ब्रेकिंग- वन विभाग के आलाधिकारी सुहाग व किशन चन्द्र निलम्बित, कार्बेट निदेशक राहुल को हटाया

पूर्व वन मंत्री हरक सिंह के कार्यकाल में हुआ था कार्बेट में निर्माण कार्य

अविकल उत्तराखंड

देहरादून। कार्बेट नेशनल पार्क में हुए निर्माण कार्यों में भारी गड़बड़ी की पुष्टि के बाद शासन ने पूर्व मुख्य वन्य जन्तु प्रतिपालक जे एस सुहाग ,डीएफओ किशन चंद्र को निलंबित कर दिया। जबकि कार्बेट के निदेशक राहुल को मौजूदा पद से हटाते हुए प्रमुख वन सरंक्षक कार्यालय से सम्बद्ध कर दिया है। प्रमुख सचिव आर के सुधांशु की ओर से बुधवार ऊ यह आदेश किये गए।

पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में वन मंत्री रहे हरक सिंह रावत के कार्यकाल में कार्बेट में नियमों के विपरीत निर्माण कार्य हुए थे। इस दौरान पेड़ों का अवैध कटान भी किया गया था। इस मामले की NTCA के जांच दल ने स्थलीय निरीक्षण कर गड़बड़ी पकड़ी थी।

पूर्व वन मंत्री हरक सिंह मुश्किल में

गौरतलब है कि कार्बेट नेशनल पार्क के अन्तर्गत कंडी रोड निर्माण, मोरघट्टी तथा पाखरी वन विश्राम गृह परिसर में भवनों का निर्माण, पाखरौ वन विश्राम गृह के समीप जलाशय का निर्माण, पाखरौ में प्रस्तावित टाईगर सफारी में वृक्षों के अवैध पातन तथा भारतीय वन अधिनियम, 1927 वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 तथा वित्तीय नियमों के उल्लघन के संबंध में Assistant Inspector General of Forest (NTCA) के पत्र दिनांक 22.10.2021 द्वारा एन०टी०सी०ए० के जाँच दल द्वारा प्रस्तुत जांच आख्या दिनांक 22.10.2021 के क्रम में कॉर्बेट टाईगर रिजर्व में बरती गई अनियमितताओं का उल्लेख करते हुए दोषी अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही करने के निर्देश दिये गये हैं।

2 एन०टी०सी०ए० द्वारा प्रस्तुत उक्त जांच आख्या में कण्डी रोड निर्माण, मोरघट्टी तथा पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर में भवनों का निर्माण, पाखरौ वन विश्राम गृह के समीप जलाशय का निर्माण तथा पाखरौ में प्रस्तावित टाइगर सफारी में वृक्षों के अवैध पातन के संबंध में गंभीर अनियमिततायें पकड़ी थी।

स्थानान्तरण / तैनाती आदेश
श्री राहुल (भा०व०से०-उत्तराखण्ड संवर्ग), मुख्य वन संरक्षक / निदेशक, कार्बेट टाइगर रिजर्व, रामनगर नैनीताल को तत्काल प्रभाव से उनकी वर्तमान तैनाती निदेशक, कार्बेट टाइगर रिजर्व, रामनगर, नैनीताल के पदभार से अवमुक्त करते हुये प्रमुख वन संरक्षक (HoFF). उत्तराखण्ड, देहरादून के कार्यालय से सम्बद्ध किया जाता है।
(रमेश कुमार सुधांशु प्रमुख सचिव

DFO किशन चन्द्र निलम्बित

उत्तराखण्ड शासन
वन अनुभाग-1
संख्या – 472 / GEN / X – 1 – 2022-02 (12) / 2021 देहरादूनः दिनांक: 27 अप्रैल, 2022
कार्यालय ज्ञाप / निलम्बन आदेश
कार्बेट नेशनल पार्क के अन्तर्गत कंडी रोड निर्माण, मोरघट्टी तथा पाखरी वन विश्राम गृह परिसर में भवनों का निर्माण, पाखरौ वन विश्राम गृह के समीप जलाशय का निर्माण, पाखरौ में प्रस्तावित टाईगर सफारी में वृक्षों के अवैध पातन तथा भारतीय वन अधिनियम, 1927 वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 तथा वित्तीय नियमों के उल्लघन के संबंध में Assistant Inspector General of Forest (NTCA) के पत्र दिनांक 22.10.2021 द्वारा एन०टी०सी०ए० के जाँच दल द्वारा प्रस्तुत जांच आख्या दिनांक 22.10.2021 के क्रम में कॉर्बेट टाईगर रिजर्व में बरती गई अनियमितताओं का उल्लेख करते हुए दोषी अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही करने के निर्देश दिये गये हैं।
