उत्त्तराखण्ड स्थापना दिवस-बेड़ू पाको बारमासा’…दिल्ली के गढ़वाल भवन से अल्मोड़ा भवन तक

विवेक शुक्ला


उत्तराखंड का आज स्थापना दिवस है। राजधानी दिल्ली में देवभूमि के बहुत से महत्वपूर्ण प्रतीक दशकों पहले ही बन चुके थे। इनमें पंचकुईया रोड का गढ़वाल भवन और साउथ एक्सटेंशन का अल्मोड़ा भवन प्रमुख हैं। इन दोनों कादेवभूमि वालों के लिए वही स्थान है,जैसा किसी पराए देश में बसे प्रवासी भारतीयों के लिए वहां पर स्थित भारतीय एंबेसी का होता है। और साउथ एक्सटेंशन के अल्मोड़ा भवन में कुमाऊं क्षेत्र का अमर लोक गीत ‘बेड़ू पाको बारमासा’ सुनने को मिल सकता है।

Uttarakhand  state
मोहन उप्रेती और नईमा जी।

यहां पर अल्मोड़ा भवन 1954 से है। इसे यहां अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल,बागेश्वर वगैरह से आकर बसे प्रवासियों ने स्थापित किया था। उनमें सर्वश्री बहादुर सिंह नेगी, उमेद सिंह जीना, कल्याण सिंह,धर्मानंद पंत जैसे समाज के जुझारू सदस्य शामिल थे। ये भी उत्तराखंड के लोगों का मिलने-जुलने का अड्डा है।

जब दिल्ली देखती थी गढ़वाली नाटक

दिल्ली में 1980 के दशक के शुरूआती सालों तक गढ़वाली नाटक खूब खेले जाते थे। ये ज्य़ादातर श्रीराम सेंटर में आयोजित होते थे। नई दिल्ली नगर पालिका ( एनडीएमसी) के पूर्व निदेशक ( सूचना) श्री मदन थपलियाल ने भी बहुत से गढ़वाली नाटकों में खास किरदार निभाए। दिल्ली में ग़ढ़वाली नाटकों का श्रीगणेश 1960 के आसपास शुरू हुआ। ललित मोहन थपलियाल ने कई गढ़वाली नाटक लिखे। उनमें खांडू लापता, घरजवाई , काला राजा प्रमुख थे।

इनकी रिहर्सल किदवई नगर के कम्युनिटी सेंटर या फिर सरोजनी नगर के सरकारी फ्लैट्स की छत पर ही हो जाती थी। अब किदवई नगर और सरोजनी के वे सरकारी फ्लैट टूट चुके हैं। गढवाली नाटकों की अखबारों में समीक्षा भी हो जाती थी। इनमें विश्व मोहन बडोला, उमा शंकर चंदोला और उनकी सिंधी मूल की पत्नी सुषमा चंदोला बहुत सक्रिय थे। पर फिर गढवाली नाटकों खेले जाने बंद हो गए। इसकी मोटे तौर पर वजहें आर्थिक ही थीं।

यादें-बातें पवर्तीय कला केन्द्र की

राजधानी में कुमाऊंनी थियेटर भी सशक्त था। इसे शुरू किया था सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और लोक संगीत के मर्मज्ञ मोहन उप्रेती ने ।उनकी कुमांऊनी संस्कृति, लोकगाथों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका रही। वे 1963 में दिल्ली आ गए थे। मोहन उप्रेती ने 1968 में दिल्ली में पर्वतीय क्षेत्र के लोक कलाकारों के सहयोग से पर्वतीयकला केन्द्र की स्थापना की। इसके तहत कुमाऊंनी में अनेक नाटक खेले जाते रहे। राजुला-मालूशाही, रसिक-रमौल, जीतू-बगड़वाल, रामी-बौराणी, अजुवा-बफौल जैसी 13 लोक कथाओं और विश्व की सबसे बड़ी गायी जाने वाली गाथा “रामलीला” का पहाड़ी बोलियों (कुमाऊनी और गढ़वाली) में अनुवाद कर मंच निर्देशन कर प्रस्तुत किया।इनके मंचन कामयनी सभागार में होते थे। कुमाऊंनी नाटकों को देखने के लिए सभागरा खचाखच भरा होता था। इनमें विश्व मोहन बड़ोला, विनोद नागपाल, नईमा खान उप्रेती और उर्मिला नागर जैसे रंगमंच के मंजे हुए कलाकार शामिल होते थे। मोहन उप्रेती की 1992 में अकाल मौत के कारण दिल्ली में कुमाऊंनी रंगमंच को झटका अवश्य लगा। उप्रेती जी ने ही दिल्ली में कुमाउंनी रामलीला की नींव रखी थी । वहां की रामलीला संवाद की बजाय ओपेरो अंदाज में होती है। यानी ये गायन पर आधारित रहती है।

