों देशों के “रोटी-बेटी” के रिश्तों की ताकत है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह एक स्थायी चुनौती भी है।

बनबसा की यह बैठक मुख्यमंत्री धामी के उस दृष्टिकोण का विस्तार मानी जा रही है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा और सीमांत क्षेत्रों का विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। पिछले वर्ष नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता के दौरान मुख्यमंत्री ने सीमा पर सघन चेकिंग अभियान चलाने, प्रवेश मार्गों की नियमित निगरानी करने और सीमा पार आवागमन पर विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए थे। उसी समीक्षा में खुफिया सूचना तंत्र को मजबूत करने, सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने और केंद्रीय एजेंसियों से बेहतर तालमेल पर भी जोर दिया गया था। माना जा रहा है कि सीमा पर ही कैबिनेट बैठक कर सरकार यह संदेश देना चाहती है कि सीमांत क्षेत्र उसकी प्राथमिकता के केंद्र में हैं।

आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी इस बैठक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या संरचना में बदलाव को लेकर विभिन्न स्रोतों से मिल रहे इनपुट इस समय केंद्र और राज्यों, दोनों के एजेंडे पर हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जनसांख्यिकीय बदलावों के अध्ययन के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति को सीमा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए हैं। पड़ोसी राज्य बिहार में भी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में नेपाल सीमा पर घुसपैठ, फर्जी दस्तावेज, नकली मुद्रा और मादक पदार्थों की तस्करी पर कड़ी निगरानी के निर्देश दिए हैं। उत्तराखंड में धामी सरकार इससे पहले भी ऐसे इनपुट के आधार पर सत्यापन अभियान चला चुकी है। तब पुलिस नेतृत्व ने स्पष्ट किया था कि 2011 के बाद जनगणना न होने के कारण किसी निष्कर्ष पर सत्यापन के बाद ही पहुँचा जा सकता है। ऐसे में बनबसा बैठक से उम्मीद है कि सीमावर्ती थानों और चौकियों के ढांचे को मजबूत करने, सत्यापन तंत्र को व्यवस्थित बनाने और सीमा क्षेत्र में अवैध अतिक्रमण पर नियमानुसार कार्रवाई जैसे विषयों पर ठोस निर्णय सामने आ सकते हैं।
सुरक्षा के साथ-साथ विकास इस बैठक का घोषित मूल उद्देश्य है। सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों के समग्र विकास, स्थानीय कनेक्टिविटी, आपदा प्रबंधन और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रही है। बैठक में स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा और परिवहन समेत कई विभागों के प्रस्ताव रखे जाने की संभावना है। जानकारों का मानना है कि जब सीमांत गांवों में रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएँ बढ़ती हैं, तो पलायन रुकता है। और आबाद सीमावर्ती गांव अपने आप में सुरक्षा की सबसे मजबूत पहली पंक्ति होते हैं।

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में देहरादून से बाहर कैबिनेट बैठकें पहले भी होती रही हैं। वर्ष 2010 में हरिद्वार की हर की पैड़ी में मंत्रिमंडल की बैठक हुई थी। हालांकि नेपाल सीमा पर राज्य कैबिनेट की यह पहली बैठक है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सीमा सुरक्षा कड़ी करते समय यह संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा कि दोनों देशों के आम लोगों की पारंपरिक आवाजाही पर अनावश्यक असर न पड़े। साथ ही, सत्यापन जैसी कार्रवाइयाँ कानून के दायरे में और बिना किसी भेदभाव के हों। माना जा रहा है कि बनबसा बैठक के बाद सरकार प्रदेश के अन्य जिलों में भी इसी तरह कैबिनेट बैठकें आयोजित कर सकती है, जिससे शासन को जनता के और करीब लाने की यह पहल आगे बढ़ेगी।

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