चुनाव- उक्रांद व बसपा एक बार फिर शून्य से करेंगे शुरुआत

उत्त्तराखण्ड विधानसभा चुनाव- 2022

विधानसभा सीट- 70

मतदान  -14 फरवरी, मतगणना- 10  मार्च

कुल मतदाता- 82,38,187

देहरादून से अविकल थपलियाल

उत्त्तराखण्ड के विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल उत्त्तराखण्ड क्रांति दल के अलावा मायावती बहुजन समाज पार्टी की कठिन अग्नि परीक्षा होने जा रही है। 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड मोदी लहर में इन दोनों दलों को गहरा झटका लगा था। बीते तीन विधानसभा चुनाव में बसपा व उक्रांद के विधायक विधानसभा का हिस्सा होते थे। लेकिन मोदी की आंधी में ये दोनों दल 2017 के चुनाव में खाता तक नही खोल पाए थे।

उत्त्तराखण्ड की चुनावी राजनीति के लिहाज से इन दोनों दलों का सफाया भी बढ़ी खबर बनी थी। इस बार के चुनाव में यह दोनों दल जीरो से शुरुआत कर अपना खाता खोलने की जुगत में रहेंगे।

अपने ही राज्य में पिट गया उत्त्तराखण्ड क्रांति दल

देश के अन्य राज्यों में जहां क्षेत्रीय दल अहम राजनीतिक शक्तियां बने हुए हैं। वहीं लड़ मर कर अलग राज्य की मशाल जलाने वाला उत्त्तराखण्ड क्रांति दल अपने वजूद की जंग लड़ रहा है। 2022 का विधानसभा चुनाव में उक्रांद के लिए करो या मरो की स्थिति है।

उक्रांद ने मंगलवार को जारी अपनी पहली सूची में 16 उम्मीदवारों के नाम की घोषणा भी कर दी। और अपने घोषणा पत्र में सख्त भू कानून की वकालत कर राज्य के ठेठ पर्वतीय मतदाता को नये सिरे से रिझाने की कोशिश की है। कई बार टूट चुके उत्त्तराखण्ड क्रांति दल के सामने सबसे बड़ी समस्या चुनावी संसाधनों को लेकर सामने आ रही है।

इस पार्टी के दो बड़े नेता काशी सिंह ऐरी और दिवाकर भट्ट एक बार फिर एक हुए है। इनके पुराने साथी विधायक प्रीतम पंवार सितम्बर महीने में भाजपा में शामिल हो चुके हैं। 2017 में निर्दलीय विधायक बने प्रीतम पंवार 2012 की कांग्रेस सरकार में भी मंत्री बने। इस बीच, उत्त्तराखण्ड क्रांति दल के पुराने साथी रहे प्रीतम पंवार के भाजपा में शामिल होने से पार्टी के कर्णधारों को गहरा झटका लगा है। उत्तरकाशी व टेहरी जिले में पंवार उक्रांद की मजबूत कड़ी थे।


उक्रांद की मजबूत आवाज रहे विपिन त्रिपाठी बतौर विधायक की असमय मौत के बाद उनके पुत्र पुष्पेश त्रिपाठी युवा चेहरे के तौर पर पार्टी में सक्रिय हैं।

दरअसल, उत्त्तराखण्ड राज्य की मजबूती से जंग लड़ने वाले उत्त्तराखण्ड क्रांति दल को पहले विधानसभा चुनाव में 4 विधानसभा सीट मिली थी। कुल मतों का लगभग 6 प्रतिशत उक्रांद के हिस्से आया। 2002 में कांग्रेस की सरकार के सीएम नारायण दत्त तिवारी थे। 2007 में राजनीतिक स्थिरता के नाम पर उक्रांद ने खंडूडी सरकार को समर्थन दिया। बदले में दिवाकर भट्ट को मंत्री बनाया गया। विधायक काशी सिंह ऐरी को एक बड़े निगम हिल्ट्रान की कुर्सी थमा दी गई। पार्टी के अंदर फूट पड़ी। और अध्यक्ष त्रिवेंद्र पंवार ने दिवाकर भट्ट व विधायक ओमगोपाल को पार्टी से निकाल दिया।

राजनीतिक विश्लेषक और उक्रांद से सहानुभूति रखने वाले वर्ग का आज भी यही मानना है कि अगर पार्टी के बड़े नेता कांग्रेस व भाजपा से नजदीकियां नहीं बढ़ाते तो आज यह दल एक मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत होता।

