रिवर्स पलायन- धामी सरकार के सामने हिमालयी चुनौती

पहाड़ से नीचे उतर नेताओं ने दून समेत कई सुगम इलाकों में बना लिया आशियाना

सीमांत इलाकों पर फोकस से बनेगी बात

कई नेताओं व अफसरों ने मैदान में खड़े कर लिए बड़े बड़े संस्थान

कई नेताओं ने पलायन कर बदली चुनावी सीट,वापस चढ़ना होगा पहाड़

अविकल थपलियाल

  देहरादून। धामी सरकार के ताजे बजट के बाद एक बार फिर पलायन व रिवर्स पलायन पर मंथन तेज हो गया है। मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना व सीमांत इलाकों के विकास के लिए धनराशि के सही खर्च पर भी निगाहें टिक गई हैं।

कोरोनकाल में 2 लाख से अधिक प्रवासियों के उत्तराखंड आने के बाद रिवर्स पलायन की उम्मीद जगी थी। उस समय 30 प्रतिशत प्रवासियों ने ही उत्तराखंड में रुकने की बात कही थी। यही नहीं, सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रवासियों के लिए स्वरोजगार की योजना चलाई थी। लेकिन लालफीताशाही की वजह से प्रवासियों को बैंक ऋण आदि मामलों में कई तरह की परेशनियां पेश आयीं। कोरोना का खतरा कम होते ही अधिकतर प्रवासी वापस लौट अपने मूल रोजगार से जुड़ गए।

इस बजट सत्र में पेश आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट भी साफ इशारा कर रही है कि उत्तराखंड में शहरी आबादी का प्रतिशत बीते 22 साल में लगभग 15 प्रतिशत बढ़ गया। राज्य गठन के समय शहरी आबादी का प्रतिशत लगभग 22 था। यह अब बढ़कर 36 प्रतिशत से अधिक हो गया।

दरअसल, राज्य बनने के बाद 2011 की जनसंख्या गणना से पता चला कि उत्तराखंड के लगभग 1700 गांव में कोई नहीं रहता।  आबादी विहीन इन गांवों को घोस्ट विलेज कहा गया। ग्रामीण इलाके से 17 लाख लोग शहरों की तरफ पलायन कर चुके हैं एक तथ्य यह भी सामने आया कि पौड़ी व अल्मोड़ा जिले में पलायन की विशेष मार पड़ी है। राज्य बनने के बाद सवा लाख लोग स्थायी  तौर पर दूसरे स्थानों पर बस गए।

पलायन आयोग भी बना लेकिन चंद संस्तुतियों  से आगे बात नहीं बन पायी।  बागवानी की दिशा में पौड़ी जिले व नैनीताल में कुछ नया धरातल पर नजर आ रहा है। लेकिन धामी सरकार को बागवानी, कृषि व फलोत्पादन की दिशा में अभी बहुत लम्बा सफर तय करना है।

यूँ तो सरकार कई साल से स्वरोजगार को बढ़ावा देते हुए युवाओं को अपने मूल स्थान पर ही रुककर आमदनी बढ़ाने की बात कह रही है । लेकिन स्वरोजगार से जुड़ी सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की कम संख्या भी अफसरशाही के लिए एक गम्भीर चुनौती बनी हुई है।

इस बार धामी सरकार के बजट में स्वरोजगार समेत पुरानी योजनाओं के मद में धनराशि की व्यवस्था कर स्थानीय स्तर पर आजीविका को बढ़ावा देने की बात कही गयी है।

मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना में 25 करोड तथा सीमांत क्षेत्र विकास कार्यक्रम व ग्रामीण कौशल योजना के तहत कुल मिलाकर ₹195 करोड़ की  व्यवस्था की गई हैं।

इसके अलावा सीमांत इलाकों के विकास के लिए बजट में अलग से लगभग 65 करोड़ की व्यवस्था भी की।

ग्रीष्मकालीन राजधानी बनने और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र के गैरसैंण में तत्काल जमीन खरीदने से रिवर्स पलायन की बहस व मुहिम ने तेजी पकड़ ली थी।गैरसैंण की नयी नवेली जमीन पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र आशियाना तब बनाएंगे जब उनकी जेब में पैसा होगा। उस समय ऐसा कुछ उनका बयान भी आया था उनका मीडिया में।

पूर्व सीएम हरीश रावत ने भी ‘हिटो पहाड़’ की मुहिम चलाई थी। लेकिन यह मुहिम भी परवान नहीं चढ़ सकी।

पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तो गैरसैंण में जमीन भी खरीद ली थी। यह भी कहा था कि पैसा होने पर मकान भी बनाएंगे। रावत ने गैरसैंण में अवस्थापना विकास के लिए 25 हजार करोड़ की घोषणा की थी। इससे भी रिवर्स पलायन की उम्मीद जगी थी। लेकिन अब त्रिवेंद्र ने धामी सरकार के बजट में गैरसैंण के लिए लिए बजट की व्यवस्था नहीं होने पर सवाल भी उठा दिए हैं।

नेताओं के अपनों की तैनाती पहाड़ में हो

दूसरा सवाल यह कि कई जनप्रतिनिधि, नेता व अधिकारियों की पत्नियां व अन्य सगे सम्बन्धी पहाड़ों के बजाय सुगम स्थलों में बरसों बरस से नौकरी कर रहे हैं। इनके लिए कोई नियम, कायदे कानून नहीं है। मौज से सुगम तैनाती स्थलों में नौकरी कर रहे इन सभी को दुर्गम इलाकों में तैनात किया जाय। रिवर्स पलायन की दिशा में यह भी एक ठोस व क्रांतिकारी कदम माना जाएगा।

नेता अपनी मूल पर्वतीय सीट से चुनाव लड़ें

राज्य बनने के बाद कई नेताओं ने अपनी परम्परागत पर्वतीय विधानसभा सीट बदल ली। चुनाव लड़ने के बजाय मैदानी इलाकों में आ गए हैं। इस सूची में कई नाम है। मुख्य तौर पर पूर्व सीएम विजय बहुगुणा, रमेश पोखरियाल निशंक, हरीश रावत, त्रिवेंद्र सिंह रावत, हरक सिंह रावत, सौरभ बहुगुणा, अनुपमा रावत समेत कई अन्य नेताओं के नाम जुड़ चुके हैं। भाजपा-कांग्रेस हाईकमान अपने नेताओं को उनकी मूल पहाड़ी सीट से ही टिकट दे तो रिवर्स पलायन की मुहिम मुकाम पर पहुंचेगी।

मैदान में बनायी अचल संपत्ति पहाड़ ले जायँ

एक मुख्य बात यह कि राजधानी बनने के बाद कई बड़े-छोटे नेताओं ब अफसरों ने सुदूर पर्वतीय जिलों को बाय बाय करते हुए देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार आदि सुगम स्थलों में शानदार कोठी-बंगले बना लिए हैं। फ्लैट खरीदे हुए हैं।इनकी एक लंबी सूची है। जांच की जाय तो पत्नी, पुत्र, पुत्री व रिश्तेदारों के नाम चल- अचल संपत्ति के पुख्ता प्रमाण मिल जाएंगे।      

नेता पहाड़ में खोलें प्रोफेशनल संस्थान

रिवर्स पलायन के लिए सबसे जरूरी यह है कि पर्वतीय इलाकों में कई प्रोफेशनल शैक्षिक संस्थान खुलें।  उत्तराखण्ड के कुछ नेताओं , व्यापारियों व अन्य बड़े संस्थानों ने अपने सगे संबंधियों के नाम से मैदानी इलाकों में बड़े-बड़े व्यवसायिक शैक्षिक संस्थान खोल लिए हैं। इन सभी नेताओं और उनके रिश्तेदारों की सूची सरकार के पास पुख्ता तौर पर मौजूद है।  यह जांच में भी सामने आ जायेगा। इन सभी बड़े लोगों से कहा जाय कि अपने संस्थान की एक यूनिट पर्वतीय इलाकों में भी खोलें। इससे पर्वतीय इलाके की प्रतिभाओं को बेहतर प्रोफेशनल कोर्सेस के लिए शहरों की ओर नही भागना पड़ेगा।

अगर  मैदान में उतरे हुए उत्तराखंड के नेता वापस अपने ठौर की ओर निकल पड़ें तो आधी समस्या अपने आप सुलझ जाएगी। पहाड़ से मैदान की ओर पलायन की शुरुआत भी नेताओं ने ही की।

इधर, सख्त भू कानून को लेकर भी आंदोलन जारी है।  सख्त भू कानून के जरिये जमीनों की खरीद फरोख्त में जुटे भू माफिया, अधिकारी व नेताओं के गठजोड़ पर प्रहार भी रिवर्स पलायन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

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