2 एन०टी०सी०ए० द्वारा प्रस्तुत उक्त जांच आख्या में कण्डी रोड निर्माण, मोरघट्टी तथा पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर में भवनों का निर्माण, पाखरौ वन विश्राम गृह के समीप जलाशय का निर्माण तथा पाखरौ में प्रस्तावित टाइगर सफारी में वृक्षों के अवैध पातन के संबंध में निम्नवत गंभीर अनियमिततायें परिलक्षित हुई हैं:
(i) कंडी रोड में आरसीसी बीम और क्रास बीम का प्रयोग किया गया है तथा उसमें प्रयोग होने वाले मिट्टी को समीपस्थ वन क्षेत्र से जो कि 50 से 100 मीटर की दूरी पर है, भारी मशीनों का प्रयोग करते हुये लाया गया तथा टाइगर अधिवास को क्षति पहुंचाई गयी।
(ii) मौके पर उपस्थित प्रभागीय वनाधिकारी कार्यबल के द्वारा यह अवगत कराया गया कि उक्त निर्मित रोड़ पेट्रोलिंग हेतु प्रयोग में लाया जायेगा। उक्त रोड़ पर एकल स्पैन के पांच पुल / कल्वर्ट लगभग 5 मीटर चौड़ाई के निर्मित किये गये हैं जो एकल लेन के हाईवे की आवश्यकता को पूरा करते हैं। वित्तीय संसाधनों के संबंध में उल्लिखित किया गया है कि प्रभागीय वनाधिकारी कार्यबल के द्वारा बिना वित्तीय एवं तकनीकी स्वीकृति के कार्य कराये गये हैं।
(ii) मोरघट्टी तथा पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर में भवनों का निर्माण के संबंध में प्रभागीय वनाधिकारी द्वारा उक्त निर्माण स्टाफ क्वार्टर के रूप में होने के संबंध में गलत कथन किये जाने और इस संबंध में फर्जी अभिलेख प्रस्तुत किये जाने का जांच आख्या में उल्लेख किया गया है। उक्त निर्माण कार्य हेतु वित्तीय संसाधनों के संबंध में उल्लिखित किया गया है कि प्रभागीय वनाधिकारी द्वारा उक्त निर्माण कार्य बिना वित्तीय एवं तकनीकी स्वीकृति के कराये गये हैं।
(iv) पाखरौ वन विश्राम गृह के समीप जला के संबंध में उल्लिखित किया गय है कि उक्त जलाशय का निर्माण सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना कराया गया है तथा प्रभागीय वनाधिकारी के कथन के विपरीत उक्त जलाशय के निर्माण में वृक्षों के अवैध पातन होने का उल्लेख किया गया है।
(v) पाखरी में प्रस्तावित टाइगर सफारी के निर्माण में 163 वृक्षों के पातन की अनुमति के विपरीत कहीं अधिक संख्या में वृक्षों का पातन किया गया है।
उक्तानुसार राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण द्वारा प्रस्तुत जांच आख्या से यह स्पष्ट है कि कण्डी रोड निर्माण, मोरघट्टी तथा पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर में भवनों का निर्माण, पाखरौ वन विश्राम गृह के समीप जलाशय का निर्माण तथा पाखरौ में प्रस्तावित टाइगर सफारी में वृक्षों के अवैध पातन के संबंध में वैधानिक प्रशासनिक तथा वित्तीय स्वीकृति के बिना नियम विरूद्ध कार्य किया गया है, जो कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 तथा वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के प्राविधानों के विरुद्ध है।
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उक्त के अतिरिक्त उप महानिरीक्षक, वन, भारत सरकार पर्यावरण, वन एवं
जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा पत्र दिनांक 28.12.2021 के माध्यम से निम्नवत तथ्यों से शासन को अवगत कराया गया है (1) सनेह वन विश्राम गृह में वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 में विहित प्राविधानों के विरुद्ध बिना पूर्वानुमति के निर्माण कार्य कराया गया है।
(ii) पाखरौ टाइगर सफारी में किये गये निर्माण कार्यों में नियमानुसार प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग न करते हुये ढ़ांचे के निर्माण में कंक्रीट का प्रयोग किया गया है। (iii) पाखरौ टाइगर सफारी के निर्माण में अनुमति से अधिक संख्या में वृक्षों का
अवैध पातन किया गया है।
(iv) पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर में वैधानिक / प्रशासनिक / वित्तीय स्वीकृति के
