काठ बंगला बस्ती मुद्दा- निगम के शपथ पत्र पर टिकी निगाहें

विस्थापन पर हाईकोर्ट की रोक,जनसंगठन आंदोलित

बस्ती अधिनियम के पालन और पुनर्वास नीति पर उठे सवाल

अविकल उत्तराखण्ड

नैनीताल/देहरादून। स्थानीय काठ बंगला बस्ती के जबरन विस्थापन मामले में उच्च न्यायालय द्वारा यथास्थिति/ अंतरिम रोक (स्टे) लगाए जाने के बाद  नगर निगम  शपथ पत्र दाखिल करेगा। 6 मई को हुई सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने नगर निगम को तीन हफ्ते के अंदर जवाब दाखिल करने को कहा है। जवाब दाखिल करने की यह मियाद  27 मई को समाप्त हो रही है।
दूसरी ओर, हाईकोर्ट के यथास्थिति बनाये रखने सम्बंधी निर्देश के बाद मकानों को तोड़ने की प्रक्रिया के विरोध में विभिन्न जन संगठनों ने 30 मई तक विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है।

विपक्षी दलों और जन संगठनों ने सरकार की कार्यप्रणाली पर  सवाल उठाए हैं। प्रतिनिधियों का आरोप है कि सरकार राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेशों को लेकर भ्रम फैलाकर लोगों के मकानों को तोड़ने का प्रयास कर रही है, जबकि 2016 के मलिन बस्ती अधिनियम के अनुपालन की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है।

जन संगठनों ने कहा कि उच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि एनजीटी में लंबित याचिका की वास्तविक स्थिति न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए। उनका कहना था कि पिछले आठ महीनों से प्रभावित परिवार इस कार्रवाई के खिलाफ आंदोलनरत हैं, लेकिन प्रशासन उनकी आपत्तियों और चिंताओं पर मौन बना हुआ है।
जनसंगठनों ने कहा कि 30 मई तक शहरभर में सरकार के कथित दुष्प्रचार के विरोध और 2016 के अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग को लेकर अभियान चलाया जाएगा।

हाईकोर्ट में 6 मई को हुई थी सुनवाई

गौरतलब है कि 6 मई को काठ बंगला बस्ती के तीन परिवारों द्वारा दायर याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायाधीश सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि 2016 और 2018 के बस्ती अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए उन्हें मकान खाली करने के नोटिस दिए गए, जबकि संबंधित न्यायालय आदेशों में हटाने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है।
परिवारों का कहना है कि प्रशासन उन्हें पास में बने फ्लैटों में पुनर्वास के लिए दबाव बना रहा है, जबकि उन फ्लैटों की सुरक्षा और रहने योग्य स्थिति पर गंभीर सवाल हैं। उनका दावा है कि फ्लैट नदी क्षेत्र में बने होने के कारण सुरक्षित नहीं हैं।
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से एनजीटी में लंबित याचिका का हवाला दिया गया। याचिकाकर्ताओं की अधिवक्ता तनुप्रिया जोशी ने अदालत से कहा कि जब एनजीटी स्वयं अपने हटाने संबंधी आदेश पर रोक लगा चुका है, तो पुनर्वास और हटाने की कार्रवाई पर भी रोक लगाई जानी चाहिए।


इस पर खंडपीठ ने सरकार से विस्तृत योजना और एनजीटी मामले की स्थिति पर जवाब तलब करते हुए प्रभावित परिवारों के जबरन पुनर्वास की प्रक्रिया पर अगली सुनवाई तक यथास्थिति बनाये रखने/ अंतरिम रोक लगा दी।
साथ ही 6 मई को हुई सुनवाई में नगर निगम देहरादून के अधिवक्ता द्वारा किए गए अनुरोध के अनुसार उन्हें तीन सप्ताह का समय दिया गया (27 मई तक )ताकि वे राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में दाखिल अनुपालन शपथपत्र तथा उस संस्था द्वारा चिन्हित किए गए ढांचों/संरचनाओं की सूची अभिलेख पर प्रस्तुत कर सकें।
नगर निगम द्वारा दाखिल किए जाने वाले शपथपत्र में यह स्पष्ट रूप से बताया जाएगा कि अपीलकर्ताओं से संबंधित संरचनाओं को एनएमसीजी द्वारा हटाने के लिए चिन्हित किया गया है या नहीं।

देहरादून के काठ बंगला (बिंदाल/रिस्पना नदी) क्षेत्र में प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत निवासियों को विस्थापित करने की योजना बनाई है। निवासी इसके खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें दिए जा रहे फ्लैट्स असुरक्षित क्षेत्र में हैं, जगह कम (एक कमरा) है और पूरी पुनर्वास नीति स्पष्ट नहीं है।

काठ बंगला विस्थापन आंदोलन

विस्थापन और पुनर्वास का विरोधप्रशासन और एमडीडीए (MDDA) द्वारा काठ बंगला क्षेत्र के निवासियों को उसी इलाके में बने फ्लैटों में शिफ्ट होने के नोटिस दिए गए थे। हालांकि, स्थानीय लोग इन फ्लैटों में जाने का विरोध कर रहे हैं।

असुरक्षित स्थान

निवासियों का आरोप है कि उन्हें जहाँ शिफ्ट किया जा रहा है, वह जगह भी नदी के किनारे और असुरक्षित (फ्लड ज़ोन) क्षेत्र में है।कम जगह: प्रशासन द्वारा एक परिवार को केवल एक कमरा आवंटित किया जा रहा है, जो कि बड़े परिवारों (6-7 सदस्य) के लिए नाकाफी है।

प्रशासन और निवासियों के बीच गतिरोध। नोटिस की समय सीमा

प्रशासन ने 116 परिवारों को काठ बंगला से बेदखल करने और फ्लैटों में शिफ्ट होने का अंतिम नोटिस दिया था, जिसके बाद निवासियों ने इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया।

सुरक्षा और मुआवजा

निवासियों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन पर सवाल उठाया है कि आखिर मलिन बस्तियों के गरीबों के घरों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है, जबकि नदी के किनारे अन्य निर्माणों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *