श्रीराम कथा मानवता और आंतरिक शांति का मार्ग- ज्ञानी गुरबचन सिंह
अविकल उत्तराखंड
ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में आयोजित मासिक श्रीराम कथा गुरुवार को आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक जागरूकता और राष्ट्रीय एकता का सशक्त मंच बन गई। कार्यक्रम में पूर्व जत्थेदार अकाल तख्त साहिब ज्ञानी गुरबचन सिंह के आगमन ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। कथा के दौरान स्वामी चिदानन्द सरस्वती और ज्ञानी गुरबचन सिंह के उद्बोधनों ने सनातन और सिख परंपराओं के साझा आध्यात्मिक मूल्यों, सेवा, करुणा और राष्ट्रभक्ति का संदेश दिया।
मासिक धर्म स्वच्छता दिवस के अवसर पर स्वामी चिदानंद सरस्वती ने समाज में महिलाओं से जुड़े विषयों पर फैली चुप्पी और संकोच पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बेटियों को संकोच नहीं, समझ और संवाद की आवश्यकता है। नारी ही शक्ति, संस्कृति और सृष्टि की आधारशिला है, इसलिए उसके स्वास्थ्य और सम्मान को लेकर समाज को अपनी सोच बदलनी होगी।

स्वामी चिदानंद ने कहा कि मासिक धर्म कोई अभिशाप नहीं, बल्कि प्रकृति की दिव्य प्रक्रिया है। इसके बावजूद समाज आज भी इसे शर्म और असहजता से जोड़कर देखता है। उन्होंने कहा कि जब तक बेटियां अपने स्वास्थ्य और स्वाभिमान को लेकर भय और झिझक में जीती रहेंगी, तब तक सशक्त समाज का सपना अधूरा रहेगा। स्वस्थ नारी ही सशक्त और संस्कारित राष्ट्र की नींव है।
उन्होंने कहा कि जरूरत केवल स्वच्छता उत्पाद उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि परिवार और समाज की मानसिकता बदलने की है। जब माता-पिता बेटियों के स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा करेंगे और विद्यालयों में संवेदनशील शिक्षा दी जाएगी, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा। स्वामी जी ने कहा, “देवी स्वच्छ तो देश सशक्त और समृद्ध।”
इस अवसर पर ज्ञानी गुरबचन सिंह ने श्रीराम कथा को अमृत कथा बताते हुए कहा कि राम कथा युगों-युगों से मानवता को सत्य, भक्ति और मर्यादा का मार्ग दिखाती आई है। उन्होंने कहा कि गुरुवाणी व्यक्ति को केवल आध्यात्मिक ऊर्जा ही नहीं देती, बल्कि समाज को भी सही दिशा प्रदान करती है। उन्होंने परिवार में आपसी सम्मान और संस्कारों को सबसे बड़ी शक्ति बताया।

स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि श्रीराम कथा केवल श्रवण की कथा नहीं, बल्कि जीवन को यज्ञ बनाने की प्रेरणा है। समाज में वास्तविक परिवर्तन तभी आएगा, जब व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार, अज्ञान और भेदभाव का त्याग करेगा।
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्र की एकता और सामाजिक समरसता बनाए रखने का भी संकल्प लिया गया। इस मौके पर अशोक ने ज्ञानी गुरबचन सिंह का इलायची की माला पहनाकर स्वागत किया।



