स्वस्थ्याग्रही डॉ बिष्ट की मांगे मंजूर, लिखित वादे के बाद धरना वापस

मूख्यमंत्री त्रिवेंद्र के फिजीशियन के विरोध से आलाधिकारियों के छूटे पसीने

अविकल उत्तराखंड ब्यूरो

मुख्यमन्त्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के फिजीशियन डॉक्टर एन एस बिष्ट के मौन स्वस्थ्याग्रह से मचे हड़कंप के बाद वरिष्ठ अधिकारियों का दल तूफान की तरह गांधी अस्पताल पहुंचा। मौन आंदोलन कर रहे डॉक्टर बिष्ट की मांगों पर तुरन्त टेबल टॉक हुई। और प्रमुख अधीक्षक ने सभी मांगों पर न्यायपूर्ण विचार का लिखित आश्वासन दिया। तेजी से पत्र टाइप किया गया।

चार सूत्री मांगों पर ठोस लिखित आश्वासन मिलते ही आंदोलित डॉक्टर बिष्ट ने सत्याग्रह वापस ले लिया। 9.30 बजे धरने पर बैठे डॉक्टर बिष्ट को 11.30 बजे लिखित आश्वासन का पत्र भी थमा दिया गया।

लिखित आश्वासन मिलने के बाद डॉक्टर बिष्ट ने कहा कि उनकी किसी से कोई निजी रंजिश नही है। अस्पताल प्रबंधन व विभागीय लापरवाही को सुधारने के लिए उन्हें यह कदम उठाना पड़ा। कई अधिकारी मनमानी पर उतरे हुए हैं। कोरोना ड्यूटी निभा रहे कर्मियों का उत्पीड़न किया जा रहा है।

मूख्यमंत्री त्रिवेंद्र व योगी के साथ डॉक्टर बिष्ट पुस्तक विमोचन कसर्यक्रम में

डॉक्टर बिष्ट के इस कदम से मुख्यमन्त्री दरबार में विशेष हलचल देखी गयी। चूंकि, डॉक्टर बिष्ट मुख्यमन्त्री के स्वास्थ्य की भी नियमित जांच पड़ताल करते हैं। लिहाजा उनके इस कदम से विभाग को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ी। इस हाई प्रोफाइल मामले के निस्तारण के बाद शासन स्तर पर चैन की सांस ली गयी।
कृपया देखें देहरादून जिला अस्पताल के प्रमुख अधीक्षक का पत्र।

जिला चिकित्सालय देहरादून के प्रमुख अधीक्षक का मांगों के हल सम्बन्धी पत्र का मजमून

गौरतलब है कि डॉक्टर बिष्ट ने कोरोना की शुरुआत में ही स्वंय को कोरोनेशन अस्पताल में आइसोलेट कर लिया था। घर के बजाय व्व अस्पताल में ही रह रहे थे। खुद भी कोरोना की चपेट में आये।

क्वारंटाइन व स्वस्थ होने के बाद ड्यूटी ज्वाइन करने के लगभग 1 महीने बाद विभागीय गड़बड़ी को लेकर धरने पर बैठते ही सभी की सांसे फुला दी। डॉक्टर बिष्ट ने विरोधस्वरूप एप्रन और आला उल्टा कर अपने इरादे साफ कर दिए थे।

उल्टा आला-उल्टा एप्रन। विरोध का अनूठा तरीका।

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2 thoughts on “स्वस्थ्याग्रही डॉ बिष्ट की मांगे मंजूर, लिखित वादे के बाद धरना वापस

  1. इसिको कहते हैं असली ताकत। प्रशासन की नींद उड़ाने का अनमोल मर्दाना तरीका। गांधीजी का असली सत्याग्रह आज भी स्वीकार्य है। जय हो….

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