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पूर्व मुख्यमन्त्री हरीश रावत के देहरादून में जारी धुआंधार प्रदर्शन से कांग्रेस में बवंडर ।

बाड़े से आजाद हिरन की तरह कुलांचे भरते हरदा

72 साल के हरदा का 72 घण्टे से भाजपा का विरोध जारी

प्रीतम को अपमानित कर रहे हरीश -इंदिरा

अविकल थपलियाल

बहुत दिनों से बाड़े में कैद हिरन व बछड़े को जब आजादी मिलती है तो वो कैसे कुलांचे भरता है और कैसे इधर-उधर कूद फांद करता है। 72 साल के हरीश रावत के बीते 72 घण्टे से देहरादून में चल रही कवायद ने ऐसे आजाद हिरन व बछड़े की याद दिला दी।

कोरोना लॉकडौन में लंबी अवधि दिल्ली में बिताने और देहरादून में क्वारंटाइन अवधि पूरी करने के बाद आजाद हुए पूर्व मुख्यमन्त्री हरीश रावत सड़क पर उतर आए हैं। तीन दिन से महंगाई समेत अन्य मुद्दों पर भाजपा पर हल्ला जारी है। एकाएक प्रदेश की राजनीति में भी उबाल और जोश देखा जाने लगा है।

उमस भरे बीते तीन दिन से हरीश रावत कभी बैलगाड़ी में सवार तो कभी सड़क पर एकाकी धरने पर बैठ रहे हैं। सोमवार से शुरू हुई हरदा की यह बैटिंग बुधवार को भी जारी रही। बुधवार के दिन पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर पेट्रोल पंप पर प्रदर्शन किया।

खबरों में बने रहने की कला के उस्ताद हरीश रावत का यह जंगी मूव भाजपा के किले में कितना छेद कर पायेगा,यह विश्लेषण का मुद्दा हो सकता है। लेकिन उनके इस कदम से कांग्रेस कठघरे में अवश्य खड़ी हो गयी है। उनके धरना प्रदर्शन से प्रदेश संगठन अध्यक्ष प्रीतम सिंह समर्थक दूर ही रहे।

दरअसल, हरीश रावत बीते कुछ साल से पार्टी संगठन के समानांतर अपने कार्यक्रम कर रहे हैं। कांग्रेस संगठन अध्यक्ष प्रीतम सिंह अपने स्तर से भाजपा को ग्रिल कर रहे हैं जबकि हरीश रावत अपनी ढपली अलग बजा रहे हैं। हरीश रावत ही नही बल्कि उनके गुट से जुड़े कुछ स्थानीय नेता भी संगठन से इतर अपने राजनीतिक कार्यक्रम करने में कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं।

यह सब कांग्रेस में ही सम्भव है। भाजपा में संगठन से इतर कोई भी राजनीतिक कार्यक्रम करने में कड़ा एक्शन लिया जाता रहा है। लेकिन कांग्रेस में सब चलता है। इसमें भी कोई दो राय नही कि हरीश रावत का लोगों से जुड़ाव कार्यक्रम की सफलता की गारंटी बन जाता है। और उनके धरने-प्रदर्शन की गूंज से मीडिया को कई खबरें भी मिल जाती है।

हरीश समर्थकों का मानना है कि मौजूदा पार्टी संगठन पूरी ताकत से त्रिवेंद्र सरकार का विरोध नहीं कर पा रहा है।

इन समर्थकों का कहना है कि हाल ही में भाजपा के एक मंत्री की बहु की एनजीओ के मसले पर नैनीताल उच्च न्यायालय ने तीखी टिप्पणी की। यही नही, विधायक अमनमणि को लॉकडौन में पास जारी करने वाले अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश व अन्य अधिकारियों के खिलाफ भी अदालत ने कठोर टिप्पणी की। लेकिन पार्टी संगठन इन ज्वलंत मुद्दों पर आक्रामक मूड में नही दिखी। जबकि भाजपा के उक्त मंत्री ने 2016 में हरीश रावत सरकार के खिलाफ बगावत करने में मुख्य भूमिका निभाई थी। हरीश समर्थक इस बात से खफा हैं कि पार्टी संगठन मित्र विपक्ष की भूमिका में उतर आया है।

दूसरी ओर, संगठन से जुड़े लोगों का कहना है कि हरीश रावत के निजी कार्यक्रम से जनता के बीच ठीक संदेश नही जा रहा है। भाजपा इसे कांग्रेस की अंदरूनी फूट के तौर पर प्रचारित कर रही है।

नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा ह्रदयेश का कहना है कि हरीश रावत अपने धरने प्रदर्शन से स्वंय को चर्चा में बनाये रखना चाहते हैं। और पार्टी अध्यक्ष प्रीतम सिंह को अपमानित करने में जुटे हैं। इससे कांग्रेस का ही नुकसान हो रहा है।

उनका कहना है कि हरीश रावत को एकजुट भाव से निजी कार्यक्रमों के बजाय संगठन की नीतियों पर चलकर भाजपा को चुनौती देनी चाहिए। कोरोना काल में पार्टी की एकजुटता बहुत जरूरी है। कांग्रेस गलियारे में यह भी चर्चा आम हो रही है कि हरीश का इस तरह कुलांचे भरने से कहीं कांग्रेस की बाड़ ही न टूट जाय।

बहरहाल, कई मौकों पर मुख्यमन्त्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की तारीफ के पुल बांध चुके हरीश रावत ने अपने तीन दिन से जारी जंग में भाजपा को निशाने पर लेने के साथ -साथ अपने ही दल में भी लहरें पैदा कर दी है। अब ये राजनीतिक लहरें दिल्ली दरबार को कितना गीला कर पाएंगी?करते हैं इंतजार…
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