2007 में भाजपा सरकार बनने पर उक्रांद के टिकट पर जीते दिवाकर भट्ट खंडूडी मन्त्रिमण्डल में मंत्री बन गए। इस मुद्दे पर काशी सिंह ऐरी और भट्ट के बीच जोर आजमाइश चली। निष्कासन का दौर चला। और पार्टी में जारी टूट के सिलसिले ने उक्रांद को जनसरोकारों से जुड़े मुद्दे और जनता से दूर कर दिया।

पहले विधानसभा चुनाव के बाद 2007 के चुनाव में पार्टी के सिर्फ तीन उम्मीदवार विधायक बने। वोट प्रतिशत लगभग 6 तक ही सिमटा रहा। 2007 में सत्तारूढ़ भाजपा की मलाई खाने के बाद उक्रांद की छवि तार तार हुई। नेताओं की महत्वाकांक्षा ने पार्टी की लुटिया डुबोने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

उक्रांद अपने मुद्दों को विधानसभा से लेकर सड़क तक भूल गया। नतीजा 2012 के चुनाव में नजर आया। पहले चुनाव में 4 सीट जीतने वाला उक्रांद 1 सीट पर सिमट गया। मत प्रतिशत भी 6 से गिरकर 2 पर टिक गया।
पिक्चर अभी बाकी थी। 2017 में उक्रांद का कोई उम्मीदवार नहीं जीता। और मत प्रतिशत भी 1 प्रतिशत से नीचे गिर गया। उक्रांद के टिकट पर चुनाव जीतने वाले प्रीतम पंवार ने पार्टी छोड़ निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत गए।

2017 के चुनावी परिणाम ने उक्रांद की जड़ें पूरी तरह उखाड़ दी। इस पार्टी के नेता अहम की जंग में उलझे रहे। अपने हक हुकूक से जुड़े मुद्दों से किनारा करने वाली उक्रांद ने एक समय उत्तर प्रदेश की विधानसभा में भी अपने विधायक भेजे। काशी सिंह ऐरी और जसवन्त सिंह बिष्ट उत्तर प्रदेश में उक्रांद की आवाज बने। उक्रांद की 1979 में स्थापना के बाद एक साल बाद ही 1980 में जसवंत सिंह बिष्ट रानीखेत से विधायक बने। जसवंत सिंह बिष्ट लगातार तीन बार उक्रांद के टिकट पर रानीखेत विधानसभा से चुनाव जीतते रहे।

उक्रांद नेता काशी सिंह ऐरी

काशीसिंह ऐरी भी 1985 से 1996 तक उत्तर प्रदेश की विधानसभा में तीन बार विधायक बन कर पहुंचे। फिर 2002 के पहले चुनाव में भी जीते।

यही नहीं, 1984 व 1989 के लोकसभा चुनावों में भी उक्रांद प्रत्याशी इंद्रमणि बडोनी व काशी सिंग ऐरीकांग्रेस को कड़ी टक्कर देते नजर आए थे। उस दौर को उक्रांद का स्वर्णिम काल कहा जा सकता है। वन अधिनियम 1980 व अन्य जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर उक्रांद के प्रदेशव्यापी आंदोलन को देखते हुए विश्वस्तरीय हिमालयन कार रैली को स्थगित करना पड़ा था।

लेकिन राज्य गठन के बाद उक्रांद ने एक भी राज्य स्तरीय आंदोलन की अलख नहीं जगाई। लिहाजा, राज्य आंदोलन से जुड़ी कई आंदोलनकारी ताकतें व संगठन भी धीरे धीरे कमजोर पड़ते गए। बाकी कसर प्रमुख राष्ट्रीय दलों की ओर से समय समय पर उक्रांद को मिले लॉलीपॉप ने पूरी कर दी।

मौजूदा वक्त में एकमात्र क्षेत्रीय दल उक्रांद ने 2022 के चुनाव में सभी 70 सीटों पर लड़ने का ऐलान किया है। पार्टी का घोषणा पत्र जारी हो चुका है।पार्टी की नींव रहे काशी सिंह ऐरी व दिवाकर भट्ट उम्र के ढलान पर है। राजनीतिक संघर्ष के लिए हिम्मत व जोश में भी पहले जैसी बात नहीं दिखाई दे रही। उक्रांद की ताकत रहे  युवा व महिलाओं को नये सिरे से जोड़ना भी एक मुख्य चुनौती भी है।

बहरहाल, 1979 में गठित उक्रांद 40 साल के लम्बे उतार चढ़ाव भरे राजनीतिक सफर के बाद फिर से शून्य से शुरुआत कर रही है। चुनावी हलचल के बीच भाजपा-  कांग्रेस के बाद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का शोर उक्रांद से ज्यादा सुनाई दे रहा है।