आओ चलें वीरचंद्र सिंह गढ़वाली मार्ग

साउथ दिल्ली के किदवई नगर में आपको मिलेगा वीर चंद्र सिंह गढ़वाली मार्ग। वीर चंद्रसिंह गढ़वाली कौन थे? बता दें कि उनका असली नाम चंद्रसिंह भंडारी था, पर वे विख्यात वीर चंद्रसिंह गढ़वाली नाम से हुए। वे गढवाल राइफल्स में थे। उन्होंने पहले विश्व युद्ध में भाग लिया था। विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद उनकी बटालियन को पेशावर भेजा गया। वहां स्वतंत्रता संग्राम की लौ जली हुई थी। अंग्रेज इसे कुचलना चाह रहे थे। इसी काम के लिये 23 अप्रैल 1930 को गढवाली को पेशावर में आंदोलन कारियों पर गोलियां चलाने का आदेश मिला। पर गढवाली के नेतृत्व में इनके साथियों ने निहत्थों पर गोली नहीं चलाईं। इसी के बाद से चन्द्रसिंह को वीर चद्रसिंह गढ़वाली का नाम मिला और इनको पेशावर कांड का हीरो माना जाने लगा। इस बीच, वीर चंद्रसिंह गढ़वाली के नाम पर साकेत में एक सर्वोदय विद्यालय भी है।

कहां गए नेगी, बिष्ट, बहुगुणा

देखते ही देखते किसी खास एरिया में आबादी का चरित्र कैसे बदलता है, इसे जानने के लिये राऊस एवेन्यू, प्रेस रोड, जहांगीर रोड, अहिल्याबाई मार्ग, कोटला मार्ग का चक्कर लगा लेना जरूरी है । ये सब मिन्टो रोड का हिस्सा हैं । आप समझ लें कि इनमें 90 के दशक के अंत तक गढ़वाल के दर्ज़नों परिवार रहते थे। हर दूसरे घर की नेम प्लेट पर डबराल, रावत, गुसाई, थपलियाल, बिष्ट जैसे सर नेम लिखे होते थे। ये सब भारत सरकार के मुलाजिम थे। इन देव भूमि वालों ने पर्वतीय रामलीला भी राऊस एवेन्यू में शुरु की थी। जो लगभग आधी सदी तक चली। पर अब आप इन इलाकों में फिर जाएंगे तो गढ़वाली सर नेम वाली नेम प्लेट नदारद मिलेंगी। साफ़ है कि अब गढ़वाली परिवारों के युवा प्राय: सरकारी नौकरी नहीं करते। इसलिए मिन्टो रोड से शिफ्ट कर गये गढ़वाली परिवार।

दरअसल1930 के आसपास गढ़वाल से लोगों ने दिल्ली का रुख करना शुरू किया था। ये भारत सरकार की नौकरियां करने लगे। इन्हें मिन्टो रोड में सरकारी घर मिले । तब कुमाऊं से कम लोग इधर आए थे। कहते हैं, 1970 तक तो दिल्ली में आने वाले कई गढ़वाली रिटायर होने के बाद वापस गढ़वाल चले जाते थे। पर उसके बाद जो आए तो फिर वे इधर के ही होकर गए। ये लोग ज्यादा प्रेक्टिकल थे। इन्हें समझ आ गया था कि गांव से भावनात्मक संबंध बनाए रखना तो ठीक हो सकता है, पर वहां पर वापस जाने का कोई मतलब नहीं है। ये

गढ़वाल के तमाम इलाकों जैसे पौढ़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल, रुद्धप्रयाग, उतरकाशी,चमोली वगैरह से दिल्ली आए थे। अब दिल्ली-एनसीआर में इनकी चौथी पीढ़ी चल रही है। इनकी फूड हैबिटज भी दिल्ली वालों की तरह ही हो गई है। अब मंडवे की रोटी या दाल भरी रोटी कम ही परिवारों में खाई जाती है। यानी अब खान-पान स्थानीय हो गया है। मिन्टो रोड के अलावा लोधी रोड,आईएनए, अलीगंज,सरोजनी भी भरा होता था गढ़वाली परिवारों से। इन सबमें नगर निगम चुनाव से लेकर लोक सभा चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार के हक में प्रचार के लिए हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी जैसे कद्वार नेता अवश्य आते थे।

लेखक व पत्रकार विवेक शुक्ला कई नामचीन मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण पदो पर कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में दिल्ली से विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अपने बेहतरीन लेखों के जरिये चर्चाओं में रहते हैं।

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