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स्मृति शेष-मौजूदा सरकार में नहीं मिली उत्त्तराखण्ड के “अमित शाह” को तवज्जो

भाजपा के शांत सिपाही भाष्कर नैथानी को “मौन” विदायी

दायित्वधारियों की सूची से बार बार कटता रहा नाम

अविकल उत्त्तराखण्ड

देहरादून। राजनीतिक हलकों में उन्हें उत्त्तराखण्ड का “अमित शाह” भी कहा जाने लगा था। चेहरे मोहरे व कद काठी से एकबारगी अमित शाह की झलक मिलती थी। लेकिन इस “अमित शाह”  भाष्कर नैथानी को त्रिवेंद्र सरकार में वो अहमियत नही मिली जिसके वो सौ प्रतिशत हकदार थे।

लंबे इंतजार के बाद जब त्रिवेंद्र सरकार ने दो साल पहले दायित्वों का पिटारा खोला तो जिन कई वरिष्ठ भाजपा नेताओं के नाम सूची से गायब थे उनमें पूर्व संगठन मंत्री भाष्कर नैथानी का भी नाम था। उस समय यह प्रबल उम्मीद थी कि भाष्कर  नैथानी का नाम दायित्वधारियों की पहली सूची में जरूर होगा। लेकिन सुना गया कि नाम रातों रात काट दिया गया। यह खबर एक बड़े झटके के समान थी।

सीएम त्रिवेंद्र ने पहली सूची के बाद कई अन्य सूची भी जारी की। लेकिन भाष्कर नैथानी उन सूचियों में भी गायब थे। जबकि दायित्वधारियों की सूची में कई आश्चर्यजनक नाम शामिल थे। यह भी सच है कि भाष्कर नैथानी की तरह भाजपा के कई चिर परिचित नामों को आज भी दायित्व नही मिला।

शनिवार को स्वर्गीय नैथानी के आवास पर सांत्वना देने पहुंचे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद व संघ के प्रचारक के तौर पर भाष्कर नैथानी ने उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में संगठन का कार्य किया। राज्य गठन के बाद वे भाजपा के प्रदेश संगठन मंत्री भी रहे। व्यापक जुड़ाव वाले निष्ठावान कार्यकर्ता रहे। हालांकि, कुछ दिन पहले ही उन्हें भाजपा संगठन में विशेष आमंत्रित सदस्य भी बनाया गया। लेकिन दायित्वधारियों की सूची से उनका नाम कटा ही रहा।

उन्होंने किसी भी कुर्सी या पद के लिए दबाव की राजनीति भी नही की। बाहर कुछ नहीं बोले। 2007 में भाजपा की सरकार में भाष्कर नैथानी को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का दायित्व मिला था । हालांकि, 2017 में बहुमत की भाजपा सरकार आने के बाद भी वे पार्टी के लिए बेगाने ही बने रहे। बेहद शांत दिखने व मधुर बोलने वाले भाष्कर नैथानी के अंदर ही अंदर बहुत कुछ उमड़ घुमड़ रहा था। यही तूफान ब्रेन हैमरेज की शक्ल में उनकी दुनिया से विदायी करवा गया।

भाष्कर नैथानी अब इस दुनिया में नहीं रहे।  उनकी अंतिम दर्शन यात्रा में पार्टी के कितने ओहदेदार देहरादून के आवास से लेकर हरिद्वार की खड़खड़ी तक गए। यह भी पार्टी के अंदर चर्चा का विषय बना हुआ है।

संघ व भाजपा का ये मौन सिपाही मौन व्रत रखकर चुपचाप चला गया। ऐसे  कर्मठ व समर्पित सिपाही को भाजपा की “मौन” विदायी भी एक नई कहानी की ओर इशारा कर गई।

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