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उत्त्तराखण्ड क्रांति दल के चुनावी घोषणा पत्र की मुख्य बातें।

उक्रांद ने गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के अलावा सख्त भू कानून का भी वादा किया है।

इसके अलावा शिक्षा,स्वास्थ्य,बेरोजगारी,पर्यटन ,कृषि- बागवानी,कुटीर उद्योग, पशुपालन, चकबन्दी पर भी फोकस किया है।

महिला सुरक्षा के अलावा त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं व स्थानीय निकायों को मजबूत करने कभी मतदाताओं से वादा किया है।


बसपा- उत्त्तराखण्ड की राजनीति का सबसे बड़ा छुपा रुस्तम

राज्य गठन के बाद हुए 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी सबसे बड़ा छुपा रुस्तम खिलाड़ी बनकर उभरा। कुल 7 सीटें बसपा के खाते में आयी। लगभग 11 प्रतिशत वोट मिले हरिद्वार व उधमसिंहनगर जिले से मिली इन सीटों की वजह से बसपा एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनी। पहले विधानसभा चुनाव में राजनीतिक विश्लेषक भी मायावती की बसपा को इतनी सीट मिलने से हैरत में पड़ गए। कांग्रेस की सरकार बनी और नारायण दत्त तिवारी ने आराम से पांच साल सरकार चलाई।

लेकिन बसपा की उड़ान अभी बाकी थी। विधानसभा सत्र के दौरान बसपा के सात विधायकों ने अपने इलाके के कई मुद्दे दमदार तरीके से उठाए। 2007 के विधानसभा चुनाव में तिवारी बनाम हरीश रावत द्वंद्व में बाजी भाजपा के हाथ लगी। लेकिन बसपा एक बार फिर चौंका गयी। इस चुनाव में बसपा की एक सीट और बढ़ गयी। कुल विधायकों की संख्या आठ हो गयी। और मत प्रतिशत भी बढ़कर 12 को छूने लगा। मायावती ने कई जगह चुनावी सभाएं की थी। 2007 में जनरल बीसी खंडूडी सीएम बने।

उत्त्तराखण्ड में भाजपा-कांग्रेस की टक्कर के बीच बसपा का उदय नयी राजनीतिक इबारत लिख रहा था। चूंकि, पर्वतीय इलाके का दलित मतदाता कांग्रेस और भाजपा के बीच बंट रहा था। लिहाजा बसपा ने प्रदेश के मैदानी इलाके पर ही फोकस किया।

बसपा की बढ़ती राजनीतिक ताकत ने कांग्रेस व भाजपा के दिग्गजों को रणनीति बदलने पर मजबूर किया। इन दोनों दलों ने मैदानी इलाके में अपनी गतिविधियां बढ़ायी। उधर, भाजपा में जारी अंदरूनी संघर्ष में खंडूडी को पद से हटना पड़ा। निशंक को जिम्मेदारी दी गयी। लेकिन 2011 अक्टूबर में एक बार फिर जनरल खंडूडी को विधानसभा चुनाव से पहले उत्त्तराखण्ड की कमान दी गयी।

खंडूडी है जरूरी नारे के साथ लड़े गए 2012 के विधानसभा चुनाव में हुए कांटे के संघर्ष में कांग्रेस की सरकार बन गयी। लेकिन इस चुनाव में पहली बार बसपा का ग्राफ ढलता नजर आया। दस साल में पार्टी संगठन व विधायकों की परफार्मेन्स पर मतदाताओं ने अपना फैसला सुनाया। और बसपा के सिर्फ तीन विधायक जीत कर आये। बेशक बसपा की विधानसभा सीट गिरकर तीन पर अटक गई। लेकिन मत प्रतिशत 12 को भी पार कर गया। बसपा का वोट बैंक बढ़ा लेकिन सीट कम हो गयी।

2012 के चुनावी परिणाम के पीछे बसपा प्रभारियों का बार बार बदला जाना भी अहम कारक रहा।

बसपा की मैदानी इलाके में कम हुई सीट के बाद दोनों राष्ट्रीय दल कांग्रेस व भाजपा ने चैन की सांस ली। यह भी सच रहा कि तीनों विधानसभा चुनाव (2002, 07 और 2012) में ने पर्वतीय इलाके से एक भी सीट नहीं जीती। राज्य गठन से पहले पर्वतीय इलाके का दलित मतदाता परम्परागत तौर पर कांग्रेस के साथ खड़ा नजर आता रहा। लेकिन राज्य बनने के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच दलित मतों की खींचतान चलती रही।

2012 की कांग्रेस सरकार में भी भाजपा की तर्ज पर सीएम विजय बहुगुणा को हटाते हुए जनवरी 2014 में हरीश रावत को कमान सौंपी गई। इस फैसले के विरोध में कांग्रेसी नेता सतपाल महाराज पार्टी छोड़ भाजपा में दाखिल हो गए। सीएम हरीश रावत के खिलाफ बगावत की यह पहली चिंगारी थी। उत्त्तराखण्ड में उठापटक की राजनीति एक नये तूफान की ओर इशारा कर रही थी। बहुगुणा व हरीश गुट के बीच वर्चस्व की जंग ने जोर पकड़ा। और मार्च 2016 में बहुगुणा गुट के नौ विधायक कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए। कांग्रेस में हुई इस भारी टूट के बाद प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा। बाद में कोर्ट के फैसले के बाद मई 2016 में हरीश रावत की फिर से ताजपोशी हुई।

फरवरी 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच जंग सिमट गई। और जबरदस्त मोदी लहर के बीच भाजपा के 57 विधायक जीत गए। कांग्रेस 11 पर सिमट गई। और बसपा का सूपड़ा साफ हो गया। यह चुनावी परिणाम बसपा के लिए भारी झटका साबित हुआ।

2017 में बसपा खाता नहीं खोल पायी। यही नहीं, बसपा के मत प्रतिशत में भाजपा ने गहरी सेंध लगाई। बसपा का मत प्रतिशत 7 के आस पास टिक गया । जबकि भाजपा का मत प्रतिशत बढ़कर 46 से ज्यादा हो गया।

भाजपा ने बसपा ही नही बल्कि उक्रांद व निर्दलीय मतों के भारी प्रतिशत को भी झटका। तारीफ की बात यह रही कि 2017 के चुनाव में सिर्फ 11 विधायकों पर सिमटी कांग्रेस का अपना वोट बैंक खंडित नहीं हुआ। और लगभग 34 प्रतिशत के आस पास रहा।

2017 की मोदी लहर के बाद कई दलों के उखड़े तंबू एक बार फिर खड़े होने की कोशिश में है। पीएम मोदी, राहुल गांधी व अरविंद केजरीवाल की चुनावी सभाएं अपना अपना असर छोड़ रही है। केजरीवाल अपने काशीपुर दौरे में 18 उम्र से अधिक सभी महिलाओं को मासिक एक हजार भत्ते की घोषणा कर मजबूत वोट बैंक में सेंधमारी शुरू कर दी है। इधर, चुनावी प्रबंधन के लिहाज से बसपा व उक्रांद को अभी छलांग लगानी बाकी है।

चुनाव आचार संहिता की घोषणा के बाद कोविड के कड़े नियम के चलते राजनीतिक दल वर्चुअल संवाद में जुट गए है। चुनाव प्रचार के इस नये मोर्चे पर भाजपा, कांग्रेस व आप के बीच कड़ी जंग चल रही है। लेकिन सोशल मीडिया में बहुत पकड़ नहीं रखने वाले उक्रांद व बसपा नेता कैसे कोरोना संकट में जनता अपनी बात पहुंचाएंगे, यह भी इन दलों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है।

हालांकि, टिकटों को लेकर दलीय राजनीतिक हलचल के लिहाज से उक्रांद व बसपा की चुनावी गाड़ी का बहुत शोर नही सुनाई पड़ रहा है।

विधानसभा चुनाव दलीय मत प्रतिशत

उत्त्तराखण्ड 2017 विधानसभा चुनाव – मत प्रतिशत

राजनीतिक दल-प्रतिशत -सीट

भाजपा-      46.5  –      57

कांग्रेस-         33.5       -11

बसपा-               7   –   00

उक्रांद-                0.7-   00

सपा-                    0.4 –   00

निर्दलीय-             10  –  02

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कांग्रेस   सीट       वोट प्रतिशत
2002 –  36         26.91

2007  – 21         29.59

2012  – 32           34.03

2017 –  11       –  33.49

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भाजपा-विधानसभा

              सीट      प्रतिशत
2002 –  19       25.45

2007  – 34         32.90

2012  – 31        33.38

2017 –  57     –  46.51

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उक्रांद

             सीट   –  प्रतिशत
2002 –  04       5.49

2007  – 03       5.49

2012  – 01        1.93

2017 –  00     –  0.70

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बहुजन समाज पार्टी

2002  –   07      —10.93

2007  –   08      –  11.76

2012   –  03   –     12.19

2017   –  00      –      6.98

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