उत्तराखंड में छह महीने से ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन ठप-कांग्रेस

जैविक खेती पर संकट

ऑर्गेनिक बोर्ड कर्मचारियों को चार महीने से वेतन नहीं

अविकल उत्तराखण्ड


देहरादून। उत्तराखंड में सरकार भले ही जैविक खेती को बढ़ावा देने के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत दिखाई दे रही है। प्रदेश में पिछले छह महीनों से ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन का कार्य ठप पड़ा है। इसके चलते राज्य में जैविक खेती से जुड़े उत्पादों का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिना प्रमाणन के बिक पाना मुश्किल हो जाएगा।
यह बात एआईसीसी सदस्य और उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने  पत्रकारों से बातचीत के दौरान कही। उन्होंने कहा कि ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन की आंतरिक प्रक्रिया इंटरनल कंट्रोल सिस्टम (आईसीएस) तथा उत्तराखंड सीड सर्टिफिकेशन एजेंसी (यूसोका) का कार्य पिछले छह महीनों से बंद पड़ा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश के कृषि विभाग ने वर्ष 2025-26 के लिए भारत सरकार को एनसीओएल के साथ संचालित योजना का बजटीय प्रस्ताव नहीं भेजा। इसके कारण केंद्र और राज्य सरकार की 90:10 अनुपात वाली वित्तीय सहायता जारी नहीं हो सकी, जिससे पूरी योजना प्रभावित हो गई है। धस्माना ने कहा कि जिन पहाड़ी उत्पादों ने ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन के आधार पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बनाई थी, वे अब प्रमाणन के अभाव में बाजार में टिक नहीं पाएंगे।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2003 में तत्कालीन तिवारी सरकार ने जैविक बोर्ड का गठन कर प्रदेश में जैविक खेती को बढ़ावा दिया था। इसके बाद वर्ष 2015-16 में हरीश रावत सरकार के दौरान कोदा, मंडवा और झंगोरा जैसे स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। बढ़ती मांग के चलते किसानों ने इन पारंपरिक फसलों की खेती दोबारा शुरू की थी।


धस्माना ने कहा कि वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली से ऐसा प्रतीत होता है कि वह ऑर्गेनिक बोर्ड को समाप्त करने की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ऐसा नहीं होने देगी। इस मुद्दे को लेकर जल्द ही मुख्यमंत्री से मुलाकात कर प्रभावी कार्रवाई की मांग की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर जैविक खेती से जुड़े किसानों के साथ आंदोलन भी किया जाएगा।

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