बिना नियम विरुद्ध निर्माण कार्य किया गया है।
(v) मोरघट्टी वन विश्राम गृह परिसर में निर्माण कार्य बिना वित्तीय एवं प्रशासनिक
स्वीकृति के कराये गये हैं। (vi) पाखरौ से कालागढ़ पेट्रोलिंग रोड के आसपास के क्षेत्र से बड़ी मात्रा में मिट्टी हटायी गयी है, जो कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 तथा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्राविधानों के विरूद्ध है।
(vii) पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर के निकट निर्मित जलश्रोत / जलाशय के निर्माण में वृक्षों का अवैध पातन किया गया है, जो कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 तथा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्राविधानों के विरूद्ध है।
(viii) कुगड्डा फॉरेस्ट कैम्प, पालेन रेन्ज, कालागढ़ टाइगर रिजर्व में निर्माण कार्य बगैर वैधानिक / प्रशासनिक / वित्तीय स्वीकृति के किया गया है।
उक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि उक्तानुसार कराये गये निर्माण कार्य तथा वृक्षों का अवैध पातन बिना किसी वैधानिक / प्रशासनिक / वित्तीय स्वीकृति के किया गया है जो कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 तथा वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के प्राविधानों के विरुद्ध हैं।
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विषयगत प्रकरण के संबंध में मा० उच्च न्यायालय, नैनीताल द्वारा स्वतः संज्ञान लेते हुये Writ Petition (PIL) No. 178 of 2021, “Sou Motu PIL: In the matter of illegal construction in Corbett tiger reserve vs. Union of India & Others विचाराधीन है। उक्त जनहित याचिका में मा० उच्च न्यायालय के निर्देशों के क्रम में जिसमें मा० न्यायालय द्वारा -3
प्रतिवादीगणों को आख्या प्रस्तुत किये जाने के हेतु निर्देशित किया गया है। उक्त जनहित याचिका में मा० उच्च न्यायालय के निर्देशों के क्रम में प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) व निदेशक, कार्बेट टाइगर रिजर्व के साथ प्रश्नगत क्षेत्र की दिनांक 30.102021 को किये गये संयुक्त निरीक्षण के क्रम में प्रमुख वन संरक्षक, उत्तराखण्ड, देहरादून द्वारा अपने पत्र सं0-802 / पी0ओ0, दिनांक: 02.11.2021 के माध्यम से अवगत कराया गया है कि कालागढ़ टाइगर रिजर्व प्रभाग के अन्तर्गत मोरघट्टी वन विश्राम गृह परिसर व पाखरो वन विश्राम गृह परिसर में निर्माण पर्यटन की दृष्टि से किया गया है, जो वन संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन है। अवगत कराया गया है कि उक्त निर्माण हेतु विभाग द्वारा न तो पूर्व में कोई बजट स्वीकृत था और न ही कोई प्रशासनिक अथवा वित्तीय अनुमति प्रदान की गई थी। प्रमुख वन संरक्षक, उत्तराखण्ड, देहरादून द्वारा अपने उक्त पत्र में उल्लिखित किया गया है कि उक्त समस्त कार्यवाही सुनियोजित व चरणबद्ध तरीके से की गई है, जिसमें प्रभागीय वनाधिकारी, कालागढ़ टाइगर रिजर्व की भूमिका प्रश्नजनक है।
5 प्रकरण के सम्बन्ध में मुख्य स्थायी अधिवक्ता, मा० उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के पत्र दिनांक: 07.01.2022 के माध्यम से मा० उच्च न्यायालय में विचाराधीन “Writ Petition (PIL) No. 178 of 2021. Suo Motu PIL: In the matter of illegal construction in Corbett Tiger Reserve Vs. Union of India and others” में दिनांक: 06.01.2022 को सम्पन्न सुनवाई में श्री किशन चन्द के विरूद्ध प्रकरण में आरोपों के दृष्टिगत कार्यवाही हेतु मा० उच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित किया जाने से अवगत कराया गया है।
6 उपर्युक्तानुसार राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण द्वारा प्रस्तुत जांच आख्या में की गयी संस्तुति, प्रमुख वन संरक्षक, उत्तराखण्ड, देहरादून द्वारा के पत्र दिनांक: 02.11.2021 द्वारा उपलब्ध करायी गई आख्या तथा प्रकरण के सम्बन्ध में मा० उच्च न्यायालय में विचाराधीन जनहित याचिका सं0-178/2021 में दिनांक: 06.01.2022 को सम्पन्न सुनवाई में मा० उच्च न्यायालय के निर्देशों के क्रम में तत्कालीन उप वन संरक्षक, कालागढ़ टाइगर रिजर्व, लैंसडौन के कार्यकाल में जिम कॉर्बेट टाईगर रिजर्व में हुए अवैध निर्माण एवं वृक्षों के पातन सम्बन्धी समस्त कार्यवाही सुनियोजित एवं सोची समझी योजना के तहत चरणबद्ध रूप से की गई प्रतीत होती है। उक्त प्रकार का कृत्य न केवल अनियमितता की श्रेणी में आता है, बल्कि अवैधानिक है तथा वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितता, वैधानिक आदेशों का उल्लंघन एवं अपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है।
7 राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण की आख्या/ संस्तुति एवं प्रमुख वन संरक्षक, उत्तराखण्ड, देहरादून द्वारा प्रस्तुत आख्या तथा वर्णित तथ्यों के आलोक में उक्त प्रकरणों में श्री किशन चन्द, उप वन संरक्षक / तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी, कालागढ़ टाइगर रिजर्व वन प्रभाग द्वारा अपने पदीय दायित्वों से इतर आचरण, वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितता, वैधानिक आदेशों के उल्लंघन तथा अपराधिक श्रेणी के कृत्यों में सम्मिलित होना तथा अखिल भारतीय सेवायें (आचरण) नियमावली, 1968 का पालन न किया जाना परिलक्षित होता है।
8 अतः उक्त के क्रम में अखिल भारतीय सेवायें (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1969 के नियम-3 के उप नियम-1 के खण्ड-2 में प्रदत्त शक्तियों के अधीन श्री किशन चन्द, उप वन संरक्षक को तत्काल प्रभाव से निलम्बित किया जाता है।
9 श्री किशन चन्द को यह भी निर्देशित किया जाता है कि वे निलम्बन की अवधि में सक्षम स्तर की अनुमति के बिना मुख्यालय नहीं छोड़ेंगे।
10 निलम्बन अवधि के दौरान श्री किशन चन्द को अखिल भारतीय सेवायें (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1969 के नियम-4 में उल्लिखित प्रावधानों/प्रतिबंधों / शर्तों के अधीन जीवन निर्वाह भत्ता अनुमन्य होगा।
( रमेश कुमार सुधांशु )

पूर्व मुख्य वन्य जन्तु प्रतिपालक जे एस सुहाग निलम्बित

उत्तराखण्ड शासन वन अनुभाग-1
संख्या – 473 / GEN/X-1-2022-02 (10)/2021 टी०सी० देहरादूनः दिनांक: 27 अप्रैल, 2022
कार्यालय ज्ञाप / निलम्बन आदेश
कार्बेट नेशनल पार्क के अन्तर्गत कंडी रोड निर्माण, मोरघट्टी तथा पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर में भवनों का निर्माण, पाखरौ वन विश्राम गृह के समीप जलाशय का निर्माण, पाखरौ में प्रस्तावित टाईगर सफारी में वृक्षों के अवैध पातन तथा भारतीय वन अधिनियम, 1927, वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 तथा वित्तीय नियमों के उल्लंघन के संबंध में Assistant Inspector General of Forest (NTCA) के पत्र दिनांक 22.10.2021 द्वारा एन०टी०सी०ए० के जॉच दल द्वारा प्रस्तुत जांच आख्या दिनांक 22.10.2021 के क्रम में कॉर्बेट टाईगर रिजर्व में बरती गई अनियमितताओं का उल्लेख करते हुए दोषी अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही करने के निर्देश दिये गये हैं।
2 एन०टी०सी०ए० द्वारा प्रस्तुत उक्त जांच आख्या में कण्डी रोड निर्माण, मोरघट्टी तथा पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर में भवनों का निर्माण, पाखरौ वन विश्राम गृह के समीप जलाशय का निर्माण तथा पाखरौ में प्रस्तावित टाइगर सफारी में वृक्षों के अवैध पातन के संबंध में निम्नवत गंभीर अनियमिततायें परिलक्षित हुई हैं:
(i) कंडी रोड में आरसीसी बीम और क्रास बीम का प्रयोग किया गया है तथा उसमें प्रयोग होने वाले मिट्टी को समीपस्थ वन क्षेत्र से जो कि 50 से 100 मीटर की दूरी पर है, भारी मशीनों का प्रयोग करते हुये लाया गया तथा टाइगर अधिवास को क्षति पहुंचाई गयी।
(ii) मौके पर उपस्थित प्रभागीय वनाधिकारी कार्यबल के द्वारा यह अवगत कराया गया कि उक्त निर्मित रोड़ पेट्रोलिंग हेतु प्रयोग में लाया जायेगा। उक्त रोड़ पर एकल स्पैन के पांच पुल / कल्वर्ट जो लगभग 5 मीटर चौड़ाई के निर्मित किये गये हैं जो एकल लेन के हाईवे की आवश्यकता को पूरा करते हैं। वित्तीय संसाधनों के संबंध में उल्लिखित किया गया है कि प्रभागीय वनाधिकारी कार्यबल के द्वारा बिना वित्तीय एवं तकनीकी स्वीकृति के कार्य कराये गये हैं। (ii) मोरघट्टी तथा पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर में भवनों का निर्माण के संबंध में प्रभागीय वनाधिकारी द्वारा उक्त निर्माण स्टाफ क्वार्टर के रूप में होने के संबंध में गलत कथन किये जाने और इस संबंध में फर्जी अभिलेख प्रस्तुत किये जाने का जांच आख्या में उल्लेख किया गया है। उक्त निर्माण कार्य हेतु वित्तीय संसाधनों के संबंध में जांच आख्या में उल्लिखित किया गया है कि प्रभागीय वनाधिकारी द्वारा उक्त निर्माण कार्य बिना वित्तीय एवं तकनीकी स्वीकृति के कराये गये हैं।
(iv) पाखरौ वन विश्राम गृह के समीप जलाशय के संबंध में उल्लिखित किया गया है कि उक्त जलाशय का निर्माण सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना कराया गया है तथा प्रभागीय वनाधिकारी के कथन के विपरीत उक्त जलाशय के निर्माण में वृक्षों के अवैध पातन होने का उल्लेख किया गया के
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(v) पाखरौ में प्रस्तावित टाइगर सफारी के निर्माण में 163 वृक्षों के पातन की अनुमति के विपरीत कहीं अधिक संख्या में वृक्षों का पातन किया गया है।
उक्तानुसार राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण द्वारा प्रस्तुत जांच आख्या से यह स्पष्ट है कि कण्डी रोड निर्माण, मोरघट्टी तथा पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर में भवनों का निर्माण, पाखरी वन विश्राम गृह के समीप जलाशय का निर्माण तथा पाखरौ में प्रस्तावित टाइगर सफारी में वृक्षों के अवैध पातन के संबंध में वैधानिक, प्रशासनिक तथा वित्तीय स्वीकृति के बिना नियम विरूद्ध कार्य किया गया है, जो कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 तथा वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के प्राविधानों के विरूद्ध हैं।
3 उक्त के अतिरिक्त उप महानिरीक्षक, वन, भारत सरकार, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा पत्र दिनांक 28.12.2021 के माध्यम से निम्नवत तथ्यों से शासन को अवगत कराया गया है
(i) सनेह वन विश्राम गृह में वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 में विहित प्राविधानों के विरुद्ध बिना पूर्वानुमति के निर्माण कार्य कराया गया है।
(ii) पाखरौ टाइगर सफारी में किये गये निर्माण कार्यों में नियमानुसार प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग न करते हुये ढ़ांचे के निर्माण में कंक्रीट का प्रयोग किया गया है।
(ii) पाखरी टाइगर सफारी के निर्माण में अनुमति से अधिक संख्या में वृक्षों का अवैध पातन किया गया है।
(iv) पाखरी वन विश्राम गृह परिसर में वैधानिक / प्रशासनिक / वित्तीय स्वीकृति के
बिना नियम विरुद्ध निर्माण कार्य किया गया है।
(v) मोरघट्टी वन विश्राम गृह परिसर में निर्माण कार्य बिना वित्तीय एवं प्रशासनिक
स्वीकृति के कराये गये हैं।
(vi) पाखरौ से कालागढ़ पेट्रोलिंग रोड़ के आसपास के क्षेत्र से बड़ी मात्रा में मिट्टी हटायी गयी है, जो कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 तथा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्राविधानों के विरूद्ध है।
(vii) पाखरौ वन विश्राम गृह परिसर के निकट निर्मित जलश्रोत / जलाशय के निर्माण
में वृक्षों का अवैध पातन किया गया है, जो कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 तथा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्राविधानों के विरूद्ध है। (viii) कुगड्डा फॉरेस्ट कैम्प, पालेन रेन्ज, कालागढ़ टाइगर रिजर्व में निर्माण कार्य
बगैर वैधानिक / प्रशासनिक / वित्तीय स्वीकृति के किया गया है।
उक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि उक्तानुसार कराये गये निर्माण कार्य तथा वृक्षों का अवैध पातन बिना किसी वैधानिक / प्रशासनिक / वित्तीय स्वीकृति के किया गया है जो कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 तथा वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के प्राविधानों के विरूद्ध हैं।
4 उक्त घटनाक्रम की अवधि में श्री जबर सिंह सुहाग को मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड का कार्यभार अतिरिक्त रूप से आवंटित था। राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा अपने पत्र दिनांक 22 अक्टूबर, 2021 द्वारा सीधे श्री जबर सिंह सुहाग, तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक,
उत्तराखण्ड को अपनी स्थल निरीक्षण रिपोर्ट प्रेषित की गई तथा प्रकरण में दोषी अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही किये जाने का अनुरोध किया गया। भारत सरकार द्वारा स्पष्ट एवं सीधे निर्देशों के बाद भी श्री जबर सिंह सुहाग, तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड द्वारा इस प्रकरण में कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस प्रकार श्री जबर सिंह सुहाग द्वारा वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1970 की धारा 38 (O) (2) का सीधा उल्लंघन किया गया। श्री जबर सिंह सुहाग द्वारा वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1970 की धारा-38V (2). 33 (b) तथा (6) द्वारा मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक के रूप में प्रदत्त विधिक दायित्वों का भी सम्यक रूप से पालन नहीं किया गया, जो कि एक गम्भीर कर्तव्यहीनता है।
5 पाखरों में टाइगर सफारी का निर्माण एक महत्वपूर्ण परियोजना है, परंतु यह स्पष्ट हुआ है कि इस परियोजना में भी मानकों का अनुपालन नहीं हुआ है तथा इसमें पूर्व में स्वीकृत परियोजना से इतर कार्य कराए गए हैं जिस हेतु भारत सरकार एवं अन्य सक्षम स्तर से कोई अनुमति नहीं ली गई है। इस प्रकार मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड के स्तर से प्रकरण में अपेक्षित कोई कार्यवाही नहीं किए जाने से राज्य की इस महत्वपूर्ण योजना को समयान्तर्गत निर्धारित मानकों के अनुसार पूर्ण किये जाने पर संशय उत्पन्न हुआ है, जिस हेतु श्री जबर सिंह सुहाग, तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड की भी जिम्मेदारी बनती है।
उपरोक्त कार्यों से प्रथम दृष्टया भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 26 की उपधारा (क). (च) (छ) एवं (ज) का स्पष्ट उल्लंघन होता है। इसी प्रकार वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 की धारा 2 एवं 3 (b) का भी स्पष्ट उल्लंघन हुआ है, जो कि दंडनीय है। उक्त के अतिरिक्त प्रकरण में पूर्व में अंकित वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1970 की धाराओं के साथ-साथ धारा-52 के भी उल्लंघन का प्रकरण भी प्रथम दृष्टया बनता है। इन कार्यों के कराए जाने में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की स्वीकृत टाइगर कॉन्जर्वेशन प्लान का भी अनुपालन नहीं किया गया तथा स्वीकृत प्लान के इतर जा कर कार्य किए गए, जो नियम विरूद्ध हैं।
6 उक्त के क्रम में उल्लेखनीय है कि मा० उच्च न्यायालय द्वारा जनहित याचिका संख्या- 178 / 2021 में पारित आदेश दिनांक 27.10.2021 के क्रम में गठित समिति द्वारा दिनांक 30.10.2021 को स्थलीय निरीक्षण किया गया। उक्त समिति द्वारा पत्र दिनांक 28 अक्टूबर, 2021 के माध्यम से श्री जबर सिंह सुहाग, तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड को निरीक्षण के दौरान उपस्थित रहने हेतु निर्देशित किया गया किन्तु श्री जबर सिंह सुहाग न तो निरीक्षण के दौरान उपस्थित रहे और न ही उनके द्वारा अपना पक्ष समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिससे माननीय उच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों को पूर्ण करने में बाधा हुई। उक्त समिति द्वारा यह टिप्पणी की गयी है कि पाखरी में कैम्पा मद से उपलब्ध करायी गयी समस्त धनराशि का विवरण श्री जबर सिंह सुहाग, तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड से मांगा गया था, जो कि उनके द्वारा उपलब्ध नहीं कराया गया। उक्त समिति की आख्या शपथ पत्र के रूप में मा० उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गयी है।
7 निदेशक कॉर्बेट टाइगर रिजर्व द्वारा भी समय-समय पर कालागढ़ टाइगर रिजर्व में हो रही विभिन्न अनियमितताओं के विषय में मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड
को विभिन्न पत्रों के माध्यम से अवगत कराया जाता रहा, परन्तु श्री जबर सिंह सुहाग, तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड द्वारा अपने स्तर से इस प्रकरण में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। श्री जबर सिंह सुहाग द्वारा न तो कोई स्थलीय निरीक्षण किया गया, ना कोई निरीक्षण टिप्पणी निर्गत की गयी और न ही कोई लिखित दिशा-निर्देश संबंधित अधिकारियों को निर्गत किए गये, जो कि मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के रूप में अपेक्षित था। इस प्रकार श्री जबर सिंह सुहाग, तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड द्वारा अपने कार्यकाल में उक्त घटनाक्रम की पूर्ण जानकारी होते हुए भी इसके रोकथाम एवं निराकरण हेतु कोई कार्यवाही नहीं की गयी।
8 उत्तराखण्ड के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के रूप में कार्य करते हुए प्रदेश के समस्त संरक्षित क्षेत्रों एवं टाइगर रिजर्व के राज्य स्तर पर प्रबंधन का सीधा दायित्व श्री जबर सिंह सुहाग का था। इसी प्रकार समय-समय पर प्रभावी निरीक्षण तथा अनुश्रवण द्वारा आपके नियंत्रणाधीन अधिकारियों के कार्यक्षेत्र में हो रहे कार्यों के तकनीकी, प्रशासनिक एवं वैज्ञानिक आधार पर नियमित मूल्यांकन कर समस्त संबंधित अधिकारियों को मार्गदर्शन प्रदान किया जाना भी तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड के स्तर से अपेक्षित था। श्री जबर सिंह सुहाग द्वारा न केवल मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं किया गया, अपितु शासन एवं अन्य उच्च स्तर से इस प्रकरण में कार्यवाही किये जाने एवं जांच कर आख्या देने जैसे निर्देशों का भी अनुपालन नहीं किया गया। इस प्रकार अपने सीधे नियंत्रणाधीन क्षेत्र में किए जा रहे अनधिकृत एवं अवैध कार्यों की रोकथाम में श्री जबर सिंह सुहाग, तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड न केवल पूर्ण रूप से विफल रहे. अपितु ऐसे घटनाओं का विवरण निदेशक कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, उत्तराखण्ड शासन एवं भारत सरकार की संस्थाओं द्वारा उपलब्ध कराये जाने के बाद भी उनके द्वारा इस पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी।
9 इसी प्रकार मुख्य कार्यकारी अधिकारी, कँपा परियोजना, उत्तराखण्ड के रूप में श्री जबर सिंह सुहाग द्वारा इन कार्यों हेतु कालागढ़ टाइगर रिजर्व प्रभाग को उपलब्ध कराई गयी धनराशि का स्पष्ट विवरण मांगे जाने के बाद भी प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ). उत्तराखण्ड, देहरादून, जो कि कैम्पा की कार्यकारी समिति के अध्यक्ष भी हैं, को उपलब्ध न कराया जाना यह संदेह उत्पन्न करता है कि श्री जबर सिंह सुहाग द्वारा न केवल इन अवैध कार्यों की रोकथाम हेतु कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं की गई, अपितु इन कार्यों को प्रत्येक रूप से संरक्षण देने का प्रयास भी किया गया तथा इससे संबंधित विवरण को शासन एवं अन्य उच्च अधिकारियों के समक्ष जानबूझकर प्रस्तुत नहीं किया गया। इन कार्यों हेतु कँपा के मानकों एवं स्वीकृत कार्य योजना के अंतर्गत अथवा इतर क्या कोई धनराशि मुख्य कार्यकारी अधिकारी उत्तराखण्ड कँपा के स्तर से निर्गत की गयी. इस पर भी श्री जबर सिंह सुहाग द्वारा स्थिति स्पष्ट नहीं की गयी है। इस प्रकार इस सारे घटनाक्रम में ऐसा प्रतीत होता है कि श्री जबर सिंह सुहाग राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी की अपेक्षित भूमिका के विपरीत न केवल एक मूकदर्शक बने रहे अपितु इन कार्यों हेतु उनके द्वारा पूर्ण संरक्षण भी प्रदान किया गया। उपरोक्त अवैधानिक कार्यों के क्रियान्वयन में श्री जबर सिंह सुहाग की संलिप्तता तथा आपराधिक दुरभिसंधि की प्रबल शंका उत्पन्न होती है। इस आचरण से श्री जबर सिंह सुहाग
के विरुद्ध उक्त वर्णित तथ्यों में वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1970 की धाराओं के साथ-साथ धारा-52 के भी उल्लंघन का प्रकरण प्रथम दृष्टया बनता है।
10 उपरोक्त वर्णित तथ्यों के दृष्टिगत श्री जबर सिंह सुहाग का यह कृत्य भारतीय वन अधिनियम, 1927 वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 तथा अखिल भारतीय सेवायें (आचरण) नियमावली, 1968 के विरूद्ध है। श्री जबर सिंह सुहाग, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, उत्तराखण्ड, देहरादून के रूप में कार्बेट टाइगर रिजर्व के अन्तर्गत वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास की रक्षा करने के अपने कर्तव्यों में विफल रहे हैं। श्री जबर सिंह सुहाग द्वारा वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास के विनाश किये जाने संबंधी तथ्यों को जानबूझकर राज्य सरकार से छिपाया गया है जो उनकी सत्यनिष्ठा को संदेहास्पद बनाता है।
11 अतः उक्त के क्रम में अखिल भारतीय सेवायें (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1969 के नियम-3 के उप नियम-1 के खण्ड-a में प्रदत्त शक्तियों के अधीन श्री जबर सिंह सुहाग को तत्काल प्रभाव से निलम्बित किया जाता है।
12 श्री जबर सिंह सुहाग को यह भी निर्देशित किया जाता है कि वे निलम्बन की अवधि में सक्षम स्तर की अनुमति के बिना मुख्यालय नहीं छोड़ेंगे। श्री जबर सिंह सुहाग को निलम्बन की अवधि में प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ), उत्तराखण्ड, देहरादून के कार्यालय से संबद्ध किया जाता है।
13 निलम्बन अवधि के दौरान श्री जबर सिंह सुहाग को अखिल भारतीय सेवायें (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1969 के नियम-4 में उल्लिखित प्रावधानों / प्रतिबंधों / शर्तों के अधीन जीवन निर्वाह भत्ता अनुमन्य होगा।
( रमेश कुमार सुधांशु

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