स्मृति शेष- मंगलेश जी और लेडीज़ टेलर

लखनऊ से वीर विनोद छाबड़ा


ये बात 1981 की है. मैं ठहरा सिनेमाबाज़. कोई फिल्म नहीं छोड़ता था. फिल्म का अच्छा या बुरा होना कोई मायने नहीं रखता था. फिल्म को मैं अपना धर्म समझ कर देखता था. लीला थिएटर में संजीव कुमार-रीना रॉय की ‘लेडीज़ टेलर’ चल रही थी. शायद दूसरा हफ्ता रहा होगा. हमने सुना था फिल्म कोई ख़ास नहीं है. आराम से टिकट मिल रहा है. मैंने इवनिंग शो प्लान किया. देखा फ्रंट क्लास का टिकट भी आसानी से मिल रहा था. सोचा फ्लॉप जाती फिल्म देखने के लिए क्यों फालतू पैसा खर्च किया जाए. अभी तीन से छह वाला शो छूटा नहीं था.

मैं रेलिंग पर पिछवाड़ा टेक कर सिगरेट का धुआं उड़ाने लगा. एक सज्जन मेरे बगल में खड़े थे. मुझे उनमें आरके लक्ष्मण के सिंपल मैन की झलक दिखाई दी. याद नहीं आ रहा कि वो सिगरेट पी रहे थे या नहीं. मुझे याद नहीं उनसे बातचीत के सिलसिला कैसे शुरू हुआ. शायद मैंने ही शुरूआत की – दूसरे हफ़्ते में टिकट आसानी से मिल रहा है तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है फिल्म कोई ख़ास नहीं है. मैं तो संजीव कुमार के लिए आया हूँ. वो मुस्कुरा दिए. अचानक मुझे ऐसा लगा कि वो कुछ जाने-पहचाने से लगते हैं. सोचा, शायद अपने बिजली विभाग में कहीं बाबू हैं और कभी हमसे किसी काम के सिलसिले में मिलने आये हों. मैंने पूछा – आप बिजली विभाग में हैं? वो हंस दिए – नहीं मैं अख़बार में हूँ, अमृत प्रभात में. मैंने अमृत प्रभात में कई आर्टिकल लिख रखे थे, जब वो इलाहाबाद से छपता था और फिर जब लखनऊ से भी छपना शुरू हुआ था. मैंने तो वहां नौकरी के लिए भी अप्लाई किया था, मगर संपादक केबी माथुर साहब ने मेरी एप्लीकेशन रद्द कर थी. मैंने कारण पूछा था तो उन्होंने कहा था – जहाँ नौकरी कर रहे हो उससे बेहतर जगह नहीं हो सकती. बस यों ही फ्री लांसिंग करते रहो. मैंने अपना नाम बताते हुए ये बात उन सज्जन को बताई तो उन्होंने कहा – उन्होंने ठीक ही कहा था. फिर अचानक मुझे ख़्याल आया. पूछा – आपका नाम क्या है? उन्होंने धीरे से और कुछ शर्माते हुए बताया – मंगलेश डबराल. मैं उनका नाम सुनते ही उछल पड़ा. आप मंगलेश डबराल हैं? अरे, आपने तो मेरे कई आर्टिकल प्रकाशित किये हैं. लेकिन यकीन नहीं होता. आप इतने अच्छे कवि और फीचर एडिटर ‘लेडीज़ टेलर देखने आये हैं? वो बोले – रिलैक्स होने के लिए कभी-कभी सिनेमा भी देख लेता हैं. इतने में शो छूट गया. अब चूँकि मैं फ्रंट क्लास का टिकट लिए हुए था तो मैंने कहा – माफ़ कीजियेगा, मैं अकेले फिल्म देखना पसंद करता हूँ. वो फिर मुस्कुराये – मैं भी.
ये मंगलेश जी से मेरी पहली मुलाक़ात थी. उसके बाद दो-तीन मुलाक़ातें अमृत प्रभात में हुईं जब मैं वहां आर्टिकल देने गया. बाद में वो दिल्ली चले गए. फिर बरसों बाद उनसे फेसबुक पर भेंट हुई. उन्हें मैंने मैसेज बॉक्स में ‘लेडीज़ टेलर’ का रिफरेन्स भी दिया. उन्होंने मेरे अनुरोध को स्वीकार करने में कतई देर नहीं की.

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मंगलेश जी का इस दुनिया से विदा लेना मुझे बहुत ही ख़राब लगा है. साहित्य में उन जैसा सिंपल कवि-संपादक पुनः आएगा, असंभव है.

लेखक वीर विनोद छाबड़ा, लखनऊ

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