विरासत- गौरवशली 75 साल
रामलीला में लोक संस्कृति, जनसहयोग और सामाजिक सद्भाव की अनूठी मिसाल
अविकल उत्तराखंड
उत्तरकाशी। उत्तराखंड में रामलीला प्रमुख लोकनाट्य परंपराओं में से एक रही है। यह हमारी सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत, लोक संगीत और मौखिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का सशक्त माध्यम है। उत्तरकाशी की रामलीला के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर मुझे भी इसका साक्षी बनने का गौरव प्राप्त हुआ।
रामलीला कमेटी के अध्यक्ष जयेन्द्र पंवार ने पिछले दस वर्षों से गढ़वाली भाषा में रामलीला का मंचन कर इसमें एक खास आकर्षण पैदा किया है। स्थानीय भाषा में रामलीला का मंचन क्षेत्रीय संस्कृति और लोक परंपराओं को सहेजने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
इस रामलीला की दूसरी विशेषता संगीत और गायन के उच्च स्तर को बनाए रखना है। मौलिक धुनों और पारंपरिक लोक गायन को बिना किसी छेड़छाड़ के प्रस्तुत किया जाता है। इससे रामलीला की सांस्कृतिक मौलिकता और लोक परंपरा की विशिष्टता बनी हुई है।

आयोजन की एक अन्य विशेषता समिति की ओर से जनसहयोग से संचालित सीता रसोई है, जहां कलाकारों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है। यह व्यवस्था अपने आप में अनूठी है। डॉ. तस्दीक खान कई वर्षों से अशोक वाटिका को सजाने के साथ ही फल, फूल और सब्जियों की व्यवस्था में सहयोग कर रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश और जम्मू सहित पड़ोसी राज्यों से आकर यहां बसे प्रवासियों और संस्कृति प्रेमियों का सहयोग एवं सद्भाव भी इस आयोजन की विशेष उपलब्धि है। विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की सहभागिता सामाजिक समरसता और सामुदायिक सहयोग की ऐसी मिसाल पेश करती है, जो आज के समय में दुर्लभ होती जा रही है। इन विशेषताओं ने उत्तरकाशी की रामलीला को और भी दर्शनीय बना दिया है।
रामलीला में अभिनय के साथ कलाकारों का स्वयं गायन करना भी उल्लेखनीय है। राम, लक्ष्मण और दशरथ की भूमिकाओं में क्रमशः गोपाल राणा, विजय चौधरी और जयेन्द्र पंवार का अभिनय एवं गायन उत्कृष्ट रहा। सीता की भूमिका हेमंती राणा ने निभाई।
संगीत निर्देशन में चतर सिंह मराठा और अखिलेश उनियाल का योगदान रहा, जबकि मंच सज्जा की जिम्मेदारी केसर सजवाण ने संभाली। महासचिव शांति प्रसाद भट्ट, कोषाध्यक्ष अरविन्द, विजय प्रकाश भट्ट, रमेश चौहान, भूपेश कुड़ियाल और अरविन्द राणा सहित अन्य सहयोगियों ने आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रसोई की व्यवस्था सूरज भट्ट संभाल रहे हैं। उनके साथ युवा और महिलाएं भी पूरी तन्मयता और श्रद्धा के साथ इस अनुष्ठान में जुटे हुए हैं।
उत्तरकाशी की रामलीला के 75 वर्ष पूरे होना केवल एक सांस्कृतिक आयोजन की उपलब्धि नहीं, बल्कि लोकभाषा, पारंपरिक संगीत, जनसहयोग और सामाजिक सद्भाव की समृद्ध विरासत का उत्सव भी है। यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से जोड़ने की प्रेरणा देती रहेगी।




