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राज्यसभा की बिसात पर त्रिवेंद्र ने “पैदल” से ढेर किये राजा-वजीर

राज्यसभा की बिसात पर कई घोड़े हुए चित

सीएम त्रिवेंद्र को केंद्र मे मिला मजबूत वकील

भाजपा के महारथी जाल ही बुनते रह गए और चिड़िया चुग गयी खेत

अविकल उत्त्तराखण्ड

देहरादून। उत्त्तराखण्ड के राज्यसभा उम्मीदवारी में राजा-वजीर-घोड़े -हाथी सब औंधे मुंह गिर गए। और संघ के सिपाही ने बाजी मार ली।

यह विशुद्घ रूप से त्रिवेंद्र का पॉलिटिकल शो माना जायेगा। राज्यसभा उम्मीदवारी के लिए अपेक्षाकृत कमजोर माने जा रहे संघ परिवेश के नरेश बंसल सीएम त्रिवेंद्र का सहारा मिलते ही सबसे ताकतवर हो गए। सोमवार की देर रात सीएम की इस राजनीतिक तोड़ ने पार्टी के अंदर और बाहर खलबली मचा दी।

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विजय बहुगुणा और महेंद्र पांडेय की जंग में उलझा मीडिया व भाजपा के सूरमा भी गच्चा खा गए। मैदानी मूल के नरेश बंसल से कई मामलों में पूर्व सांसद बलराज पासी भारी थे। तिवारी को हराने के सुनहरा रिकॉर्ड भी है। पासी के पास भी संघ की बैकग्राउंड थी। अच्छे वक्ता की पहचान है। लेकिन पूर्व सीएम निशंक के करीबी होना उनका माइनस पॉइंट बन गया। बीते काफी समय से पासी की नजदीकियां राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी से भी बढ़ गयी थी। यही कुछ समीकरण पासी के लिए उल्टे पड़ गए।

मैदानी मूल के अनिल गोयल चूंकि 2012 व 2016 में राज्यसभा के प्रत्याशी रह चुके है। इस बार भी दावा मजबूत था। पूर्व सीएम बीसी खंडूरी की गुड बुक में रहे गोयल सीएम त्रिवेंद्र के बहुत विश्वास के व्यक्ति नहीं बन पाए। सीएम त्रिवेंद्र के रजिस्टर में नंबर वन भरोसेमंद नरेश बंसल ही माने गए।

तीनों मैदानी मूल के उम्मीदवारों में नरेश बंसल ही त्रिवेंद्र की सूची में पहले नंबर पर थे। सीएम त्रिवेंद्र का यह दांव मजबूत विजय बहुगुणा कैम्प को तो सदमा पहुंचा ही गया। साथ ही दिल्ली-दून में गोटियां बिछा रहे पार्टी  क्षत्रपों को भी गंभीर इशारा कर गया। राजनीतिक खेल में बहुत बड़े दावे व डींगें नही मारने वाले सीएम त्रिवेंद्र ने बेहद ठंडे दिमाग से राज्यसभा ऑपरेशन को तय रणनीति के तहत मुकाम तक पहुंचाया।

त्रिवेंद्र का यह पॉलिटिकल मूव इसलिए भी अपनी मंजिल पर पहुंच गया। क्योंकि त्रिवेंद्र विरोधी धड़ा किसी भी एक उम्मीदवार को ऑक्सीजन देने का उचित समय पर फैसला नहीं कर सका। कुछ ने बागी बहुगुणा को रोकने में ताकत झोंकी तो कुछ पर्दे के पीछे से चुपचाप खेल देखते रहे। विरोधी गुट की यही कमजोरी सीएम त्रिवेंद्र की योजना को चार चांद लगा गयी।

बीते साढ़े तीन साल से तीसरी व चौथी पांत के कार्यकर्ताओं के जरिए अपनी टीम को सफलतापूर्वक एडजस्ट करने में जुटे सीएम त्रिवेंद्र के लिए संघी नरेश बंसल के तौर पर केंद्र में एक मजबूत पैरोकार भी मिल गया है। केंद्र की राजनीति में अहम कुर्सियों में विराजमान पार्टी नेताओं में एक भी त्रिवेंद्र रावत का ढोल पीटने वाले नहीं है। केंद्रीय नेतृत्व के सामने यह काम अब सांसद बनने जा रहे नरेश बंसल बखूबी करेंगे। भविष्य में त्रिवेंद्र के दांव को नाकाम करने के लिए विरोधी धड़े को नये सिरे से नया फार्मूला तलाशना होगा। फिलहाल तो, भाजपा के कई महारथी जाल ही बुनते रह गए और चिड़िया चुग गयी खेत।

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