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चल उड़ जा रे पंछी…ये देस हुआ बेगाना लौटने लगे हैं प्रवासी मैदान की ओर

रिवर्स पलायन का एक सच यह भी, कोरोना संकट में सवा दो लाख प्रवासी लौटे थे उत्त्तराखण्ड

स्वरोजगार की योजनाओं का नहीं मिला सहारा

पौड़ी जिले में सर्वाधिक 60 हजार प्रवासी लौटे थे

पत्रकार साथी व सामाजिक कार्यकर्ता जगमोहन डांगी ने इस कोरोना रिवर्स पलायन के सच को महसूस किया। देखा। कैमरे में कैद किया। पहाड़ में चाह कर भी न रुक पाने की कसक। वापस दिल्ली की ओर जाती कार। कोरोना काल में गांव के दगड्यों ( मित्र,साथी) से खूब छुईं (गप्पें) लगी। जाते वक्त दिल बोझिल है । सड़क तक छोड़ने आया है पूरा गांव। बच्चे ककड़ी संभाले फिर महानगरों की चिल्लपों में घुल जाएंगे लेकिन अपना पहाड़ याद आएगा। माता-पिता रोजी रोटी के लिए नए सिरे से मशक्कत करेंगे। चल उड़ जा रे पंछी..

बोल चैतू / अविकल उत्त्तराखण्ड

देहरादून।
छोटे व नाजुक कंधों पर पहाड़ी ककड़ी। हाथ में लौकी। पिता की गोद में बेटा। कुछ दृश्य बहुत कुछ कह जाते हैं। कोरोना संकट में मज़बूरी में हुई पहाड़ वापसी । और अब फिर मैदान की दौड़।

उत्त्तराखण्ड के पहाड़ी गांवों में विदायी में यूं उमड़ते है गांव वाले

दरअसल, ये कोरोना संकट की वजह से दिल्ली से उत्त्तराखण्ड के गांव आयी थी। लॉक डाउन के दौरान तीन महीने अपने माँ-पिता व रिश्तेदारों के साथ पौड़ी गढ़वाल के कल्जीखाल विकास खंड की सबसे पिछड़ी ग्राम पंचायत बुटली में रहे। अब वापस दिल्ली जा रहे है पहाड़ी ककड़ी व लौकी लेकर।

कुछ दिन तक पहाड़ी ककड़ी व हरी चटनी का स्वाद लेंगे। और पहाड़ में बिताए खुशनुमा पलों को याद करेंगे। लेकिन लौटना भी है उस जगह जहां से रोजी रोटी चल रही थी। उत्त्तराखण्ड में तमाम कोशिशों के बावजूद रोजगार की बात नही बन पायी।

गांव के पास की सड़क पर कार में सामान लादा जा रहा। रोजगार नहीं तो गांव में कब तक रहेंगे

दरअसल, कोरोना काल में उत्त्तराखण्ड के गांवों में लगभग 2 लाख 15 हजार (यह आंकड़ा ज्यादा/कम भी हो सकता है) प्रवासी लौटे। इन प्रवासियों को रोजगार देने के लिए सीएम त्रिवेंद्र रावत की सरकार ने कुछ स्वरोजगार की योजनाएं भी चलाई है ताकि रिवर्स पलायन के तहत ये प्रवासी अपने गांव में रुक कर ही आजीविका चला सके। इन प्रवासियों का सरकारी स्तर पर सर्वे की भी खबर है कि किस प्रकार के रोजगार की इनको जरूरत है। पलायन आयोग के सर्वे से पता चला था कि 58 प्रतिशत प्रवासी प्राइवेट जॉब करते हैं।

कोरोना काल में स्वरोजगार से जुड़े फुल पेज विज्ञापन अभी भी अखबारों में छप रहे हैं। कुछ समय पहले ही एक सर्वे में यह तथ्य भी सामने आया कि प्रवासियों के थोड़े से ही प्रतिशत ने स्वरोजगार की योजनाओं के प्रति रुचि दिखाई और आवेदन किया।

त्रिवेंद्र सरकार के इस विज्ञापन में कोरोना काल में शुरू की गयी विभिन्न स्वरोजगार योजनाओं की जानकारी

इधर, कल्जीखाल विकास खंड से आ रही यह भावुक कर देने वाली तस्वीर इस सच की ताकीद कर रही है कि प्रवासी पंछी एक बार फिर मैदान की ओर लंबी उड़ान पर निकल रहे हैं।

मनरेगा के तहत ही थोड़ा बहुत काम मिल पाया

पहाड़ सुंदर हैं, मन को भाते हैं लेकिन इन प्रवासियों को मनरेगा से इतर रोजगार की कोई और संभावना नही लगी। गांव की सड़क पर कार खड़ी है। समान लादा जा रहा है। तीन महीने अपनों के बीच गुजार दिए। पता ही नहीं चला….लेकिन मेरी सरकार पापी पेट का सवाल है…अपने वतन में पेट की आग नहीं बुझ पाएगी…दिल्ली से लौटे बच्चों को बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं भी चाहिए ..जो अभी भी दूर की कौड़ी बनी हुई है। तभी ये प्रवासी चैतू अपने गांव छोड़ चल पड़े हैं नए सफर की ओर। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देस हुआ बेगाना…चल चैतू बल्ल चल चैतू…

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